दक्षिण कश्मीर की अनंतनाग लोक सभा सीट अप्रैल 2016 में महबूबा मुफ़्ती के जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बन जाने से खाली हो गयी थी. 11 मार्च, 2019 को जब चुनाव आयोग ने देश में लोकसभा चुनावों का ऐलान किया तो अनंतनाग सीट तब भी खाली ही पड़ी हुई थी. यह देश के इतिहास में सबसे लंबा स्थगित रहने वाला उपचुनाव बन गया है. इसकी वजह यह है कि सरकार इन तीन सालों में अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र में खराब सुरक्षा स्थिति के चलते, चुनाव नहीं करा पायी.

सवाल यह है कि जो चुनाव पिछले तीन साल में, खराब हालात के चलते, नहीं हो पाया था वह सरकार क्यों सोच रही है कि अब हो पाएगा. और अगर यह चुनाव सख्त सुरक्षा बंदोबस्त के चलते करा भी दिया गया तो क्या मतदान प्रतिशत दिखाने योग्य होगा?

इससे पहले कि इन सवालों का जवाब ढूंढा जाए, ज़रूरी यह जानना है कि अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र में चुनाव क्यों नहीं हो पाया है.

चुनाव क्यों नहीं हो पाया?

अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र चार जिलों में बंटा हुआ है जिसमें अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा और शोपियां जिले शामिल हैं. यह चारों जिले पिछले आधे दशक से ज़्यादा समय के लिए कश्मीर की मिलिटेंसी का केंद्र बन के उभरे हैं.

शायद यही वजह थी कि महबूबा मुफ़्ती के कुर्सी संभालने के ठीक तीन महीने बाद जब हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर, बुरहान वानी, की सुरक्षा बलों के साथ एक मुठभेड़ में मौत हुई तो यह पूरा क्षेत्र लगभग छह महीना तक हिंसा में घिरा रहा. 100 से ज़्यादा असैनिक मारे गए और हजारों घायल हुए.

दक्षिण कश्मीर में स्थित राजनीतिक विश्लेषक और लेखक फरमान अली मलिक सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘ऐसे में चुनाव कराने की कोई सोच भी नहीं रहा था. बस चिंता इस बात कि थी कि हालात बेहतर हो जाएं.’

हालात बेहतर होते-होते 2017 आ गया था. उस साल अप्रैल में श्रीनगर और अनंतनाग की लोकसभा सीटों पर उपचुनाव कराने का निर्णय लिया गया. श्रीनगर सीट पर चुनाव तो हो गया, लेकिन मतदान प्रतिशत रहा सिर्फ सात. और वह भी चुनाव विरोधी प्रदर्शनों में कम से कम आठ नागरिकों की मौत के बाद.

इसके कुछ दिन बाद अनंतनाग में चुनाव था. लेकिन श्रीनगर में हुई हिंसा से सरकार के पैर डगमगा गए और अनंतनाग का चुनाव स्थगित कर दिया गया. फिर चुनाव मई में करने की बात हुई, लेकिन यह फिर स्थगित हो गया. मुख्यधारा के नेताओं ने सरकार, जो कि उस समय पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठबंधन थी, को दोषी माना. उनकी दलील थी कि यह अलगाववादी संगठनों और पाकिस्तान के सामने झुकने जैसा है.

लेकिन एक नज़र हालात पर दौड़ाई जाती तो वे भी ठीक नहीं थे. दक्षिण कश्मीर पर काफी काम कर चुके और कश्मीर लाइफ मैगज़ीन के एसोसिएट एडिटर शम्स इरफान कहते हैं, ‘असैनिक हत्याएं, चाहे प्रदर्शन में हों या अज्ञात बंदूकधारियों के द्वारा, मिलिटेंट्स की तरफ से धमकियां और चुनाव विरोधी प्रदर्शन-जिनको रोकना असंभव सा हो गया था. ऐसे माहौल में चुनाव करा पाना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी,’

अब जबकि पूरे देश के साथ साथ अनंतनाग लोकसभा सीट पर भी चुनाव का ऐलान कर दिया गया है, तो क्या उम्मीद रखी जा सकती है कि वहां चुनाव होंगे?

क्या चुनाव होंगे?

सत्याग्रह से बातचीत में एक शीर्ष पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘चुनाव बिलकुल होंगे.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘अगर हमसे 2017 में भी कहा जाता चुनाव कराने के लिए तो हमने तभी करा दिये होते. लेकिन ये सब सियासी फैसले होते हैं. इनमें हम जैसे अफसरों की नहीं सुनी जाती.’

इस अधिकारी का मानना है कि इस बार चुनाव कराना 2017 के मुक़ाबले आसान भी होगा और उसकी ठोस वजहें हैं. वे कहते हैं, ‘तब से अब तक हमने मिलिटेंट्स के कुछ आला कमांडर मार गिराए हैं. मिलिटेंट्स की भर्ती में खासा फर्क आया है और सड़कों पे प्रदर्शन (या पत्थरबाजी कह लें) कम हो गए हैं. ऐसे में चुनाव कराना आसान हो जाएगा.’

जमीन पर काम कर रहे कई लोग भी मानते हैं कि चुनाव बिलकुल होंगे. हां देखने वाली बात यह होगी कि लोग वोट देने बाहर आएंगे या नहीं. दक्षिण कश्मीर को पिछले 12 साल से रिपोर्ट कर रहे पत्रकार खालिद गुल के मुताबिक कि चुनाव किसी न किसी तरह से हो जाएंगे, लेकिन मतदान प्रतिशत बहुत कम होगा.

खालिद कहते हैं, ‘सरकार अब चुनाव स्थगित करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि अगर अब ऐसा हुआ तो यह एक सीधा संकेत होगा कि सरकार कश्मीर में नियंत्रण खो चुकी है, जो दिल्ली में बैठे लोग कभी नहीं चाहेंगे.’ लेकिन वे साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि चुनाव प्रतिशत 10 से ज़्यादा नहीं हो पाएगा. खालिद कहते हैं, ‘5-6 प्रतिशत ऊपर नीचे. बस इतना ही. उसकी वजह हालात भी हैं और लोक सभा चुनावों के प्रति लोगों की उदासीनता भी है.’

अब मतदान प्रतिशत जो भी हो, फिलहाल तो सरकार के सामने चुनौती चुनाव कराने की है. और चुनाव हों इसके लिए चुनाव आयोग ने एक और अभूतपूर्व निर्णय लिया है. देश में पहली बार चुनाव आयोग ने किसी लोकसभा सीट पर चुनाव तीन चरणों में कराने की घोषणा की है. या यूं कहें कि क्षेत्र के अलग-अलग जिलों में तीन अलग-अलग दिन मतदान होगा. चुनाव आयोग ने फैसला लिया है कि अनंतनाग जिले में मतदान 23 अप्रैल को होगा, कुलगाम जिले में 29 अप्रैल को और बाकी बचे दो जिलों (पुलवामा और शोपियां) में छह मई को.

अभूतपूर्व निर्णय

यह निर्णय इतना अभूतपूर्व था कि जब इसकी घोषणा हुई तो कश्मीर में मुख्यधारा के नेता चकरा गए थे. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, ‘इस घोषणा में कुछ गलती हुई है. चुनाव आयोग ने सात या आठ सीटें गिनी हैं मेरे राज्य में, लेकिन यहां कुल मिलाकर सिर्फ छह सीटें हैं.’ दूसरे नेताओं ने भी इस पर हैरानी जताई थी.

हालांकि यह उलझन अगले कुछ घंटों में दूर हो गई थी और सुरक्षा अधिकारियों को राहत भी हुई थी. जैसे वह शीर्ष पुलिस अधिकारी जिसके साथ सत्याग्रह ने इस विषय पर विस्तार से बात की थी. उनका कहना था, ‘ये फैसला बहुत सटीक है, और हताहतों की संख्याएं कम से कम करने की एक बहुत अच्छी कोशिश भी. इससे हमें भी चुनाव ढंग से करने में आसानी होगी.’

जहां एक तरफ ये आसानियां हैं जिनके चलते लगता है कि चुनाव खैरियत से निपट जाएंगे. लेकिन वहीं दूसरी तरफ कुछ बाधाएं भी हैं जिनको नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.सबसे बड़ी बाधा यह नज़र आती है कि चुनाव घोषित होने के फौरन बाद कश्मीर में हत्याओं का एक दौर फिर से चल पड़ा है.

हत्याएं कौन कर रहा है?

पहली हत्या चुनाव की घोषणा के सिर्फ दो दिन बाद हुई. दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में 25 साल के एक शख्स की गोली मारकर हत्या कर दी गयी. शौकत अहमद नायक 2018 में सेना में भर्ती हुए थे. कुछ महीनों की ट्रेनिंग के बाद वे छुट्टी पर घर आए थे और वापस नहीं लौटे.

अगले ही दिन नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक ब्लॉक प्रेसीडेंट मोहम्मद इस्माइल वानी को उनके सेब के बाग में गोली मार दी गयी-अनंतनाग जिले में. वानी बच तो गए लेकिन अभी अस्पताल में हैं. उसी दिन रात में पुलवामा के गुलजारपोरा गांव से 40 साल के मंजूर अहमद लोन को कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने उनके घर से अगवा कर लिया और फिर उन्हें गोली मार दी.

16 मार्च को दक्षिण कश्मीर के ही शोपियां जिले में 25 साल की पुलिसकर्मी खुशबू जान की उनके घर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी. फिर 18 मार्च की शाम कुछ अज्ञात लोगों ने पुलवामा जिले के त्राल इलाक़े में 25 साल के मोहसिन अहमद वानी की गोली मार के हत्या कर दी.

सवाल यह है कि क्या इन हत्याओं को चुनाव से जोड़ा जा सकता है या नहीं. सत्याग्रह ने इन सभी जिलों के आला पुलिस अधिकारियों से बात की. उन सब का कहना है कि इन हत्याओं को फिलहाल चुनाव के साथ जोड़ना ठीक नहीं है. अनंतनाग के एक आला पुलिस अधिकारी का कहना था, ‘कम से कम एक घटना मेरे इलाक़े में हुई है जहां एक राजनीतिक कार्यकर्ता बाल-बाल बचे हैं. इसको चुनाव से जोड़ सकते हैं लेकिन मैं अभी ऐसा नहीं करूंगा, जब तक मेरी तफतीश पूरी नहीं हो जाती.’

सत्याग्रह ने पुलवामा और शोपियां के भी कुछ पुलिस अधिकारियों से बात की. उनका भी यही कहना है. लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि पुलिस मानती है कि यह हत्याएं मिलिटेंट्स ने की हैं और ये सब की सब अनंतनाग लोक सभा क्षेत्र में हुई हैं. कश्मीर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले पुलवामा के डॉ ज़ुबैर अहमद कहते हैं, ‘अगर ये हत्याएं चुनाव को लेके नहीं भी हुई हैं तो भी लोगों में भय ज़रूर फैलेगा, और अगर कुछ नहीं तो मतदान पे असर ज़रूर डालेंगी ये हत्याएं.’

दूसरी बाधा यह है कि भले ही सुरक्षा अधिकारी यह कहते और मानते हों कि मिलिटेंट्स का मनोबल उनके कमांडरों के मारे जाने से कम हो गया है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि मिलिटेंट्स अभी भी ठीक-ठाक संख्या में हैं और सक्रिय हैं. एक सुरक्षा सूत्र ने सत्याग्रह को बताया कि सिर्फ दक्षिण कश्मीर में 200 से ज़्यादा मिलिटेंट्स अभी सक्रिय हैं.

इस सूत्र का कहना था, ‘और ये सिर्फ स्थानीय मिलिटेंट्स हैं, क्योंकि पाकिस्तान से आने वालों की हमारे पास ज़्यादा जानकारी नहीं होती है. और इनमें कम से कम नौ ऐसे कमांडर शामिल हैं जो पिछले 5-6 साल से सक्रिय हैं. ये लोग ज़रूर बाधा डालेंगे चुनाव में.’ इस सूत्र के मुताबिक यही वजह है कि इस बार सुरक्षा विभागों को थोड़ा और चौकन्ना रहना पड़ेगा.

आक्रोश

सरकार इन सब चीजों का फिर भी प्रबंध कर लेगी, लेकिन एक और चीज़ है जिसकी आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता है. और वह है पुलवामा हमले के बाद लोगों में आक्रोश के चलते चुनाव विरोधी प्रदर्शन होने का खतरा. पुलवामा हमले के फौरन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे कश्मीर में सुरक्षा बलों को खुली छूट दे रहे हैं. कश्मीर में जमीनी सतह पर देखा जाये तो यह छूट सुरक्षा बलों को मिलती दिखाई दी है.

इस का सबसे सटीक नमूना कश्मीर में इस समय हाइवे पर सफर करते लोगों को मिल रहा है, जहां घंटों गाड़ियां खड़ी रहती हैं इस इंतज़ार में कि कब सुरक्षा बल उनको आगे बढ़ने की अनुमति दें. आलम यह है कि करीब एक हफ्ते तक दुहाई देने के बाद स्कूल बसों और एंबुलेंसों को सुरक्षा बलों के काफिले के दौरान चलने-फिरने की अनुमति मिली है.

अपनी टैक्सी चलाने वाले जावेद अहमद कहते हैं, ‘लोग बौखलाए हुए हैं, और क्यों न हों. अनंतनाग से श्रीनगर पहुंचने में जहां पहले 45 मिनट लगते थे, अब ढाई घंटे लगते हैं. रोज़ कहीं न कहीं लोगों और सुरक्षा बलों में तकरार होती है.’ दूसरी तरफ हाल ही में शोपियां और पुलवामा जिले में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों से सख्ती से पेश आने के मामले भी सामने आए हैं.

खालिद गुल कहते हैं, ‘मसला यह है कि वोटर भी यही लोग हैं और कल को चुनाव भी इन्हीं के बीच कराने हैं. इनमें आक्रोश इतना ज़्यादा है कि यह कहीं सड़कों पर न निकल आएं. और अगर ये सड़कों पर उतर आए तो चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा.’

हालांकि सेना ने इस तरह के अंदेशों को खारिज किया है. हाल में श्रीनगर के बादामी बाग कैंटोनमेंट में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सेना के एक आला अफसर ने कहा कि इस तरह की बातें ‘प्रोपेगेंडा’ हैं.

हालांकि इस तरह के आक्रोश को हवा देती एक और घटना कुछ ही दिन पहले घटी है. पुलवामा जिले के अवन्तीपोरा इलाके में 30 साल के एक शिक्षक की पुलिस हिरासत में ‘हत्या’ हो गई. साफ तौर पर इस घटना ने लोगों का आक्रोश और बढ़ा दिया है. सवाल यह है कि ऐसे में अगर चुनाव हो भी जाते हैं तो क्या वे हिंसा से मुक्त हो पाएंगे?