करीब 20 साल पहले जब हम एक शहर या स्कूल छोड़ कर दूसरी जगह जाते थे तो लगता था कि अब हम अपने दोस्तों और परिवार वालों से शायद कभी नहीं मिलेंगे. तब न तो इतने सेलफ़ोन थे और न सोशल मीडिया. लेकिन 2004 में ऑरकुट आया और दुनिया बदल गई. बिछड़े हुए लोग पहले ऑरकुट, फिर फ़ेसबुक और फिर व्हाट्सएप के ज़रिए एक-दूसरे से फिर से जुड़ने लगे थे.

उन दिनों सोशल मीडिया किसी चमत्कार जैसा लगता था. इंटरनेट ने हम सब की ज़िंदगियों में क्रांति ला दी थी. हम महंगे फ़ोन कॉल से बचने के लिए जीमेल के जीटॉक पर कॉल करते, 160by2 जैसी वैबसाइट्स का इस्तेमाल करके एक दूसरे के फ़ोन पर मैसेज भेज लेते. बहुत से लोग चैट रूम्स में जाकर दुनिया भर के लोगों से दोस्ती-यारी बना रहे थे. तब सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों में स्कूल-कॉलेज जाने वाले और आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवा ही ज़्यादा थे. आर्थिक रूप से ये सभी या तो मध्यमवर्गीय थे या उच्च वर्ग से आते थे.

देखते ही देखते भारत स्मार्टफ़ोन का सबसे बड़ा बाज़ार बन गया और इंटरनेट इसके दूरदराज के इलाकों तक पहुंच गया. फिर ऐसा वक्त भी आया जब सोशल मीडिया जोड़ते-जोड़ते लोगों को दूर करने के काम में लग गया. लोग एक कमरे में साथ बैठकर भी अलग-अलग, एक दूसरे से बेख़बर अपने-अपने फ़ोन पर वक्त बिताने लगे. लेकिन सोशल मीडिया ने हमें सिर्फ़ भावनात्मक स्तर पर ही एक-दूसरे से दूर नहीं किया, बल्कि उसने विचारधारा के स्तर पर परिवारों, दोस्तों और समुदायों के बीच गहरी खाइयां भी खोद दीं.

साल 2009 में ईरान की ट्विटर क्रांति और 2010 के आख़िर में ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति ने हमें सोशल मीडिया की राजनीतिक ताक़त से रू-ब-रू कराया. उस वक्त पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने इन क्रांतियों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल का जश्न मनाते हुए कहा कि उसके कारण ही मध्य-पूर्व में लोकतंत्र का रास्ता खुला है. शुरुआत में इसे एक ऐसे माध्यम की तरह देखा जा रहा था जो एक आंदोलन को कम क़ीमत पर और ज़्यादा तेज़ी से बेहतर दर्शक, भागीदार, कार्यकर्ता और फ़ंड उपलब्ध करा सकता था. वह तस्वीरों और जानकारी को बहुत कम समय में दूर-दूर तक फैला सकता था, बहस और तर्क के लिए जगह दे सकता था और बड़ी संख्या में लोगों को वास्तविक क़दम उठाने के लिए एकजुट भी कर सकता था.

2014 में हमने भारत के आम चुनावों में भी सोशल मीडिया का जादू देखा. लेकिन जब 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित करने में रूसी एजेंसियों की भूमिका से पर्दा उठा तो पश्चिम में इस पर बहस शुरू हुई कि क्या सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए एक ख़तरा है.

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनावों में सोशल मीडिया के ज़रिए रूसी दख़ल के बारे में विस्तार से बताती है. इसके मुताबिक़ अमेरिकी साइबर एजेंसियों ने पता लगाया कि रूसी एजेंसियों ने भारी संख्या में ऐसे फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बनाए जो किसी आम अमेरिकी नागरिकों जैसे ही दिखते थे. साथ ही कई अमेरिकी नागरिकों के अकाउंट हैक भी किए गए. रूसी एजेंसियों के निर्देश पर ये अकाउंट हिलेरी क्लिंटन के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा फैला रहे थे. ट्विटर पर फेक अकाउंट्स के अलावा बॉट्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा था. बॉट्स ऐसे ऑटोमेटेड अकाउंट्स होते हैं जो अपनी प्रोग्रामिंग के आधार पर अपने आप ट्वीट करते रहते हैं. यही नहीं, buyaccs.com जैसी रूसी वैबसाइट्स पर पहले से तैयार अकाउंट्स की थोक ख़रीद-फ़रोख़्त भी हो रही थी.

फ़िल्टर बबल में क़ैद समर्थक

अमेरिकी चुनावों के दौरान हो यह रहा था कि बहुत से अमेरिकी नागरिक इन फेक अकाउंट्स को सच मानकर उनके ज़रिए शेयर की जा रही ख़बरों पर यकीन कर रहे थे और उन्हें खुद भी फैला रहे थे. और इस तरह की झूठी ख़बरों को फैलाने के लिए उन्हें प्रेरित कर रहा था फ़ेसबुक के एल्गोरिदम का बनाया फ़िल्टर बबल.

फ़ेसबुक का मौजूदा एल्गोरिदम आपकी रुचियों, रुझानों और पसंद के हिसाब से काम करता है. आप अगर फ़ेसबुक पर हैं तो आपने महसूस किया होगा कि पिछले कुछ समय से आप सिर्फ़ उन्हीं दोस्तों की पोस्ट देख पाते हैं जिनके विचार आपसे मिलते-जुलते हैं, यानी जिनकी पोस्ट को आपने हाल में लाइक, कमेंट या शेयर किया हो. सोशल मीडिया साइट के लिए इस तरह से बांटने वाला एल्गोरिदम एक फ़ायदे का सौदा है. आप जितने ज़्यादा बंटेंगे, विभिन्न मसलों पर उतने ही उत्तेजित होंगे और अपने आप को सही साबित करने के लिए उतना ही समय इन साइट्स पर लाइक, कमेंट या शेयर करते हुए बिताएंगे. और जितना समय आप इन साइट्स पर बिताएंगे उसी अनुपात में इन साइट्स को विज्ञापन मिलेंगे.

नतीजतन अमेरिकी चुनाव के दौरान लोगों को उसी तरह की पोस्ट और ख़बरें पढ़ने को मिल रही थीं जिनमें उनकी दिलचस्पी थी. अगर कोई अमेरिकी हिलेरी क्लिंटन को लेकर कोई सही या ग़लत राय नहीं रखता था पर उसने एक-दो बार उन्हें ग़लत रौशनी में दिखाने वाली ख़बरों में दिलचस्पी ले ली तो फिर फ़ेसबुक उसकी फ़ीड में सिर्फ़ इसी तरह की ख़बरें दिखा रहा था. जितना ज़्यादा वह इस तरह की ख़बरें पढ़ रहा था उतनी ही और ऐसी ख़बरें उसके पास आ रही थीं. नतीजतन धीरे-धीरे वह हिलेरी के विरोधी में तब्दील होता जा रहा था. ऐसा ही कुछ डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों के साथ भी हो रहा था. वे सिर्फ़ ट्रंप को बेहतर साबित करने वाली ख़बरें पढ़ रहे थे. ऐसे लोग एक फ़िल्टर बबल में क़ैद हो चुके थे जहां वे सिर्फ अपने जैसी विचारधारा वालों के साथ काफ़ी जोश में बातचीत कर रहे थे और अपने से अलग विचार रखने वाले दोस्तों तक को सुनने तक के लिए तैयार नहीं थे.

आइरिश अकादमिक और पत्रकार जॉन नॉटन ब्रितानी अख़बार द गार्जिअन में लिखते हैं, ‘2016 के बाद अगर कुछ बदला है तो यह कि अब सोशल मीडिया चुनावों को प्रभावित करने वाला एक उपयोगी औज़ार भर नहीं रह गया है. ये वो ज़मीन बन गया है जिस पर हमारी पूरी चुनावी संस्कृति खड़ी है, जिसकी चोटियां और घाटियां हमारे रोज़मर्रा के संवाद तय करती हैं, और जिसके दुरुपयोग की संभावनाओं की कोई सीमा नहीं है. जब तक हम इस ज़मीन को सुरक्षित नहीं कर लेते या पूरी तरह बदल नहीं लेते, हमें और भी कई हमलों के लिए तैयार रहना चाहिए. हर हमला पहले से थोड़ा अलग होगा, और हर बार हमें और ज़्यादा भ्रमित छोड़ जाएगा कि जो हम सोशल मीडिया पर देख रहे हैं वह सच है या सच के आस-पास का कुछ और.’

पिछले पांच सालों में घरों, दफ़्तरों और चाय के अड्डों पर भारत भी दो हिस्सों में बंट गया प्रतीत हो रहा है. इनमें से एक हिस्सा है नरेंद्र मोदी के समर्थकों का और दूसरा है विकल्प चाहने वालों का. इन दो तरह के लोगों के बीच अलगाव और तनाव नफ़रत की हद तक बढ़ गया लगता है. राजनीतिक झुकाव अब न सिर्फ़ पुरानी दोस्तियों बल्कि परिवारों और शादियों के आड़े भी आने लगा है. लोग अपने विचारों को लेकर अतिवाद की गिरफ्त में धंसते जा रहे हैं. क्या इसका कारण भी सोशल मीडिया है. सोशल मीडिया पर नज़र रखने वालों का जवाब है - हां.

पिछले दो दशकों में हमारी अतिवादिता बढ़ी है

अक्टूबर 2017 में प्यू रिसर्च संस्था के एक शोध में सामने आया कि पिछले एक दशक में अमेरिकी नागरिकों का तेज़ी से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है. सोशल मीडिया विशेषज्ञ रॉबर्ट कोज़िनेट्स द कॉनवर्सेशन पर छपे अपने आलेख में अपने एक प्रयोग के हवाले से बताते हैं कि सोशल मीडिया लोगों के जुनून को आंच देता है और इस तरह उन्हें अतिवादी बनाकर बांट रहा है.

पिछले दो दशकों में सोशल मीडिया का प्रयोग लगातार बढ़ा है, इसी तेज़ी से लोगों में अतिवादिता भी बढ़ी है. एक और चीज़ है जो इन दोनों चीज़ों के साथ बढ़ी है. वह है दुनिया भर में दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी, लोकवादी (पॉप्युलिस्ट) ताक़तों का उभार. उदाहरण के तौर पर कई अन्य देशों के साथ-साथ भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ़िलीपींस, तुर्की और ब्राज़ील की सरकारों की तरफ देखा जा सकता है.

तमाम शोध अब यह साबित कर चुके हैं कि दक्षिणपंथी राजनीति भय और तनाव पर फलती फूलती है. इसी तरह लोकवादी राजनीति के लिए जनता को दो खेमों में बांटा जाना ज़रूरी है - सिद्धांतों पर चलने वाले और भ्रष्ट कुलीन लोग. सोशल मीडिया पर किसी भी ख़बर या विचार को बिना किसी जवाबदेही या विश्वसनीयता तय किए फैलाया जा सकता है, वह ऐसी ताक़तों के लिए सबसे मुफ़ीद, सस्ता और कारगर हथियार बनकर सामने आता है. यहां अक्सर तर्क और तथ्यों की बात नहीं की जाती बल्कि डर और भावनात्मक बातों के ज़रिए लोगों को बरगलाया जाता है.

लोकतंत्र पर काम कर रही जर्मनी की ग़ैर-लाभकारी संस्था फ़्रेडेरिक एबर्ट फाउंडेशन अपनी वेबसाइट पर एक आलेख में बताती है कि ‘हमारा रिसर्च दिखाती है कि ऑनलाइन व्यवहार कई तरह से दक्षिणपंथी अतिवाद के उभार को ईंधन दे रहा है: यह नए लोगों तक अतिवादी सामग्री पहुंचा रहा है, विचारधारा के आधार पर आम सहमति बनवाकर कट्टरता को बढ़ावा दे रहा है, आंदोलनों को मज़बूत कर रहा है, अब तक हाशिए पर रहे विचारधारात्मक बिंदुओं को मुख्यधारा में शामिल करा कर ऑनलाइन बहसों को बदल दे रहा है.’

अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से गुज़रते हुए हम यह सब रोज़ होते देख रहे हैं. दस साल पहले हम शायद सोच भी नहीं सकते थे कि जो साइट हमें हमारे बिछड़े दोस्तों से मिला रही थीं उसी के ज़रिए हमें अपने पार्टनर की पॉलिटिक्स पता चल रही है, जो शायद हमें उससे नफ़रत करने या उसे कमतर आंकने पर मजबूर कर रही है.

अगर बांटो और राज करो के इस अर्थशास्त्र से बचाव के बारे में सोचा जाए तो फ़िलहाल हमारे पास दो ही रास्ते दिखते हैं. एक तो इन साइट्स पर ऐसी एल्गोरिदम से बाज़ आने का दबाव बनाया जाए और दूसरे खुद देखा जाए कि हम किसी फ़िल्टर बबल में तो नहीं फंसे हुए हैं.

आखिर में यह तो हमें ही तय करना होगा कि हमें किसी राजनीतिक पार्टी का झंडा उठाने के चलते अपने से अलग विचारधारा रखने वाले दोस्तों से रिश्ते तोड़ देना है या सामने वाले को सुनने, सवाल पूछने और ज़िम्मेदारी तय करने के शाश्वत भारतीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखना है.