प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महीने की शुरुआत में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि देश रफ़ाल लड़ाकू विमानों की कमी महसूस कर रहा है. भारतीय वायु सेना (आईएएफ़) द्वारा बालाकोट हवाई हमले को अंजाम दिए जाने और उसके बाद के घटनाक्रम के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मोदी ने साफ़ संकेत दिया कि अगर भारत के पास रफ़ाल विमान होते तो पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों को खदेड़े जाते समय आईएएफ़ को किसी तरह का नुक़सान नहीं उठाना पड़ता.

बीती 27 फ़रवरी को पाकिस्तान के लड़ाकू विमान भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसे थे. ऑपरेशन बालाकोट के जवाब में की गई इस कार्रवाई का आईएएफ़ ने माकूल जवाब दिया और एक पाकिस्तानी एफ़-16 को मार गिराया था. हालांकि उसी हवाई संघर्ष (डॉग फाइट) में भारत का एक लड़ाकू विमान मिग-21 बाइसन दुश्मन विमान की मिसाइल का शिकार हो गया था.

इस घटना के बाद कई रक्षा विशेषज्ञों ने आईएएफ़ के पुराने लड़ाकू विमानों के हवाले से कहा था कि अब देश को नए विमानों की ज़रूरत है. वहीं, प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि अगर देश के पास रफ़ाल विमान होते तो 27 फ़रवरी को हुए हवाई संघर्ष का परिणाम कुछ और होता.

इस बात को लेकर कोई दो राय नहीं है कि सुखोई-30 एमकेआई और मिग-29 विमानों को छोड़कर आईएएफ़ के ज़्यादातर लड़ाकू विमान अपने रिटायरमेंट की उम्र कब की पार कर चुके हैं और वायु सेना नए विमानों की कमी से जूझ रही है. इसके चलते देश के लड़ाकू हवाई दस्तों की संख्या भी घटती जा रही है जो चीन और पाकिस्तान जैसे गैर-भरोसेमंद पड़ोसियों के मद्देनज़र अच्छा संकेत नहीं है. ऐसे में नए विमानों की कमी महसूस होना जायज़ है.

लेकिन यह भी सच है कि युद्ध परिणाम राजनीतिक बयानों पर निर्भर नहीं करते. आईएएफ़ को नए विमानों की जितनी ज़रूरत है, उतना ही ज़रूरी यह सवाल भी है कि क्या नए विमानों से हवाई युद्ध का परिणाम तय हो जाता है? इसमें संदेह नहीं कि आधुनिक हथियारों से लैस किसी देश की सेना दुश्मन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का काम करती है. लेकिन इससे युद्ध में जीत मिलना भी सुनिश्चित हो जाता है, यह दावा करने से पहले कुछ तकनीकी बातों पर ग़ौर करना चाहिए.

पहली बात तो यही है कि अगर रफ़ाल या किसी अन्य आधुनिक विमानों से हवाई युद्ध में विजय पक्की होती तो आईएएफ़ के बूढ़े हो चुके विमान एफ़-16 जैसे घातक विमानों वाले पाकिस्तानी दस्ते को नहीं खदेड़ पाते, और न ही एक एफ़-16 को गिरा पाते. हक़ीक़त यह है कि किसी भी प्रकार के युद्ध में जीत और हार के पीछे कई फ़ैक्टर होते हैं. हवाई युद्ध भी इनसे अछूता नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय हथियार एवं युद्ध विशेषज्ञ टाइलर रोगोवे की मानें तो हवाई युद्ध में कई तरह के फै़क्टर काम करते हैं. 27 फ़रवरी को हुई डॉगफ़ाइट को कई तकनीकी पहलुओं से जोड़ते हुए वे कहते हैं कि इसके नतीजे इन्हीं पर निर्भर करते हैं. मसलन, ‘दोनों पायलटों को अपनी हवाई स्थिति की कितनी अच्छी जानकारी थी? (दुश्मन पर वार करने या उसका हमला रोकने के लिए) इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर सिस्टम कितना दुरुस्त था? क्या विमान अच्छे से कम्युनिकेट कर रहे थे या कोई रुकावट थी? ख़ुफ़िया जानकारी किस स्तर की थी? (एफ़-16) विमान को गिराते वक़्त बाइसन की एकदम सही पोज़ीशन क्या थी और उस विमान के पायलट का अनुभव क्या था? क्या बाइसन नीचे की तरफ़ उड़ रहा था? क्या पाकिस्तानी दस्ते को इसकी सही जानकारी थी कि भारतीय वायु सेना अपने विमानों को (ऐसी स्थिति में) किस तरह उपयोग करती है? जिस ऊंचाई पर यह हवाई संघर्ष हुआ वहां विजिबिलिटी कितनी थी? जिस विमान को बाइसन ने मार गिराया क्या वह एडवांस ब्लॉक 52 एफ़-16सी/डी विमान ही था? सबसे अहम बात यह कि उस दौरान दोनों तरफ़ के पायलटों के इरादे क्या थे? यह एक आक्रामक हवाई संघर्ष था या रक्षात्मक?’

टाइलर रोगोवे ने डॉगफ़ाइट से जुड़ी जिन तकनीकी बातों का ज़िक्र किया, उन्हें जानने के बाद टेलीग्राफ़ की एक रिपोर्ट पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए. इसमें सूत्रों के हवाले से 27 फ़रवरी को हुई डॉगफ़ाइट की जानकारी दी गई थी. इस ब्रिटिश अख़बार ने बताया कि अभिनंदन वर्तमान को अपने सामने वाले एफ़-16 के ख़िलाफ़ हवा में 60 डिग्री के एंगल पर पोज़ीशन लेनी थी. यह एंगल हमला करने के लिए लिया जाता है ताकि टारगेट को ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचे. अभिनंदन जब ये पोज़ीशन लेने की कोशिश कर रहे थे, उसी दौरान एफ़-16 ने 26,000 फ़ीट ऊंची खड़ी उड़ान भरी थी. रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तानी पायलट ने बाइसन से पीछा छुड़ाने के लिए यह पैंतरा दो बार आज़माया था. सूत्रों ने बताया कि तब तक अभिनंदन ने अपनी पोज़ीशन ले ली थी. टारगेट सेट होते ही उन्होंने दुश्मन विमान को आर-73 मिसाइल से गिरा दिया.

लेकिन कुछ ही पलों में उनके विमान पर एक या दो मिसाइलों से हमला हुआ. उन्हें मजबूरन अपना विमान छोड़ना पड़ा. अभिनंदन का दुर्भाग्य यह रहा कि वे पाकिस्तानी सीमा के अंदर गिरे. लेकिन उससे पहले उन्होंने एक ऐसे विमान को मार गिराया जो न सिर्फ़ दुनिया के सबसे सफल लड़ाकू विमान में शुमार है, बल्कि मिग-21 बाइसन के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा उन्नत है.

भारतीय पायलट का यह कारनामा कोई तुक्का नहीं, बल्कि भारतीय वायु सेना के विश्वस्तरीय हवाई युद्ध प्रशिक्षण का शानदार उदाहरण है जिसकी गवाह अमेरिकी वायु सेना भी रही है. इस घटना के ज़रिये अभिनंदन ने कहीं न कहीं यह भी साबित किया कि उच्च युद्ध कौशल से भी नई पीढ़ी के हथियारों (विमानों) को मात दी जा सकती है, बशर्ते आपकी तैयारी उस स्तर की होनी चाहिए.