गीतकार गुलज़ार ने फिल्म और साहित्य की दुनिया के अपने साथी जावेद अख्तर को समर्पित एक कविता लिखी है. महज तीन छंदों वाली उनकी यह कविता जावेद साहब की उस कविता का जवाब है जो उन्होंने पिछले दिनों एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान सुनाई थी. दरअसल, इसी महीने दिल्ली में आयोजित मुशायरे में जावेद अख्तर ने अपनी एक अप्रकाशित कविता सुनाई थी जिसमें उन्होंने तमाम कवियों को अपनी आवाज बुलंद करने के लिए कहा था. इसके साथ ही मौजूदा दौर की तरफ इशारा करते हुए इस बात की जरूरत जताई थी कि क्या लिखा जाना चाहिए और क्या लिखने से छूटा जा रहा है. गुलज़ार की क़लम से निकला इसका खूबसूरत जवाब कुछ इस तरह है, जो सबसे पहले सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन पर प्रकाशित हुआ था.

जावेद अख्तर के नाम

जादू, बयान तुम्हारा, और पुकार सुनी है
तुम ‘एकला’ नहीं, हमने वो ललकार सुनी है

बोली लगी थी कल, कि सिंहासन बिकाऊ थे
नीलाम होती कल, सर-ए-बाज़ार सुनी थी

तुम ने भी खून-ए-दिल में डुबोई हैं उंगलियां
हमने क़लम की पहले भी झंकार सुनी है

राजनीतिक और सामाजिक तौर पर खासे सक्रिय रहने वाले जावेद अख्तर अपने गीतों और कविताओं के जरिए अपने हिस्से का सच कहते रहते हैं. इसके अलावा उनके बयान और भाषणों से भी अलग-अलग विषयों पर खरी और मुखर राय पता चलती है. फिलहाल, उनकी यह कविता फैज अहमद फैज या मिर्जा ग़ालिब की तरह क़लम से अपने वक्त का सही हाल बताने वाली परंपरा की अगली कड़ी लगती है और इसी का जवाब गुलज़ार साहब ने अपनी कविता (ऊपर) से दिया है -

जो बात कहते डरते हैं सब, तू वो बात लिख
इतनी अंधेरी थी ना कभी पहले रात, लिख

जिनसे क़सीदे लिखे थे, वो फेंक दे क़लम
फिर खून-ए-दिल से सच्चे कलाम की सिफ़त लिख

जो रोज़नामचे में कहीं पाती नहीं जगह
जो रोज़ हर जगह की है, वो वारदात लिख

जितने भी तंग दायरे हैं सारे तोड़ दे
अब आ खुली फिज़ाओं में, अब कायनात लिख

जो वाक़यात हो गए उनका तो जिक्र है
लेकिन जो होने चाहिए, वो वाक़यात लिख

इस जगह में जो देखनी है तुझ को फिर बहार
तू डाल-डाल दे सदा, तू पात-पात लिख