‘फॉरेस्ट गम्प’ को अमेरिकी सिनेमा की सर्वाधिक चर्चित और पसंदीदा फिल्मों में गिना जाता है. आमिर खान जिस फिल्म को ‘लाल सिंह चड्ढा’ नाम से रीमेक करने की हिम्मत दिखा रहे हैं उसने साल 1995 में अमेरिकी सिनेमा में मील का पत्थर कही जाने वाली दो फिल्मों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण ऑस्कर पुरस्कार जीता था. ये फिल्में थीं सिनेमा का चेहरा आगे चलकर बदल देने वाली टेरंटिनो की ‘पल्प फिक्शन’ और दुनिया की महानतम फिल्मों में गिनी जाने वाली ‘द शॉशेंक रिडेम्पशन’.

इन तीन फिल्मों में सबसे बेहतर फिल्म कौन-सी है यह बहस तो अमरता ओढ़कर चलती रहेगी. लेकिन टॉम हैंक्स अभिनीत ‘फॉरेस्ट गम्प’ आम दर्शकों के लिए हमेशा दिल के करीब रहने वाली इमोशनल फिल्म रही है. रिलीज के साल 1994 में इसे इतना ज्यादा पसंद किया गया था कि 677 मिलियन डॉलर की अथाह कमाई कर यह अमेरिका में ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी. अमेरिकी फिल्मों में हमेशा से दिलचस्पी रखने वाले आज के ज्यादातर प्रौढ़ हिंदुस्तानी दर्शकों ने भी इसे कभी न कभी देखा और प्यार किया ही होगा. कई युवा हिंदुस्तानी दर्शकों के दिल में इस फिल्म के भोले-भाले नायक ने अमिट छाप छोड़ी होगी और कईयों के लिए टॉम हैंक्स का जादू इसी फिल्म से सर चढ़कर बोलना शुरू हुआ होगा. आज तक इसे नहीं देख पाए युवा और प्रौढ़ दर्शकों के लिए भी यह फिल्म चिरयुवा ही मालूम होती है और 2019 तक में ढूंढ़ने पर भी इसके जादू की एक्सपायरी डेट नहीं मिलती!

इसके कई संवाद लोगों की जबान पर आज भी चढ़े मिलते हैं (खासकर ‘रन फॉरेस्ट रन!’, ‘स्टूपिड इज एज स्टूपिड डज’, ‘लाइफ इज लाइक अ बॉक्स ऑफ चॉकलेट्स’) और ‘अमेरिकीपन’ में सर से पांव तक डूबी इस ‘दौड़ती’ फिल्म से जुड़ी कई चीजें लंबे समय तक अमेरिकी पॉप कल्चर का हिस्सा बनी रही हैं. समाज में चलन के हिसाब से नए शब्दों का लेखा-जोखा रखने वाली अर्बन डिक्शनरी तक में ‘फॉरेस्ट गम्प’ नाम का शब्द एक नयी परिभाषा हासिल कर चुका है जो कि समाज पर इस फिल्म के पड़े प्रभाव से गढ़ी गई है.

इस फिल्म की पटकथा में शामिल झींगे (श्रिम्प) वाले एक सब-प्लॉट से प्रभावित होकर अमेरिका भर में कई ‘बूबा गम्प’ नाम के रेस्टोरेंट तक खुले हुए हैं! बूबा, फिल्म में टॉम हैंक्स के पात्र फॉरेस्ट गम्प का अश्वेत दोस्त था जिसे झींगा पकड़ने का अपना पारिवारिक व्यवसाय छोड़कर वियतनाम युद्ध में शामिल होना पड़ता है. उसकी मौत के बाद गम्प उसे दिया एक वचन पूरा करने समंदर में उतर जाता है.

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शीशे की तरह साफ दिल रखने वाले एक मंदबुद्धि नायक की सीधे दिल में उतरने वाली कहानी कहने वाली ‘फॉरेस्ट गम्प’ ऐतिहासिक घटनाओं के इर्द-गिर्द अपनी काल्पनिक कहानी बुनने की वजह से भी खासी प्रशंसित रही है. पचास के दशक से लेकर अस्सी के दशक के अमेरिका में घटी कई मुख्य घटनाएं जैसे जादुई यथार्थवाद की टेक लेकर फॉरेस्ट गम्प नामक नायक के जीवन का हिस्सा बनाई गईं, और इसी ने शायद फिल्म को नख से लेकर शिख तक उस ‘अमेरिकीपन’ में डुबा दिया जिसे कि दशकों से अमेरिकी, गैर-अमेरिकी दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं.

अमेरिका की राष्ट्रीय लाइब्रेरी का दर्जा रखने वाली लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस ने 2011 में अपनी नेशनल फिल्म रजिस्ट्री के अंतर्गत इस पॉपुलर फिल्म को संरक्षित करने का फैसला लिया था. उस वक्त ऐसा करने की वजह बताते हुए जो कहा गया वो अमेरिकी संदर्भ में इस फिल्म की एकदम सटीक व्याख्या भी है - ‘सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और कलात्मक रूप से एक महत्वपूर्ण फिल्म.’

फिल्म में फॉरेस्ट गम्प जॉन लेनिन, एल्विस प्रेस्ली जैसी मशहूर शख्सियतों से लेकर कैनेडी और निक्सन को मिलाकर तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों से भी मिलता है और वियतनाम युद्ध, वॉटरगेट स्कैंडल जैसे अमेरिकी इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाने वाली कई घटनाओं में सक्रियता से भागीदारी करता हुआ पाया जाता है. लेकिन इस तरीके का उपयोग चीप ह्यूमर पैदा करने के लिए नहीं बल्कि गम्प की मार्मिक कहानी को परी-कथा वाली रूमानियत और ‘होप’ देने के लिए किया जाता है. एक सीधा-सादा अमेरिकी नायक बीसवीं सदी के लगभग आधे अमेरिकी इतिहास से होकर गुजरता है और उस दौर के अमेरिका की मुश्किलों, आंदोलनों, कठिन बदलावों से होकर गुजरने के बावजूद विजयी होकर ‘ग्रेट अमेरिका’ की अवधारणा को मजबूती देता है.

बाद के वर्षों में तो ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी काल्पनिक कहानियों में पिरोना लगभग चलन ही बन गया था. हमारे यहां भी पंकज कपूर निर्देशित ‘मौसम’ (2011) जैसी कई हिंदी फिल्मों ने गंभीर या फिर हल्के-फुल्के अंदाज में हिंदुस्तान की ऐतिहासिक घटनाओं की टेक लेकर अपने नायकों की कथा कही है. ‘फॉरेस्ट गम्प’ की खास बात थी कि वह विंस्टन ग्रूम के इसी नाम के जिस नॉवल (1986) पर आधारित थी उसका नायक तो कई और भी रोमांचक यात्राओं का हिस्सा बना था. लेकिन फिल्म ने सिर्फ उन हैरतअंगेज घटनाओं को पटकथा में शामिल किया जिसे कि दर्शक पचा सकें.

नहीं तो किताब वाला गम्प गांजा पीने से लेकर नासा के लिए काम करते-करते एक वनमानुष के साथ अंतरिक्ष की यात्रा तक कर आया था! शतरंज का चैंपियन बनने से लेकर पेशेवर पहलवान और हॉलीवुड फिल्मों में स्टंटमैन तक बन गया था और नरभक्षियों के साथ कपास की खेती तक कर आया था! फिल्म ने यह सब न दिखाकर किताब की तुलना में पटकथा को ज्यादा व्यावहारिक रखा और जादुई यथार्थवाद का केवल उतना प्रयोग किया जिससे कि फिल्म का जादू कायम रह सके! किताब के विशालकाय और मजबूत नायक की तुलना में अपने सामान्य कद-काठी के नायक को ज्यादा मानवीय भी बनाया, और इसी ने शायद सबसे बड़ा फर्क पैदा किया. सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर जीतने वाले टॉम हैंक्स के भोलेपन ने फिल्म को नई ऊंचाइयां दीं.

आमिर खान को जाहिर तौर पर ‘फॉरेस्ट गम्प’ को ‘लाल सिंह चड्ढा’ में तब्दील करते समय यह अमेरिकीपन हटाकर फिल्म को ‘हिंदुस्तानीपन’ से लबरेज करना होगा. तभी यह कहानी काम करेगी और तभी मंदबुद्धि नायक की मार्मिक निजी कहानी का फैलाव वृहदता ओढ़ेगा. वे शर्तिया हिंदुस्तान के लिए महत्वपूर्ण रही ऐतिहासिक घटनाओं को पटकथा में शामिल करेंगे और देखना दिलचस्प होगा कि चालीस-पचास साल के फैलाव वाली कहानी के लिए वे किस कालखंड और उस कालखंड की किन महत्वपूर्ण घटनाओं को चुनते हैं.

इस घोर राजनीतिक समय में कारगिल युद्ध, गोधरा कांड, बाबरी मस्जिद विध्वंस, सर्जिकल स्ट्राइक्स जैसी घटनाओं में से किन-किन को अपनी फिल्म से दूर रखते हैं और मूल फिल्म की तर्ज पर किन-किन हिंदुस्तानी प्रधानमंत्रियों के साथ वाले दृश्य फिल्म में जीवंत करते हैं! (‘फॉरेस्ट गम्प’ को मिले छह मुख्य ऑस्कर पुरस्कारों में से एक बेस्ट विजुअल इफेक्ट्स का भी था. इस फिल्म ने पुराने अमेरिकी राष्ट्रपतियों से लेकर स्वर्गवासी हो चुके जॉन लेनिन जैसी शख्सियतों की पुरानी फुटेज में टॉम हैंक्स को शामिल किया था और उस दौर के लिए नायाब इस कम्प्यूटर कारीगरी के लिए फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार से नवाजा गया था.)

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अपने 54वें जन्मदिन के दिन प्रेस कॉन्फेंस में जब आमिर खान ने ‘लाल सिंह चड्ढा’ की घोषणा की थी तो साफ कहा था कि उन्हें ‘फॉरेस्ट गम्प’ की ‘स्क्रिप्ट’ हमेशा से पसंद रही है. मूल किताब का नाम उन्होंने नहीं लिया, जो कि बॉलीवुड के काम करने के तरीके को ही एक बार फिर सामने लाता है. हमारे यहां किताबों पर फिल्में कम बनती हैं और विदेशी फिल्मों की आधिकारिक या अनाधिकारिक रीमेक बनाने में दिलचस्पी ज्यादा ली जाती है. ऐसा करने पर बेहद आसानी से विजुअल रेफरेंस फिल्मकारों और एक्टरों को मिल जाते हैं और थोड़ा-बहुत हेरफेर कर वे हिंदुस्तानी दर्शकों को आसानी से रिझा लेते हैं. सुजॉय घोष की ‘बदला’ का उदाहरण हमारे सामने है ही!

रॉबर्ट जमैकस निर्देशित ‘फॉरेस्ट गम्प’ टॉम हैंक्स की शुरुआती सफल फिल्मों में भी गिनी जाती है (‘स्लीपलेस इन सिएटल’ और ‘फिलाडेल्फिया’ के बाद) और उस वक्त इस सितारे की उम्र कोई 38 साल रही होगी. फिल्मी परदे पर इस उम्र के सितारे युवा ही नजर आते हैं और ‘फॉरेस्ट गम्प’ भी एक युवा नायक की ही कहानी थी. ‘लाल सिंह चड्ढा’ में जब 54 वर्षीय आमिर खान इस रोशन चेहरे वाले युवा पात्र की भूमिका निभाएंगे - जो कि बचपन से लेकर 35-40 साल तक का सफर कहानी में तय करता है - तो मानकर चलिए कि वे ‘3 इडियट्स’ के रैंचो वाले स्पेस में जाकर ही इस भूमिका को अदा करेंगे. यह काफी खतरनाक संभावना है, क्योंकि महानता का दर्जा रखने वाली एक सर्वप्रिय फिल्म की मौलिक शुद्धता और सुंदरता से छेड़छाड़ करने सरीखा है.

पता नहीं इस तरह का शब्द हिंदी भाषा में कितना उपयोग होता है, लेकिन ‘प्योरिटी ऑफ द ओरिजनल’ एक तथ्य तो है ही. किताब आधारित होने के बावजूद सिनेमा कई बार ऐसी ‘मौलिक शुद्धता’ लिए होता है कि जिसे दोहराना आमिर खान जैसे कर्मठ अभिनेता के लिए भी मुमकिन नहीं लगता. उनपर इतना भरोसा तो है कि वे अपने रीमेक को एक दर्शनीय फिल्म जरूर बना देंगे, 20 किलो वजन कम करने का वादा कर वे किरदार के प्रति समर्पण को भी जाहिर कर चुके हैं, लेकिन ‘फॉरेस्ट गम्प’ का स्तर छू पाना शायद उनके लिए भी मुमकिन नहीं होगा. ‘लाल सिंह चड्ढा’ ही क्या, दुनिया का कोई भी रीमेक ‘फॉरेस्ट गम्प’ की मौलिक शुद्धता और सुंदरता की बराबरी नहीं कर सकता.

फिर ‘लाल सिंह चड्ढा’ में आमिर बन भी सरदार रहे हैं, और एक साफ दिल लेकिन मंदबुद्धि नायक को बॉलीवुड अक्सर सरदार के रोल में ही स्टीरियोटाइप करता आया है. यह ह्यूमर पैदा करने का बेहद आसान तरीका है और बॉलीवुड की तंग मानसिकता से निकला चरित्र-चित्रण मालूम हो रहा है. टॉम हैंक्स ने जिस किरदार को मौलिक अंदाज में अभिव्यक्त कर महान बनाया, डर है कि कहीं आमिर खान उसे सरदार बनाकर उसपर कई सारे बॉलीवुड क्लीशे न लाद दें.

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सर्वप्रिय और मॉडर्न क्लासिक होने के बावजूद ‘फॉरेस्ट गम्प’ आलोचनाओं के परे नहीं है. इसे पसंद करने वाले दर्शकों के लिए कभी यह कॉमेडी है कभी घोर ड्रामा. कभी फैंटेसी की उड़ान भरने वाली एक परी-कथा है. कभी इस सिनिकल दुनिया पर जीत हासिल करने के लिए मासूमियत और अच्छाई की जरूरत का उदाहरण है. कभी युद्ध की विभीषिका का एक और सिनेमाई दस्तावेज है. कभी टॉम हैंक्स के अद्भुत अभिनय से जीवंत हुआ मानवीय करूणा का स्तुतिगान है. लेकिन, कई आलोचक दृष्टियों के लिए यह रुढ़िवादी राजनीतिक रुझान वाला पलायनवादी सिनेमा भी है.

इसकी फील-गुड प्रवृत्ति के चलते इसे पसंद करने वाले समीक्षक तक इसके रुढ़िवादी रुझानों को रेखांकित करना नहीं भूलते. कू क्लक्स क्लैन से लेकर ब्लैक पैंथर पार्टी और एंटी-वॉर आंदोलन के चित्रण की आलोचना होती रही है. फिल्म साठ के दशक के अमेरिकी हिप्पी कल्चर को भटके हुए युवाओं का जमावड़ा भी मानकर चलती है और अपने श्वेत नायक गम्प के माध्यम से यह स्थापित करती दिखती है कि जो शख्स ‘आदेश’ मानता है और ‘यस सर’ कहने में तत्परता दिखाता है वो अच्छा व सफल अमेरिकी है.

फिल्म अपनी हिप्पी नायिका जैनी (रॉबिन राइट) के सफर के माध्यम से जैसे उस वक्त के प्रोग्रेसिव ‘काउंटर कल्चर’ की आलोचना करती है और हिप्पी कल्चर से लेकर युद्ध विरोधी आंदोलनों को भटके हुए अमेरिकी युवाओं से जोड़ने की कोशिश करती मालूम होती है. 2011 में तो इसे एक अमेरिकी सूची ने चौथी सर्वश्रेष्ठ ‘कंजरवेटिव’ (रुढ़िवादी) फिल्म तक का सम्मान दिया था!

जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तब अमेरिकी राजनीति में डेमोक्रैट्स पीछे हो गए थे और रूढ़िवादी रिपब्लिकन पार्टी का वर्चस्व बढ़ रहा था (आज की ही तरह). इसलिए कई आलोचक उस दौर की संकीर्ण दक्षिणपंथी राजनीति को भी फिल्म के नायक गम्प में मौजूद पाते हैं.

‘फॉरेस्ट गम्प’ वियतनाम युद्ध पर भी सीधे-सीधे प्रहार नहीं करती. किताब में तो कई जगह नायक इस युद्ध की सीधी आलोचना करता है (‘अ बंच ऑफ शिट’) लेकिन सैनिकों पर युद्ध के पड़ते दुष्परिणामों को दिखाने के बावजूद फिल्म कभी भी सीधे तौर पर वियतनाम युद्ध पर आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं करती. आलोचकों को यह कमी इसलिए भी अखरती है क्योंकि फिल्म के एक मशहूर सीन में गम्प हजारों की तादात में इकट्ठा हुए युद्ध विरोधी अमेरिकियों के बीच वियतनाम वॉर की सच्चाई बताने जा रहा होता है कि तभी कोई स्पीकर के तार निकाल देता है. वहां मौजूद अमेरिकियों की तरह ही फिल्म देखने वाला दर्शक भी नहीं सुन पाता कि युद्ध की विभीषिका भोगने वाला नायक इस बेमतलब के युद्ध के बारे में क्या सोचता है. कई आलोचक इस मशहूर सीन को महान फिल्म ‘फॉरेस्ट गम्प’ की पलायनवादी प्रवृत्ति से जोड़कर देखते हैं.

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(‘फॉरेस्ट गम्प’ को आप इन दिनों एमेजॉन प्राइम वीडियो पर भी देख सकते हैं)