शुक्रवार को बिहार में महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे का एलान कर दिया गया. इसके तहत राजद को 20 और कांग्रेस को नौ सीटें दी गई हैं. वहीं, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को पांच, जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को तीन-तीन सीटें दी गई हैं. बताया जाता है कि राजद के चुनावी चिह्न पर शरद यादव और सीपीआई-एम के उम्मीदवार को एक-एक सीट पर लड़ाने की तैयारी है. साथ ही, लोकसभा चुनाव के बाद शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रक जनता दल का विलय राजद में किया जाएगा.

लोकसभा चुनाव में किसे कितनी सीटें मिलें, इसे लेकर महागठबंधन में कई दिनों से आपसी खींचतान चल रही थी. अब यह मुद्दा सुलझ जाने के बाद सभी दल चुनाव अभियान की कवायद को आगे बढ़ा सकते हैं. हालांकि इस सीट बंटवारे को लेकर कई बातें और सवाल सामने आए हैं.

रालोसपा, ‘हम’ और वीआईपी को अधिक तवज्जो क्यों?

रालोसपा, ‘हम’ और वीआईपी को कुल मिलाकर 40 में से 11 सीटें दी गई हैं. यह कांग्रेस के हिस्से आई नौ सीटों से दो अधिक है. पहले कांग्रेस ने 11 सीटों की मांग की थी. लेकिन उसकी मांग को आखिरकार दरकिनार कर दिया गया. वहीं, पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 12 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि उसे सिर्फ दो सीटों, किशनगंज और सुपौल पर जीत नसीब हुई थी.

साल 2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से इन दलों की स्थिति थोड़ा और साफ होती है. सबसे पहले इनमें वीआईपी की बात करते हैं. विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी की स्वतंत्र रूप से अपनी कोई पार्टी नहीं थी. इसकी स्थापना नवंबर, 2018 में हुई. वहीं, ‘हम’ केवल अपने सुप्रीमो जीतनराम मांझी की सीट बचा पाई और रालोसपा केवल दो सीटें जीतने में कामयाब रही. उस वक्त ये दोनों पार्टियां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल थीं. इन्होंने क्रमश: 21 और 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. वहीं, कांग्रेस के 41 में से 27 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी. इन 41 सीटों पर इस राष्ट्रीय पार्टी का वोट प्रतिशत 39.5 फीसदी था.

विधानसभा के अलावा यदि 2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो एनडीए के घटक दल के रूप में रालोसपा ने चार में से तीन सीटों पर जीत हासिल की थी. इन पर पड़े कुल वोटों में से उसे तीन फीसदी वोट मिले थे. वहीं, मुकेश सहनी ने एनडीए का समर्थन किया था. इसके अलावा जीतनराम मांझी ने 2015 में जदयू से अलग होकर अपनी पार्टी का गठन किया था. दूसरी ओर, कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं और इसका वोट शेयर 8.56 फीसदी था.

इन सारे आंकड़ों व तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि रालोसपा, ‘हम’ और वीआईपी को महागठबंधन में बनाए रखने के लिए उन्हें कांग्रेस के मुकाबले अधिक तवज्जो दी गई. हालांकि, कांग्रेस के एक नेता को राज्यसभा में भेजने की बात कहकर इसके नुकसान को कम करने की कोशिश की गई है.

क्या सीटों के बंटवारे के बहाने महागठबंधन के भीतर की रस्साकशी सामने आ गई?

बताया जाता है कि महागठबंधन के भीतर सीटों का बंटवारा बीती 19 मार्च को ही तय हो गया था. इसके बाद भी इसका एलान नहीं किया गया. वहीं, तीन दिन बाद शुक्रवार को इसकी घोषणा तो की गई, लेकिन चार सीटों (गया, औरंगाबाद, नवादा और जमुई) को छोड़ कर बाकी किसी भी सीट के लिए उम्मीदवारों के नामों का एलान नहीं किया गया. इसकी वजह कई सीटों पर एक से अधिक पार्टियों की दावेदारी बताई जा रही है.

उदाहरण के लिए, दरभंगा की सीट को लेते हैं. कांग्रेस इस सीट पर कीर्ति आजाद को लड़वाना चाहती है. लेकिन वीआईपी के प्रमुख मुकेश सहनी भी यहां से अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं. इस टकराव का कारण यह है कि पिछली बार कीर्ति आजाद ने भाजपा की ओर से यहां जीत हासिल की थी लेकिन, इसमें मुकेश का समर्थन भी शामिल था.

सीटों को लेकर महागठबंधन के भीतर की रस्साकशी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखने को मिली. जब राजद के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता मनोज झा इन सीटों का एलान कर रहे थे, तो उनके बगल में बैठे बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा ने उन्हें बीच में रोका था. सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो में कांग्रेस नेता उन्हें औरंगाबाद सीट के उम्मीदवार के नाम का एलान टालने के लिए कहते हुए दिखे. इसके जवाब में राजद प्रवक्ता ने मैथिली भाषा में कहा, ‘गड़बड़ हो जाएगा. अब फैसला हो गया है.’ इस बातचीत में बिहार कांग्रेस अध्यक्ष के चेहरे पर एक तरह का दबाव साफ-साफ दिख रहा था.

दरअसल, औरंगाबाद सीट पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जाती है. साल 2004 में यहां से उसके उम्मीदवार निखिल कुमार ने जीत हासिल की थी. इस बार भी उनकी प्रबल दावेदारी मानी जा रही थी. लेकिन महागठबंधन की ओर से इस बार के चुनाव में ‘हम’ उम्मीदवार उपेंद्र प्रसाद को उतारा गया है. शुक्रवार की घोषणा से पहले निखिल कुमार के समर्थकों ने अपने नेता का नाम काटने को लेकर पटना स्थित कांग्रेस कार्यालय में काफी बवाल किया था. इस पर उस वक्त मदन मोहन झा का कहना था कि अब तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, इसलिए कार्यकर्ताओं को नाराज नहीं होना चाहिए. जानकारों के मुताबिक इन सारी बातों से यह साफ दिख रहा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है.

खुद की पार्टी होते हुए शरद यादव राजद के टिकट पर चुनाव क्यों लड़ रहे हैं?

बीते साल शरद यादव ने जदयू से अलग होने के बाद अपनी अलग पार्टी लोकतांत्रक जनता दल का गठन किया था. इसके बाद उनका राजद के साथ आना करीब-करीब तय था. लेकिन, इस चुनाव में उनका अपनी पार्टी से न लड़कर राजद के चुनावी चिह्न पर लड़ना चौंकाने वाला है. साथ ही, यह बात भी सवालिया निशान खड़ा करती है कि जब शरद यादव बतौर राजद प्रत्याशी चुनावी दंगल में उतर ही रहे हैं तो अपनी पार्टी का राजद में विलय उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद क्यों तय किया है?

महागठबंधन में सीपीआई-एमएल को भी जगह दी गई है. लेकिन इसके भी उम्मीदवार को शरद यादव की तरह राजद की टिकट पर मैदान में उतरना होगा. राजद सूत्रों के मुताबिक पार्टी 20 सीटों से कम पर नहीं लड़ना चाहती थी. माना जा रहा था कि इससे कम पर उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल में गिरावट आ सकती थी. साथ ही, इससे उसके राजनीतिक रूप से कमजोर होने का भी संकेत जा सकता है. इन बातों को ध्यान में रखते हुए सीटों की संख्या 20 तो रखी गई लेकिन, इसमें शरद यादव और सीपीआई-एमएल की उम्मीदवारी भी शामिल कर ली गई. इसके अलावा अन्य लेफ्ट पार्टियों- सीपीआई और सीपीएम को महागठबंधन में शामिल न करने को भी एनडीए के खिलाफ एकता में दरार के तौर पर देखा जा रहा है.