लेखक-निर्देशक : ऋषि मेहता

कलाकार : शेफाली शाह, राजेश तैलंग, आदिल हुसैन, रसिका दुग्गल, गोपाल दत्त तिवारी, जया भट्टाचार्य, अभिलाषा सिंह, विनोद शारावत, मृदुल शर्मा, अनुराग अरोड़ा, सिद्धार्थ भारद्वाज

रेटिंग : 3.5/5

(समीक्षा में कुछ छोटे-मोटे स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

जिस हृदय विदारक घटना के बारे में तफ्सील से पूरा देश जानता हो, उसे उम्दा सिनेमा में तब्दील कर पाना आसान नहीं होता. फिर जिस घटना को आम इंसान याद करके दोबारा कांपना नहीं चाहता, उसपर ऐसा सिनेमा बना देना और भी मुश्किल होता है जिसे देखने वाले दर्शक बीच में छोड़ नहीं पाते, यह जानते हुए भी कि खत्म हो जाने के बाद ये कई दिनों तक नश्तर की तरह जेहन में चुभता रहेगा.

नेटफ्लिक्स की सात एपीसोड वाली सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ 2012 के निर्भया केस की पुलिस पड़ताल की कहानी कहती है और इसे पूरा देखने के बाद आपको लगेगा कि जैसे किसी ने आपकी आत्मा निचोड़ ली हो. इस सीरीज का आखिरी दृश्य आपकी स्मृति से शायद कभी नहीं मिट पाएगा भले ही उस वक्त कही इसकी बात से आप इत्तेफाक रखें या न रखें.

निर्भया केस के प्रति संवेदनशील बने रहकर यह सीरीज घटना का ‘ग्राफिक चित्रण’ कभी नहीं दिखाती, लेकिन तकरीबन तीन जगहों पर तीन पात्रों द्वारा इस हृदयविदारक घटना को विस्तार से सुनाती है और आपके रोंगटे हर बार जैसे बदहवास होकर खड़े होते हैं. जब मुख्य आरोपित (मृदुल शर्मा) बिना किसी पछतावे के घटना का विस्तारपूर्वक जिक्र करता है तो एक तो आपको ‘इंडियाज डॉटर’ में ऐसी ही बातें करने वाले एक दूसरे बलात्कारी का निर्मम चेहरा याद आता है और दूसरा उसी तरह जूता फेंक कर इस बलात्कारी को मारने का मन करता है जैसे कि इस सीरीज का एक पुलिस पात्र फेंकता है. निर्भया का घायल चेहरा भी बार-बार दिखाया जाता है और इसे देखना भी मजबूत से मजबूत इंसान के लिए मुश्किल रहने वाला है. यहां ये कहना बेहद जरूरी है कि सीरीज ‘एक्सप्लॉइटेटिव’ कतई नहीं है, लेकिन सच दिखाने-बताने में एक कदम भी पीछे नहीं खींचती.

फिर देखने में मुश्किल होने के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात ‘पुलिस प्रोसीजरल’ सब-जॉनर को इतनी उत्कृष्ता से निर्भया केस का हिस्सा बनाती है कि आप इस कठिन सीरीज को अंत तक देखे बगैर रह नहीं पाते.

जैसा कि ट्रेलर ने इशारा किया था ठीक वैसे ही पूरी सीरीज में दिल्ली पुलिस के नजरिए से निर्भया केस की कहानी कही गई है. छह दुर्दांत बलात्कारियों को पकड़ने के लिए की गई ‘पुलिस पड़ताल’ ही इस सीरीज की मुख्य कहानी है और कनाडा के निर्देशक ऋषि मेहता की दिल्ली पुलिस महकमे पर की गई चार साल की रिसर्च आपको परदे पर साफ-साफ दिखाई देती है. हमारे हिंदुस्तान में पुलिस पड़ताल को विस्तार से दिखाने वाला पुलिस प्रोसीजरल सिनेमा इसलिए बेहद कम बनता है क्योंकि ये अथाह रिसर्च मांगता है और हिंदुस्तानी सिनेमा तो कल्पना आधारित रिसर्च में ज्यादा विश्वास रखता है! ‘आउटसाइडर’ ऋषि मेहता ने पुलिस की केस फाइलों के आधार पर अपनी पटकथा तैयार की है इसलिए निर्भया केस से जुड़े सूक्ष्मतम डिटेल से लेकर इंसानों के सूक्ष्मतम व्यवहार की भी वे सुघड़ता से व्याख्या करने में सफल रहे हैं.

‘दिल्ली क्राइम’ न सिर्फ निर्भया केस से जुड़ी जानी-अनजानी घटनाओं को अपनी पटकथा का हिस्सा बनाती है और छह के छह बलात्कारियों को दिल्ली से लेकर उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखंड जा-जाकर पकड़ने को रोचकता से परदे पर रचती है, बल्कि अपने पुलिसवालों के निजी और पेशेवर जीवन को भी पटकथा का हिस्सा बनाकर उम्दा सिनेमा बनती है.

एक सीनियर पुलिस अफसर केस के बीच में केवल चंद घंटों की नींद मिलने के बावजूद सोने से पहले अखबार में अपनी बेटी के लिए वर तलाशता है. कई दिनों से घर नहीं गईं एक इंवेस्टिगेटिव ऑफिसर (क्या कमाल काम किया है जया भट्टाचार्य ने!) पुलिस मेस के हीटर पर रोटियां गरम करती हैं. दिल्ली के इतिहास के सबसे चर्चित केस के बीच में थाने की बिजली चली जाती है और कमिश्नर के दखल के बाद ही थाना अंधेरा-मुक्त हो पाता है. एक जांबाज शाकाहारी पुलिसवाला नक्सल प्रभावित इलाके में मुर्गा खिलाए जाने पर व्यथित होता है और पीड़ा में अमेरिका की पुलिस फोर्स को मिलने वाली बेहतर सुविधाओं का जिक्र कर अपनी नौकरी को कोसता है.

फिर पुलिस के बीच चलने वाले ‘फेवर’ नाम के खेल का भी विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है. हर पुलिसवाला ज्यादातर वक्त या तो किसी दूसरे पुलिसवाले को कोई फेवर कर रहा होता है या फिर कोई चढ़ा हुआ एहसान ही वापस फेवर कर उतार रहा होता है. पुलिस फोर्स में मौजूद ‘क्लास डिफरेंस’ को भी सीरीज जहीनता से एक्सप्लोर करती है और डीसीपी वर्तिका (शेफाली शाह) जहां आईपीएस होकर कुलीन वर्ग से है और अंग्रेजीदां भी, वहीं उसके साथी इंस्पेक्टर भूपेंद्र सिंह (राजेश तैलंग), आईपीएस ट्रेनी नीति सिंह (रसिका दुग्गल), सब-इंस्पेक्टर सुधीर कुमार (गोपाल दत्त), जयराज (अनुराग अरोड़ा) और सब-इंस्पेक्टर विमला भारद्वाज (जया भट्टाचार्य) मध्यवर्ग के मुख्तलिफ शेड़्स पेश करते हैं. इन सबके बीच की धीरे-धीरे उभरती और सुर्ख होती डायनेमिक्स देखने लायक बन पड़ी है.

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ऋषि मेहता की सीरीज में दिल्ली पुलिस साफतौर पर दुनिया के गलत परसेप्शन का शिकार है. पुलिस को नापसंद करने वाले बाकी किरदारों के अलावा एक जज साहिबा तक ऐसी मिलती हैं जो शेफाली शाह के डीसीपी पात्र पर तंज कसते हुए कहती हैं कि वे तो राजनेताओं के साथ महंगे फाइवस्टार होटलों में महंगी कॉफी पीने में व्यस्त रहती होंगी, लेकिन उन्हें थोड़ा ध्यान निर्भया केस पर भी देना चाहिए.

जबकि हकीकत यह थी कि वर्तिका चतुर्वेदी (शेफाली शाह द्वारा निभाए गए पात्र का नाम, जो कि उस वक्त की डीसीपी, साउथ छाया शर्मा से प्रभावित है) निर्भया के सड़क किनारे मिलने के बाद से ही केस संभाल रही होती हैं और उन्हीं के नेतृत्व में पुलिस छह बलात्कारियों को पकड़ पाती है. कई जगहों पर दिल्ली पुलिस पर नेताओं का, मीडिया का, आक्रोशित दिल्ली के नागरिकों का दबाव लगातार दिखाया जाता है और आपको साफ समझ आता है कि भारतीय मूल के विदेशी फिल्मकार ऋषि मेहता दिल्ली पुलिस से खासी सहानुभूति रखते हैं.

ऐसा करते वक्त वे भूल जाते हैं कि किसी भी घटना को 360 डिग्री के कोण पर घूमाकर देखना हमेशा बेहतर होता है. भले ही आप एक मुख्तलिफ ‘पॉइंट ऑफ व्यू’ सामने रख रहे हों – इस केस में दिल्ली पुलिस का - लेकिन उसको बेहतर दिखाने के लिए बाकी नजरियों को कमतर नहीं दिखाया जा सकता.

यह सब जानते हैं कि 2012 में जनाक्रोश और जनता के द्वारा किए गए प्रोटेस्ट की वजह से ही नेताओं से लेकर दिल्ली पुलिस तक पर बलात्कारियों को जल्द पकड़ने का दबाव पड़ा था. अदालत को जल्द फैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था, और आंदोलन की इसी बुलंद आवाज ने कानून बनाने वालों को मजबूर किया था कि वे बलात्कार से जुड़े कानूनों को मजबूती दें. ‘दिल्ली क्राइम’ प्रोटेस्ट करने वालों को जैसे नीची नजर से देखती है और पहले-पहले तो ऐसा लगता है कि यह केवल पुलिसवालों के विचार हैं, जो कि उनकी तरह सोचने पर जायज भी लगते हैं. लेकिन धीरे-धीरे समझ आता है कि पुलिस की तरफदारी करते-करते यह सीरीज आंदोलन और जनता के पक्ष में बेहतर स्टैंड नहीं ले पाती.

पुलिसवालों को इंडिया गेट पर भीड़ का सामना करते वक्त होने वाली मुश्किलों को तो नीति सिंह (रसिका दुग्गल) के किरदार के बहाने दिखा दिया जाता है, लेकिन ऐसा कोई सीन आपको नहीं मिलता जिसमें दिल्ली पुलिस बर्बरता से युवाओं पर लाठी बरसा रही हो, आंसू गैस के गोले छोड़ रही हो, या फिर तेज धार पानी से उन्हें छितरा रही हो. सर्वविदित है कि दिल्ली पुलिस प्रोटेस्ट के दौरान अमानवीय होने के लिए मशहूर रही है, और 2012 में भी ऐसे कारनामे अंजाम दे चुकी है. लेकिन इस सीरीज ने ऐसा कुछ दिखाने से एकदम ही परहेज किया है.

सीरीज में आदिल हुसैन दिल्ली के पुलिस कमिश्नर कुमार विजय के रोल में हैं और यह पूरी तरह एक सकारात्मक किरदार है जिसे कि राजनीति और मीडिया के बीच फंसा हुआ दिखाया जाता है. ऐसा पुलिस अफसर जो कि अपनी पुलिस फोर्स के लिए नेताओं से भिड़ने के लिए तैयार रहता है. आदिल हुसैन विलक्षण अभिनेता हैं इसीलिए ऐसे जैनेरिक से रोल को भी प्रभावी बना देते हैं और उनके और वर्तिका (शेफाली शाह) के बीच का कॉर्डिनेशन बेहतर तरीके से सीरीज में उभारा गया है.

लेकिन अगर आप ध्यान देंगे तो याद आएगा कि आदिल हुसैन का यह किरदार 2012 के दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार पर आधारित है. नीरज कुमार को 2012 दिल्ली रेप केस के दौरान कई तरह के आरोपों और आलोचनाओं से गुजरना पड़ा था और जनाक्रोश को बेहतर तरीके से हैंडल नहीं करने पर उनकी खुद की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने उनकी आलोचना की थी. ‘दिल्ली क्राइम’ इन आरोपों का काफी सारा हिस्सा काल्पनिकता की टेक लेकर दिखाती तो है लेकिन हमेशा ही उन्हें एक पॉलिटिकल विक्टिम के तौर पर पेश करती है. कभी मीडिया उनपर बेवजह आरोप लगाता हुआ मिलता है तो कभी नेता उनको निशाना बनाकर अपना कोई खेल खेल रहे होते हैं, लेकिन वे हर वक्त एक जाबांज पुलिस अफसर की तरह डटे रहते हैं. यह वो छवि नहीं है, जो कि 2012 रेप केस के दौरान देश की नजरों में नीरज कुमार और दिल्ली पुलिस की बनी थी.

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एक यह भी इस वेब सीरीज की कमी नजर आती है कि वह इस केस में मीडिया के प्रोएक्टिव होने को उसकी गलती मानकर चलती है. कई-कई जगहों पर विभिन्न पुलिस पात्रों के द्वारा यह कहा जाता है कि मीडिया गलत रिपोर्टिंग कर रही है और दिल्ली पुलिस की छवि को खराब करने का जैसे कोई एजेंडा चला रही है. यह आलोचना तब ठीक लगती जब लेखक-निर्देशक ‘सही मीडिया’ और ‘गलत मीडिया’ के बीच फर्क को समझते और उसी हिसाब से मीडिया की इस मामले में की गई रिपोर्टिंग को दिखाते. अगर उन्होंने चार साल पुलिस फाइलों का गहन अध्ययन किया था तो मीडिया रिपोर्टिंग का भी कुछ दिनों का थोड़ा-सा अध्ययन उन्हें बता देता कि उस वक्त में जिम्मेदार पत्रकारिता भी हुई थी.

लेकिन बाकी चीजों की तरह यहां भी पुलिस का नजरिया ही हावी रहता है. सजग दर्शकों के मन में सीरीज देखते वक्त यह सवाल कुलबुलाएगा जरूर कि कहीं लेखक-निर्देशक को दिल्ली पुलिस की केस फाइलों का एक्सेस इसी शर्त पर तो नहीं मिला होगा कि वे दिल्ली पुलिस की बेहतर ही छवि पेश करेंगे!

माना कि सीरीज सत्य घटनाओं पर आधारित एक फिक्शनल कथा कहती है जिसमें कि सारे अहम पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं. लेकिन उसकी इस ‘एप्रोच’ पर कुछ सवाल इसीलिए भी उठाए जाने चाहिए कि एक तो इस देश की याददाश्त कमजोर है. इसे चीजें बार-बार याद दिलानी पड़ती है. फिर यह सीरीज डॉक्यूमेंट्री के यथार्थवादी अंदाज में अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए बनाई गई है – दिल्ली पुलिस के आम पुलिसवाले का भी जमकर अंग्रेजी उपयोग करना इसकी ताकीद करता है – और नेटफ्लिक्स पर होने की वजह से इसे देखने वाला हर अंतरराष्ट्रीय दर्शक इसे 2012 दिल्ली गैंगरेप केस से जुड़ा संपूर्ण सच मानकर ही चलने वाला है.

बहरहाल, पांच दिनों में छह बलात्कारियों को पकड़ने में दिखाया गया दिल्ली पुलिस का जौहर वाकई काबिले-तारीफ है और इस अनजानी गाथा को विस्तार में सामने लाकर ऋषि मेहता ने बेहद प्रशंसनीय काम किया है. बीबीसी की ‘इंडियाज डॉटर’ (2015) नामक डॉक्यूमेंट्री के बाद यह सीरीज भी एक बेहद दुखद और शर्मनाक घटना पर एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह याद रखी जाएगी जिसने केस से जुड़ी छोटी से छोटी चीज को प्रमुखता से अपनी कहानी का हिस्सा बनाया. निर्देशक का शिल्प भी उम्दा है, योहान आइट की सिनेमेटोग्राफी आलातरीन है, और जब तक सीरीज इन दुर्दांत बलात्कारियों को पकड़ने के प्रोसीजर और पुलिसवालों की निजी व पेशेवर जिंदगी से जुड़ी रहती है, बा-कमाल बनी रहती है.

बस हर चीज और घटना में पुलिस को श्रेष्ठ दिखाने की ‘एप्रोच’ के चलते जरूर निराश करती है. अगर ऐसा न करती तो ‘सेक्रेड गेम्स’ के स्तर की सर्वश्रेष्ठ हिंदुस्तानी वेब सीरीज होने की काबिलियत रखती.

डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी के रोल में शेफाली शाह ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है. जिन आंखों से हमें नेटफ्लिक्स की ही ‘वन्स अगेन’ नाम की फिल्म में मोहब्बत हुई थी, यहां शेफाली की वही बड़ी-बड़ी आंखें जैसे बलात्कारियों और कामचोर पुलिस पात्रों को घूरते वक्त उनके आर-पार निकल जाती हैं. उनका किरदार गुस्सैल है, कड़क है, जब आप उम्मीद नहीं करते तब मानवीय है. गालियां देने से गुरेज नहीं करता. मर्दवादी पुलिस डिपॉर्टमेंट में काम करने का तरीका जानता है. बलात्कारियों को पकड़ने के लिए पांच दिन से घर नहीं गया है इसलिए थकान से चूर है. बेटी उसकी उसका ‘रेपिस्ट’ देश छोड़कर जाना चाहती है इसलिए उसके पास बलात्कारियों को पकड़ने का ‘मोटिव’ भी है.

शेफाली शाह इन तमाम इमोशन्स को इकट्ठा कर जैसे एक आंतरिक यात्रा पर निकलती हैं और अद्भुत अभिनय करती हैं. यह अभिनय इतना लाजवाब है कि केवल उन्हें पुरस्कृत करने के लिए अब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों को वेब सीरीज स्पेस में सर्वश्रेष्ठ नायिका का पुरस्कार देना शुरू कर देना चाहिए! उन्हें सलाम!

बाकी भी हर एक्टर का काम बेमिसाल है. शेफाली शाह और रसिका दुग्गल की गुरु-शिष्य की जोड़ी आपको नेटफ्लिक्स की ही एक दूसरी फिल्म ‘सोनी’ की भी याद दिला सकती है. उस फिल्म की तरह यह सीरीज भी दिल्ली पुलिस की ‘दुनिया’ की बेहतर समझ रखती है और पुरुष-केंद्रित महकमे में औरतों के होने से पैदा हुए डायनेमिक्स को बेहद कुशलता से परदे पर लाती है. रसिका दुग्गल हैं भी कमाल की अभिनेत्री, कि मुख्तलिफ किरदारों को मुख्तलिफ बॉडी लेंग्वेज देकर आश्चर्यचकित कर जाती हैं. इस सीरीज को देखकर आप उनकी बॉडी लेंग्वेज की तुलना ‘मिर्जापुर’, ‘मंटो’, ‘मेड इन हेवन’ वगैरह से कीजिएगा, हमारी बात बेहद आसानी से समझ जाएंगे.

राजेश तैलंग इन दिनों कई वेब सीरीज में कमाल का काम कर रहे हैं– ‘सिलेक्शन डे’, ‘मिर्जापुर’– और इस सीरीज में भी समझदार सीनियर पुलिसवाले के रोल में बेहद शानदार अभिनय करते हैं. इस फिल्म का शिल्प वैसे भी कैमरे के लिए ‘अभिनय’ करने की जगह किरदार को जीने की एप्रोच रखता है और बाकी एक्टरों की तरह तैलंग साहब भी ऐसा उत्कृष्ता के साथ करते हैं. हमारी फीचर फिल्में जल्द ही उन्हें वेब सीरीज जितनी तवज्जो देने के लिए मजबूर हो जाएंगी!

गोपाल दत्त तिवारी से लेकर अनुराग अरोड़ा, सिद्धार्थ भारद्वाज और विनोद शारावत जैसे कई दूसरे अभिनेता भी पुलिसवाले की भूमिकाओं में यथार्थवादी अभिनय करते हैं और इस पुलिस प्रोसीजरल सीरीज को ऊंचाइयों तक ले जाते हैं. इस सीरीज को जरूर देखें. कमियों को नजरअंदाज न करें, लेकिन अच्छाईयों को भरपूर दाद दें.