भारतीय वायु सेना (आईएएफ़) में शामिल मिग-21 सीरीज़ के विमानों को ‘उड़ता ताबूत’ कहा जाता है. देश की रक्षा में तैनात किसी विमान को ऐसा नाम दिया जाना सुखद नहीं लगता. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि ऐसा कहा जाना ग़लत भी नहीं है. रिपोर्टों के मुताबिक़ 1970 से आज तक सैकड़ों मिग विमान हादसों का शिकार हुए हैं. इन हादसों में 170 से ज़्यादा भारतीय पायलटों ने अपनी जानें गंवाई हैं.

मिग विमानों को 60 के दशक में आईएएफ़ में शामिल किया गया था. रूस द्वारा निर्मित इस सीरीज़ के विमानों को अमेरिका से लेकर वियतनाम तक कई देशों ने अपनी वायु सेना में शामिल किया था. इनमें से ज़्यादातर देशों ने सेवा लेने के बाद इन विमानों को रिटायर कर दिया है. लेकिन भारत की वायु सेना में ये अभी भी अग्रणी लड़ाकू विमानों में शामिल हैं. ऐसे में यह आलोचना लाज़मी है कि पुरानी पीढ़ी के इन विमानों को ज़बर्दस्ती काम में लाए जाने की वजह से ही ये हादसों का शिकार हो रहे हैं और देश को बार-बार अपने अनमोल पायलटों को खोना पड़ रहा है.

लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाना चाहिए कि आईएएफ़ का यह लड़ाकू विमान किसी काम का नहीं है? बीती 27 फ़रवरी को पाकिस्तान द्वारा भारत के एक मिग-21 बाइसन लड़ाकू विमान को मार गिराने का दावा किए जाने के बाद कई रक्षा विशेषज्ञों ने मिग विमानों में कमियां निकाल दी थीं. लेकिन इसी घटना में इस विमान को लेकर हुई आलोचना का जवाब भी है.

यह सभी जानते हैं कि निशाना बनने से पहले मिग-21 बाइसन ने एक एफ़-16 को मार गिराया था. अमेरिकी तकनीक से निर्मित यह विमान दुनिया में अब तक के सबसे घातक और कामयाब लड़ाकू विमानों में से एक माना जाता है. रिपोर्टों के मुताबिक़ हवाई युद्ध के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब किसी एफ़-16 विमान के मार गिराए जाने की घटना रिकॉर्ड हुई.

यह कारनामा एक भारतीय लड़ाकू पायलट अभिनंदन वर्तमान ने उसी ‘उड़ते ताबूत’ क़रार दिए गए मिग-21 बाइसन से किया. वह भी तब जबकि तकनीक के लिहाज़ से एफ़-16 विमान ज़्यादा उन्नत है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि बूढ़े और अपने ही पायलटों के लिए जानलेवा होने के बाद भी मिग-21 विमान भारतीय वायु सेना में क्यों बने हुए हैं.

चौथी पीढ़ी की लड़ाकू तकनीक और हथियारों से लैस

भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है. लेकिन इस क्षेत्र के जानकार हथियार ख़रीदने की प्रक्रिया को लेकर भारत की आलोचना करते हैं. उनके मुताबिक़ कभी यहां हथियार ख़रीदने से जुड़े फ़ैसले बहुत देर में लिए जाते हैं, तो कभी रक्षा सौदों की प्रक्रिया अलग-अलग कारणों के चलते काफ़ी धीमी रहती है. देश की थल सेना के साथ वायु सेना भी इस दिक़्क़त से जूझती रही है और मजबूरन पुराने विमानों से ही काम चला रही है. रिटायर्डमेंट की उम्र के तीस साल बाद भी वायु सेना में मिग सीरीज़ के विमानों की सेवा लेना इसका उदाहरण है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुराने पड़ चुके इन विमानों की युद्ध क्षमता भी पुरानी ही है. जानकार बताते हैं कि भारत की रक्षा में तैनात इन विमानों को 90 के दशक के अंत और इस सदी के पहले दशक की शुरुआत के बीच चौथी पीढ़ी की तकनीक और हथियारों से लैस कर अपग्रेड किया गया था. हथियारों और युद्ध मामलों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ टाइलर रोगोवे अपने एक लेख में बताते हैं कि इस अपग्रेडेशन के तहत बाइसन में आधुनिक कॉकपिट, रडार पर पकड़े जाने का संदेश देने वाला रिसीवर और हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल आर-73 को दागने में मददगार हेलमेट भी लगाया गया था.

वहीं, अभिनंदन वर्तमान ने जिस तरह एफ़-16 को निशाना बनाया, उसे देखते हुए टाइलर का कहना है कि हो सकता है इस विमान में डेटा-लिंक टर्मिनल भी लगा हो. इस सिस्टम की मदद से कोई लड़ाकू विमान अपने साथी विमान से दुश्मन की एयर पोज़ीशन व अन्य जानकारियां हासिल कर सकता है. इसके अलावा विमान में हवा से हवा में मार करने वाली आर-77 मिसाइल भी लगी है जो पायलट के दृष्टिक्षेत्र से दूर निशाना लगाने में कारगर है. रोगोवे के मुताबिक़ इतनी दूर निशाना लगाने के लिए विमान में मल्टी-मोड रडार भी लगा हो सकता है. वहीं, ख़ुद पर हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के लिए दूसरे महंगे हथियार व प्रणाली (काउंटरमेजर डिस्पेंसर) भी विमान में लगाए गए हैं.

इसके अलावा बाइसन में इज़रायल में निर्मित सेल्फ़-प्रोटेक्शन इलेक्ट्रॉनिक वारफ़ेयर पॉड भी लगा हुआ है जो दुश्मन के चौथी पीढ़ी के विमानों में लगे रडार सिस्टम को बेकार करने में सक्षम है. विमान तेज़ रफ़्तार के साथ तुरंत मोड़ लेने की क्षमता भी रखता है. इन तमाम विशेषताओं के साथ कारगर युद्धनीति और एक अनुभवी पायलट के होने से मिग-21 बाइसन अन्य लड़ाकू विमानों की तुलना में एक बेहद ख़तरनाक जंगी हथियार बन जाता है.

अमेरिकी विमानों को मात

साल 2004 और 2005 में अमेरिकी वायु सेना के साथ हुए साझा हवाई युद्धाभ्यास में बाइसन अपनी युद्ध क्षमता का बेहतरीन प्रदर्शन कर चुका है. अमेरिका इस युद्धाभ्यास को इराक़ या ईरान के साथ हुए अभ्यास की तरह देख रहा था. लेकिन आईएएफ़ की हवाई युद्धनीति, विमानों की पैंतरेबाज़ी और पायलटों का युद्ध कौशल देख उसकी वायु सेना हैरान रह गई. यहां यह बात ग़ौरतलब है कि अमेरिका के एफ़-15सी विमानों को छकाने में भारत के सुखोई-30के और मिराज-2000 विमानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन सबसे ज़्यादा हैरान मिग-21 बाइसन ने ही किया था.

टाइलर रोगोवे बताते हैं कि अपने एल्टा-8222 पॉड से बाइसन ने एफ़-15सी के शक्तिशाली एएन/एपीजी-63 रडार को जाम कर दिया था. रडार सिस्टम बेकार होने की वजह से अमेरिकी लड़ाकू विमान रेंज में होते हुए भी बाइसन का कुछ नहीं बिगाड़ पाए. अभ्यास के दौरान बाइसन ने कई बार एफ़-15 को निशाने पर लिया. वहीं, अगर कभी ऐन मौक़े पर एफ़-15 भारतीय विमान को देख लेता तो वह बच निकलने में कामयाब रहता.

सुखोई विमान का शक्तिशाली रडार अपने साथी विमानों के साथ डेटा और एयर पोज़ीशन से जुड़ी तस्वीरें साझा करने में सक्षम है. बाइसन ने अभ्यास में इसका अच्छे से इस्तेमाल किया और अपने से ज़्यादा नई पीढ़ी वाले विमानों को मात दे दी. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस अभ्यास के बाद अमेरिकी पायलटों ने माना था कि उनके लिए यह क़वायद काफ़ी नई चीज़ें सिखाने वाली रही. पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों को खदेड़ते समय भारतीय लड़ाकू विमानों के दस्ते में बाइसन के साथ मिराज और सुखोई विमान भी थे.