बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के दलों -भाजपा, जदयू और लोजपा के बीच सीटों का बंटवारा हो गया है. दूसरी ओर, राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन अभी तक किसी समझौते पर नहीं पहुंच सका है. इस सब के बीच एक वक्त बिहार के बाहुबली नेता माने जाने वाले राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की नैया मंझधार में फंसी दिख रही है.

साल 2014 में पप्पू यादव राजद के उम्मीदवार के तौर पर मधेपुरा से चुने गए थे. उन्होंने जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को मात दी थी. माना जाता है कि अपनी महत्वाकांक्षा की वजह से उन्होंने लालू प्रसाद यादव के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर ली. जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक साल 2014 के चुनाव के बाद कमजोर पड़ते लालू की राजनीतिक विरासत पर पप्पू यादव की नजर थी. हालात यहां तक पहुंच गए कि पप्पू यादव ने लालू प्रसाद यादव पर उनकी हत्या करने की साजिश रचने का गंभीर आरोप लगा दिया. आखिरकार मई, 2015 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आधार राजद से छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

इसके बाद बतौर राजद सांसद रहते हुए पप्पू यादव ने साल 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले जन अधिकार पार्टी (जाप) का गठन किया. साथ ही, उन्होंने उस चुनाव में कुल 243 सीटों में से 109 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए. हालांकि उनका यह दांव बुरी तरह पिट गया. जाप क 108 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. पार्टी का एक भी विधायक नहीं चुना गया. इसके बाद चर्चा चली कि पप्पू यादव राजग (एनडीए) में शामिल हो सकते हैं. लेकिन यह चर्चा हवा में ही रही.

पूर्णिया रेलवे स्टेशन | फोटो : हेमंत कुमार पाण्डेय
पूर्णिया रेलवे स्टेशन | फोटो : हेमंत कुमार पाण्डेय

अब बताया जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव के लिए पप्पू यादव अपनी जन्मस्थली पूर्णिया या मधेपुरा से सीट चाहते हैं. हालांकि, मधेपुरा से शरद यादव की उम्मीदवारी लगभग पक्की होने की वजह से इस सीट की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी है. अब उनका पूरा ध्यान पूर्णिया सीट पर है. 1991 के लोकसभा चुनाव में इसी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतकर उन्होंने दिल्ली की राजनीति में अपने कदम रखे थे. इसके बाद दो बार (1996 और1999) में चुनाव में पप्पू यादव ने इस सीट पर कब्जा किया था.

हालांकि, मधेपुरा की तरह पूर्णिया की उम्मीदवारी की राह पप्पू यादव के लिए मुश्किल भरी दिख रही है. महागठबंधन के सूत्रों के मुताबिक पूर्णिया सीट कांग्रेस को दी गई है. उसके टिकट पर यहां से पूर्व सांसद उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह का लड़ना तय माना जा रहा है. बीते जनवरी में पप्पू सिंह ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था. अब वे कांग्रेस का ‘हाथ’ पकड़ने की तैयारी में दिख रहे हैं. इससे पहले साल 2004 और साल 2009 में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के रूप में इस सीट पर जीत हासिल की थी. हालांकि, 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बावजूद उन्हें जदयू के संतोष कुशवाहा के हाथों हार का स्वाद चखना पड़ा. वैसे कांग्रेस से उदय सिंह का पुराना सबंध रहा है. उनकी मां माधुरी सिंह ने साल 1980 और 1984 में इस सीट से बतौर कांग्रेस उम्मीदवार जीत दर्ज की थी.

राजद के एक नेता ने सत्याग्रह को बताया कि तेजस्वी यादव पप्पू यादव को टिकट देने के खिलाफ हैं. बताया जाता है कि लालू प्रसाद यादव ने भी रांची स्थित केंद्रीय जेल में उनसे मुलाकात करने गए पप्पू यादव से मिलने से मना कर दिया था. इसके अलावा लालू प्रसाद यादव के साथ उनका जिस तरह का टकराव साल 2015 में सामने आया था, उससे पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता भी उनके खिलाफ ही दिखते हैं.

हालांकि, पप्पू यादव को थोड़ी-बहुत उम्मीद अपनी पत्नी और सुपौल से कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन की कोशिशों में दिखती है. सूत्रों की मानें तो रंजीत रंजन कोशिश कर रही हैं कि पूर्णिया से कांग्रेस के टिकट पर उनके पति को टिकट मिल जाए. बीते शुक्रवार को उनका बयान भी आया था कि जब महागठबंधन की ओर से सीट बंटवारे का एलान किया जाएगा तो पप्पू यादव इसका हिस्सा होंगे. हालांकि, महागठबंधन की ओर से इसके अब तक कोई संकेत नहीं मिले हैं.

इन हालात को देखते हुए कहा जा सकता है कि ‘द्रोहकाल के पथिक’ (पप्पू यादव की आत्मकथा का शीर्षक) को 2019 के चुनाव में दिल्ली तक पहुंचने के लिए महागठबंधन का ‘हाईवे’ मिलता मुश्किल दिखता है. इस लिहाज से ऐसी संभावना अधिक दिख रही है कि इस चुनाव में मधेपुरा या पूर्णिया से उन्हें अपनी बनाई पगडंडी (पार्टी) पर ही चलने को मजबूर होना पड़े. हालांकि उम्मीद उन्होंने अब भी नहीं छोड़ी है. उनका ताजा बयान इसकी पुष्टि करता है. पप्पू यादव ने कहा है कि जब लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार से अपनी दुश्मनी भुला सकते हैं तो उनसे क्यों नहीं.