दक्षिण भारत के बारे में माना जाता है कि यहां के राज्यों की राजनीति अब तक अपने बनाए रास्ते पर ही चलती रही है. दिल्ली का यहां की सियासत पर ज़्यादा असर होता नहीं है. बल्कि दिल्ली यहां की सियासत से बाअसर रही है. इसकी वज़ह भी सीधी है. ये कि दक्षिण भारत के लगभग सभी प्रमुख राज्यों में दशकों से क्षेत्रीय दलों और उनके दिग्गजों का दबदबा रहा है. फिर चाहे तमिलनाडु में एम करुणानिधि-जयललिता हों या फिर आंध्र प्रदेश में नंदमूरि तारक (एनटी) रामाराव और अब उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू. कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा हों या तेलंगाना से के चंद्रशेखर राव (केसीआर). ये ऐसे नाम हैं जिन्होंने समय-समय दिल्ली ‘राज’ को अपनी-अपनी ‘नीति’ के हिसाब से घुमाया है.

लेकिन इस बार स्थिति अलग है. लंबे समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में दिल्ली की गद्दी पर एक ऐसी शख़्सियत है, जिसका असर देश के पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चारों कोनों में है. कहीं कम, कहीं ज़्यादा लेकिन है ज़रूर. ऐसे में यह सवाल बेहद मौज़ूं हो सकता है कि दिल्ली की इस शख़्सियत के इर्द-ग़िर्द घूम रहे इस चुनाव के नतीज़ों का असर दक्षिण के छत्रपों पर कैसा होगा? ख़ासकर उन पर जो नए सिरे से दिल्ली की सियासत में भूमिका निभाने की मंशा पाले हुए हैं. इनमें दक्षिण के चार राज्यों- तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना के सात पूर्व-मौज़ूदा मुख्यमंत्री ख़ास तौर पर शामिल हैं, जो इस चुनाव के असर से अछूते नहीं रहेंगे. कैसे? इस पहलू को समझने की कोशिश करते हैं.

1. ईपीएस-ओपीएस (तमिलनाडु)

तमिलनाडु में ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) पूर्व मुख्यमंत्री हैं और मौजूदा उपमुख्यमंत्री. वे सत्ताधारी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्नाद्रमुक मुनेत्र कड़गम) के प्रमुख भी हैं. जबकि ईके पलानिसामी (ईपीएस) मुख्यमंत्री और पार्टी के सहप्रमुख हैं. लेकिन ये दोनों ही नेता इस वक़्त पार्टी के स्वाभाविक स्वीकार्य नेतृत्व के रूप में स्थापित नहीं हो पाए हैं. दिसंबर, 2016 में पार्टी प्रमुख जयललिता के निधन के बाद इन दोनों को छह महीने से ज़्यादा का वक़्त लग गया पार्टी को संभालने में. अलग-अलग राह से एकराह होने में. साथ ही पार्टी को जयललिता की सहयोगी रहीं शशिकला और उनके परिवार की जकड़न से छुड़ाने में. कहा जाता है कि इस काम में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भी दोनों नेताओं की भरपूर मदद की. लेकिन अब समय मतदाताओं से मदद लेने का है.

दरअसल, उस उठापटक में राज्य के 21 विधायकों की सदस्यता चली गई थी. इससे विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 235 (मनोनीत सदस्य मिलाकर) से घटकर 214 रह गई थी. अदालती कार्यवाही की वज़ह से इन सीटों पर उपचुनाव हुआ नहीं और महज़ 112 विधायकों के समर्थन पर टिकी ईपीएस सरकार ने दो साल पूरे कर लिए. मगर अब 18 अप्रैल को यहां लोक सभा के साथ 18 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव (बाकी तीन पर अदालती फ़ैसला नहीं आया है) भी हो रहा है. नतीज़ों के बाद विधानसभा की सदस्य संख्या बढ़कर 232 हो जाएगी. इसमें ईपीएस सरकार को बहुमत के लिए कम से 116 सदस्यों की ज़रूरत होगी. यानी उनके 18 में से कम से कम छह विधायक जीतकर आए तो मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री की जोड़ी कुछ राहत महसूस कर सकती है.

लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं है. इसकी चार सबसे अहम वज़हें हैं. पहली- एआईएडीएमके इस वक़्त जयललिता जैसे करिश्माई नेतृत्व से वंचित है. दूसरी- लंबे समय से एआईएडीएमके पर अपनी पकड़ बनाने की ताक़ में बैठे शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण नई पार्टी- एएमएमके (अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम) के साथ चुनाव मैदान में हैं. तीसरी- तमिलनाडु के मतदाता अक़्सर एकतरफ़ा मतदान करते रहे हैं. वह भी अदला-बदली की परंपरा निभाते हुए. यानी एक बार डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) तो दूसरी बार एआईएडीएमके. इस हिसाब से चूंकि पिछली बार सफलता एआईएडीएमके को मिली थी सो अबकी बार डीएमके की बारी आ सकती है. हालांकि डीएमके भी इस चुनाव में अपने करिश्माई नेता एम करुणानिधि के बिना मैदान में है.

इन सबसे ऊपर चौथा कारण. एआईएडीएमके और उसका मौज़ूदा नेतृत्व अब तक पर्दे के पीछे से भाजपा के साथ सहयोग का लेन-देन करता रहा है. लेकिन चुनाव से पहले दोनों पार्टियां खुलकर साथ आ गई हैं. मिलकर चुनाव लड़ रही हैं. इस गठबंधन के पीछे ओपीएस-ईपीएस की उम्मीद शायद ये हो सकती है कि उन्हें अपनी पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय चेहरे की मदद मिल जाएगी. तमिल समुदाय दशकों से ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’, एम जी रामचंद्रन, जयललिता, एम करुणानिधि जैसे करिश्माई चेहरों से प्रभावित भी रहा है. लेकिन यहीं दूसरा पहलू ये भी है नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में अभी उतनी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाए हैं, जितनी देश के अन्य राज्यों में पा चुके हैं. ऐसे में ईपीएस-ओपीएस का यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है.

लिहाज़ा ये कहना ज़्यादा ग़लत न होगा कि इस चुनाव के नतीज़े यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री केंद्र और राज्य की राजनीति में कहां-कितनी जगह बनाएंगे, बचाएंगे या खाेएंगे.

2. एचडी कुमारस्वामी-बीएस येद्दियुरप्पा-सिद्धारमैया (कर्नाटक)

कर्नाटक में बीते साल जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और 104 सीटें जीतीं. लेकिन पार्टी की प्रदेश इकाई के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा सरकार नहीं बना पाए. कांग्रेस ने 78 सीटें जीतीं. यह पार्टी दूसरे नंबर पर रही लेकिन ‘सरकार नहीं बन पाई’. बल्कि सरकार बनी 37 सीटें जीतकर तीसरे नंबर पर रही जेडीएस (जनता दल-सेकुलर) की. कांग्रेस को अधिक सीटें होने को बावज़ूद सरकार में दूसरे नंबर पर सहयोगी की भूमिका में रहना पड़ रहा है. यही वह परिस्थिति भी है जिसकी वज़ह से कर्नाटक से लगातार ऐसी ख़बरें आती रही हैं कि जेडीएस-कांग्रेस सरकार गिर सकती है. भाजपा की बन सकती है. वग़ैरह, वग़ैरह.

इन ख़बरों के पीछे ठोस कारण भी होते हैं. इनमें एक तो यही है कि भाजपा के बीएस येद्दियुरप्पा ने ‘सरकार’ बन जाने की आस अभी छोड़ी नहीं है. बल्कि वे तो बीच-बीच में ऐसी कोशिशें भी करते रहते हैं. ऐसे आरोप ख़ुद मुख्यमंत्री और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी कई बार लगा चुके हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हैं. उनके मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से संबंध सहज नहीं हैं. यानी जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन सहज-स्वाभाविक नहीं है. इसीलिए कुमारस्वामी भी ज़्यादा आश्वस्त नज़र नहीं आते कि उनकी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा कर ही लेगी.

इस सबके बावज़ूद बीते 10-11 महीनों से जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन चल रहा है तो इसके पीछे दो वज़हें हैं. पहली- भाजपा को राज्य की सत्ता से दूर रखना. दूसरी- लोक सभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की आस. इस आस के पूरे होने-न होने की स्थिति पर काफ़ी-कुछ निर्भर करेगा कि एचडी कुमारस्वामी, सिद्धारमैया और बीएस येद्दियुरप्पा का अगला मुक़ाम कहां होगा.

अब यहीं तीन ताज़ातरीन सूचनाएं जोड़ लेते हैं. पहली- दक्षिण के कुछ विशेषज्ञ जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन को दुर्भाग्यशाली बता रहे हैं, जिसने अपनी कब्र खुद खोद ली है. दूसरी- जेडीएस ने कांग्रेस पर दबाव डालकर उससे राज्य की 28 में से आठ सीटें ले लीं. लेकिन उसे तीन सीटों पर प्रत्याशी बनाने के लिए नेता ही नहीं मिले. उसे कांग्रेस से उम्मीदवार उधार लेना पड़े हैं. तीसरी- द इंडियन एक्सप्रेस में छपा एक विश्लेषण कहता है कि जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के बावज़ूद भाजपा को कर्नाटक में ज़्यादा नुकसान नहीं हो रहा है.

3. चंद्रबाबू नायडू-के चंद्रशेखर राव (आंध्र प्रदेश-तेलंगाना)

अब बात सहोदर (एक कोख से जन्मे) तेलुगु राज्यों- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) बीते साल समय से पहले राज्य में विधानसभा चुनाव करवाकर अपनी सरकार और सियासी स्थिति को काफ़ी सुरक्षित कर चुके हैं. दिल्ली में वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सहज संबंध बनाए हुए हैं. साथ ही भाजपा-कांग्रेस से समान दूरी के नाम पर सभी दलों से बराबर का मेलजोल बनाकर चल रहे हैं. राज्य में उन्होंने कांग्रेस की ये हालत कर दी है कि विधानसभा में उसका मुख्य विपक्षी दल का दर्ज़ा भी छिनने वाला है. यानी इस लोक सभा चुनाव के नतीज़े कम से कम केसीआर की सेहत पर प्रतिकूल असर तो शायद नहीं ही डालेंगे. वहीं वे भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन को बहुमत न मिलने पर केंद्र में सरकार गठन में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं और इस तरह दिल्ली की सत्ता में भी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा सकते हैं.

अब रही बात आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तो उनकी स्थिति डांवाडोल है. दरअसल बीते साल भाजपा से अलग होने के बाद चंद्रबाबू नायडू ने अब तक कांग्रेस के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने की काफी कोशिश की. यहां तक कि नायडू की टीडीपी (तेलुगु देशम पार्टी) ने तेलंगाना विधानसभा चुनाव भी उस कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ लिया, जिसके विरोध के आधार पर पार्टी का गठन हुआ था. लेकिन इन तमाम प्रयासों का कोई ख़ास नतीज़ा निकला नहीं और अब हालत ये है कि टीडीपी और कांग्रेस चंद्रबाबू के आंध्र प्रदेश में ही अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं. आंध्र में लोक सभा के साथ 11 अप्रैल को विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं.

ख़बरों की मानें तो आंध्र प्रदेश में आलम ये है कि भीड़ तो सबके लिए जुट रही है लेकिन लहर किसी की नहीं है. इस राज्य में टीडीपी और नायडू की मदद के लिए कुछ क्षेत्रीय दलों के नेता पहुंच रहे हैं. लेकिन ये कितना बेड़ा पार लगा सकेंगे, कहा नहीं जा सकता. क्योंकि हालिया सर्वे बताते हैं कि आंध्र में चंद्रबाबू नायडू के विरोधी वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्‌डी लोक सभा और विधानसभा दोनों में बढ़त ले चुके हैं. हो सकता है, वे एकतरफ़ा नतीज़े हासिल कर लें. अगर ऐसा हुआ तो चंद्रबाबू नायडू का ‘दिल्ली दख़ल’ कमज़ोर हो सकता है.