इसी संग्रह की कविता ‘कोई खून होगा इस रात’ का एक अंश -

‘मैं उनमें नहीं था जो मारे गये कल रात / उनमें भी नहीं जिनके घर ढहाए गये भरी बरसात
वह स्त्री भी नहीं जिसे नंगे घुमाया गया सरे बाजार / वह किशोर भी नहीं जिसे पुलिस ले गई नींद से खींचकर / न मेरा काम छूटा न पगार रुकी / न मुझे काम छोड़ भागना पड़ा दूर परदेस से / न मेरा घर डूबा बाढ़ में न खेत पड़े सुखाड़ में / मैं वो भी नहीं जिसकी झोपड़ी के नीचे खान है यूरेनियम की / और वो गल रहा तिल...तिल कंगाल / मैं कर्ज में डूबा वो विवश गृहस्थ भी नहीं / वो भी नहीं जो घर में बन्द है इसलिए कि / उसकी इकलौती पतलून सूख रही खिड़की पर धूप में / फिर मुझे क्यों लग रहा है कि अभी रात है / सुनसान काले बादल, भारी अन्धकार और मेरी सांस घुट रही है छाती पर पत्थर / क्यों लग रहा है कोई खून होगा इस रात’


पुस्तक : योगफल

लेखक : अरूण कमल

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

कीमत : 150 रुपए


किसी भी समाज के निम्न वर्गीय एक आदमी के जीवन का कुल योगफल अनंत भूख, बुनियादी सुविधाओं का अनवरत इंतजार, बेसमय साध्य बीमारियों से मौत है! यह इंसान जीवनभर सबसे ऐसा व्यवहार पाता है जैसे वह दुनिया का सबसे गैरजरूरी व्यक्ति हो! इस इंसान की जिंदगी में खास चीजें सपनों सी होती हैं क्योंकि वहां आम चीजों को पाने के संघर्ष में ही सारी ऊर्जा निचुड़ जाती है. अरुण कमल का यह कविता संग्रह ‘योगफल’ इसी बेहद मामूली आदमी के जीवन, उसके संघर्ष और जीवन जीने के लिए लड़े जाने वाले अंतहीन युद्ध को समर्पित हैं. आम और मामूली लोगों को लेकर लिखी गई ये बेहद खास कविताएं हैं जो अपने मर्म से भीतर तक छूती हैं.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोकपाल की नियुक्ति राजनीतिक शिगूफा ज्यादा बनकर रह गया है. एक व्यक्ति की नियुक्ति से भ्रष्टाचार का स्तर बहुत कम हो जाएगा या उसकी नियुक्ति न होने से लोग ज्यादा ही घूसखोरी करते रहेंगे, यह बात सीधे-सीधे गले नहीं उतरती. असल में देश में भ्रष्टाचार का दैत्य एक अकेले लोकपाल से काबू में नहीं आने वाला है. हर एक व्यक्ति अपने भीतर कोई लोकपाल नियुक्त करे तो ही जड़ से लेकर चोटी तक भ्रष्टचार में डूबे सिस्टम में कुछ उम्मीद जग सकती है. असल में देश में कुछ हद दर्जे के ईमानदार लोग आज भी हैं, लगता है जैसे उन्हीं की बदौलत ये पूरा सिस्टम थमा हुआ है. अरुण कमल ऐसे ही लोगों को ‘लोकपाल’ नामक कविता में अपना सलाम भेजते हुए लिखते हैं –

‘उसको सलाम / उस रिक्शेवाले को सलाम / जो कल मेरा छूटा थैला दे गया घर पर / उस कूड़ा बीनते बच्चे की जै / जिसने बम देखा फटने से पहले / उस मिस्त्री मजदूर को वन्दे / जिसने कहा, आप दस टका ज्यादा दे रहे हैं सर / उस बाई को नमन जिसने गिरी अगूंठी / ढूंढ़कर दी आज प्रातः / उन दो नौजवानों को प्रणाम / जो बारिश में भीगते / ढंक रहे है पत्थर से सड़क का मैनहोल / ये ही मेरे लोग मेरे लोक मेरे लोकपाल / मेरे नगरपति के भव्य भाल.’

आमतौर पर पुरुष स्त्री को पुरुष की तरह ही प्यार करते हैं या करना चाहते हैं. वे इस ख्याल से अक्सर दूर ही रहते हैं कि स्त्री की प्रेम की बुनियादी जरूरत क्या है. या फिर वे क्या चीजें हैं जो किसी स्त्री को ज्यादा सहज कर सकती हैं या फिर प्रेम को ज्यादा तीव्र अहसास से भर सकती हैं. अरुण कमल एक कविता में अपनी प्रेमिका को उसी सहजता और प्रेम की तीव्रता से भरने के लिए उसे पुरुष होते हुए भी एक स्त्री की तरह प्रेम करना चाहते हैं! उनके यही भाव उस कविता को प्रेम की गहनता से लबालब भर देते हैं. उसी का उदाहरण –

‘जैसे एक बड़ी उम्र की स्त्री अपने से बहुत छोटी स्त्री को प्यार करती है / जैसे सारी स्त्रियां मिलकर एक किशोरी की रक्षा करती हैं / मैं ऐसी बाड़ होना चाहता हूं जो तुम्हें घेर कर रहे / वैसे ही / जिसे एक दिन ढा दें खुद तुम्हारी टहनियां शाखें / अपने पहले फूल धरती पर ढारतीं - / जैसे दूर एक बादल के गुजरने को घास जान जाती है / जैसे बाहर हवा चलने को कमरे में खूंटी पर टंगी कमीज / जान जाती है / वैसे ही बहुत दूर / अनेक प्रकाश वर्ष दूर टिमटिमाता / मैं तुम्हें जानू.’

युद्ध बुरी चीज है क्योंकि यह मानवता के लिए खतरा है. लेकिन दुनिया में ऐसे असंख्य युद्ध हर वक्त लड़े जा रहे हैं जिनका अस्तित्व ही मानव और मानवता को बचाने की खातिर है! ऐसे युद्ध लड़ने वाले सिपाही न तो कहीं भर्ती होते हैं, न कोई खास वर्दी पहनते हैं, न ही कोई खास मुल्क उनका दुश्मन होता है. असल में ये सिपाही हैं दुनिया के आम लोग जो कभी बाढ़, कभी दंगे, कभी आगजनी, तो कभी हिंसा के खिलाफ अनवरत युद्ध लड़ने को अभिशप्त हैं. ऐसे ही भावों को मार्मिकता से व्यक्त करती है उनकी कविता ‘अंतिम युद्ध’. उसी की पंक्तिया –

‘अभी जब इतनी तेज बारिश हो रही है / तब मैं उन लोगों के बारे में सोच रहा हूं / जो अपने डूबे घरों के छप्पर पर बैठे हैं / और पानी चढ़ता जा रहा है / ऐसा भी होता है जब / पानी तुम्हें घेर लेता है / जब जलते घर में दिखता नहीं द्वार / कहीं बचता नहीं निकास का लाल निशान / ऐसा भी होता है जब देह / लड़ती है अन्तिम युद्ध अकेले सांस-सांस / जन परिजन सब हाथ बांध खड़े निष्पक्ष.’

संग्रह की बहुत लंबी कविता ‘प्रलय’ को पढ़ते हुए लगता है जैसे वह एक डूबते जहाज में बैठे अंतिम व्यक्ति का अंतिम चीत्कार है! वह चीत्कार जितना अभिव्यक्त कर पाती है उससे कहीं ज्यादा अनकहा छोड़कर पानी में डूब जाती है और अपने पीछे सदियों तक चलने वाला शोक छोड़ जाती है. अरुण कमल की ये कविताएं असंख्य लोगों के कहे-अनकहे डर, क्षोभ, संत्रास, तनाव को शब्द देती हैं. इन भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति पाठकों को इस कदर महसूस होती है कि वह खुद अपने आस-पास की अदृश्य धमकियों को महसूस करने लगे.

अरुण कमल की भाषा की सादगी और भावों की भव्यता उन्हें वर्तमान समय का बड़ा कवि बनाती है. संग्रह की ज्यादातर कविताएं न सिर्फ समझ में आती हैं बल्कि भीतर तक झकझोरती हैं. उनकी संवेदनाओं का कैनवास इतना व्यापक है कि उसमें जीवन के ज्यादातर रंगों को अपने लिए जगह मिल जाती है. इस संग्रह में पिछले लगभग बीस सालों के दौरान लिखी गई कविताएं दर्ज हैं. पिछले दो दशकों के दौरान देश, दुनिया, समाज, राजनीति में हुए परिवर्तन को आम आदमी से नजरिए से बेहद बारीकी से देखती ये बहुत मार्मिक कविताएं हैं.