देश के गरीब लोगों को हर महीने 6,000 रुपये देने का कांग्रेस का चुनावी प्रस्ताव ‘न्याय’ एक ‘प्रगतिशील कर निर्धारण व्यवस्था’ के जरिये लागू किया जा सकता है. एक अध्ययन के मुताबिक अमीरों पर संपत्ति कर लगा कर इस योजना के लिए जरूरी फंड इकट्ठा किया जा सकता है. पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब (डब्ल्यूआईएल) ने भाजपा और कांग्रेस के चुनावी वादों पर एक तुलनात्मक अध्ययन कर यह बात कही है. वहीं, भाजपा द्वारा सामान्य श्रेणी के गरीब लोगों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था को उसने एक ‘राजनीतिक स्टंट’ बताया है.

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक यह अध्ययन शोधकर्ता नितिन भारती और डब्ल्यूआईएल के सह-निदेशक लुकस चांसल ने किया है. डब्ल्यूआईएल के इन शोधकर्ताओं ने ‘न्याय’ को लेकर कई वित्तीय विकल्प सुझाए हैं. इनकी मानें तो कांग्रेस की इस योजना की लागत दो लाख 90 हजार करोड़ रुपये हो सकती है. यह कीमत देश की जीडीपी के 1.3 प्रतिशत के बराबर है. डब्ल्यूआईएल के मुताबिक देश में ढाई करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति रखने वाले लोगों पर दो प्रतिशत कर लगा कर यह रकम प्राप्त की जा सकती है.

वहीं, यह पूछने पर कि क्या ‘न्याय’ प्रस्ताव को लेकर डब्ल्यूआईएल ने कांग्रेस की कोई मदद की है, चांसल ने कहा, ‘सीधे तौर पर नहीं. हमने योजना पर बातचीत की थी और इसके परिणाम अभिजीत बनर्जी (एमआईटी प्रोफेसर और पॉवर्टी एक्शन लैब के निदेशक) से साझा किए थे. वे इसे (प्रस्ताव) लेकर कांग्रेस से काफी समय से बात कर रहे थे. लेकिन हमारा उनसे (कांग्रेस) सीधा संपर्क नहीं है.’

नितिन भारती और लुकस चांसल ने पाया है कि भारत में 1980 से ही आय असमानता संकट के स्तर पर रही है. अखबार से बातचीत में दोनों शोधकर्ता कहते हैं कि निश्चित ही प्रगतिशील कर निर्धारण व्यवस्था इस समस्या को दूर करने का एक व्यावहारिक समाधान है. यूनिवर्सल बेसिक इनकम के तहत भारत के 20 प्रतिशत सबसे गरीब लोगों को कितनी आर्थिक मदद दी जा सकती है, इसके लिए इन शोधकर्ताओं ने तीन स्लैब तैयार किए थे. कांग्रेस ने कहा है कि वह गरीबों को सालाना 72,000 रुपये देगी. भारती और चांसल द्वारा तैयार किए गए तीन स्लैबों में यह ‘स्लैब बी’ (दूसरा) में आता है.

उधर, मौजूदा एनडीए सरकार द्वारा लाए गए सामान्य आरक्षण को इन शोधकर्ताओं ने ‘राजनीतिक पैंतरा’ बताया है. उनके मुताबिक हालांकि दस प्रतिशत कोटे से एक छोटे से वर्ग को फायदा मिल सकता है, लेकिन आय असमानता के मुद्दे पर सरकार के इस कदम की क्षमता सीमित ही है.