‘उन दिनों भारत में मोबाइल फोन नहीं होते थे. दूरदर्शन के अलावा दूसरा कोई न्यूज चैनल भी नहीं था. टेलीप्रिंटर और लैंडलाइन फोन ही कम्युनिकेशन का साधन थे. लाइव टेलीकास्ट का कोई माध्यम न होने के कारण वस्तुस्थिति का आकलन कर पाना मुश्किल था.

कल्याण सिंह के पास थोड़ी-थोड़ी देर में अयोध्या से सूचनाएं आ रही थीं. उनकी अयोध्या में मौजूद लालकृष्ण आडवाणी से फोन पर थोड़ी बात भी हुई. वहां सब कुछ नियंत्रण में लग रहा था. लेकिन तभी खबर आई कि कुछ कारसेवकों ने सुरक्षा घेरा तोड़ दिया है और वे पुराने ढांचे के गुम्बदों पर चढ़ गए हैं. ढांचा गिर चुका था. कल्याण सिंह बेहद आहत थे और उनका चेहरा पीला पड़ चुका था. बाबरी मस्जिद के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पुनर्निर्माण का उनका सपना भी ध्वस्त हो चुका था.

राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत के साथ इस घटना के तत्काल बाद हुई उनकी बातचीत में पार्टी के नेतृत्व के प्रति उनका गुस्सा साफ देखा जा सकता था. वे बार-बार यह बात दोहरा रहे थे कि वे कारसेवकों के जमावड़े के खिलाफ थे लेकिन उनकी आपत्तियों को नकारा जाता रहा और किसी ने भी उनकी बात नहीं सुनी. आखिर में उन्होंने कहा कि वे पूरे मामले की जिम्मेदारी स्वयं ले रहे हैं और त्यागपत्र दे रहे हैं.

फिर उन्होंने मुझसे एक कागज मांगा और उस पर राज्यपाल के नाम हाथ से एक संक्षिप्त त्यागपत्र लिखा. हालांकि बाद में उनका टाइप किया गया औपचारिक त्यागपत्र भी भेजा गया. त्यागपत्र में उन्होंने बिना किसी स्पष्टीकरण के पूरे घटनाक्रम के लिए सीधे-सीधे खुद को जिम्मेदार माना था. उन्होंने साफ लिखा था कि इस प्रकरण लिए किसी अन्य को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. आज के दौर में ऐसा सम्भव नहीं लगता लेकिन उन दिनों ऐसे राजनेता थे जो खुद जिम्मेदारी लेने का साहस रखते थे.’

छह दिसंबर, 1992 के दिन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के व्यवहार पर यह टिप्पणी पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप ने अपनी किताब ‘नॉट जस्ट ए सिविल सर्वेंट’ में की है. वे उस समय उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के निदेशक थे. यूनीकॉर्न बुक्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रकाशित यह किताब इस आईएएस अधिकारी की 38 साल की लंबी प्रशासनिक सेवा के दौरान हुए अनुभवों का एक दस्तावेज है. अनिल ने अपनी नौकरी के दौरान हुए तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों को इसमें साझा किया है. रिटायर होने के महज एक साल के भीतर ही इस किताब के प्रकाशित हो जाने के पीछे अनिल वजह बताते हैं, ‘मैं सेवाकाल में हर रोज होने वाली घटनाओं का ब्यौरा लिख लिया करता था. इसलिए मुझे चीजों को याद करने में कोई कठिनाई नहीं हुई.’

‘नॉट जस्ट ए सिविल सर्वेंट’ को पढ़ना एक बेहतरीन अनुभव है. यहां अनिल ने बड़ी बेबाकी से अपनी बात कही है. नौकरी पूरी करके किताबें लिखना अधिकारियों का शगल रहा है. लेकिन इस तरह की ज्यादातर किताबें या तो बेहद जटिल किस्म की जानकारियों से भरी होती हैं या फिर पिछली जिंदगी का स्वांत सुखाय लेखा-जोखा सरीखी होती हैं. लेकिन अनिल ने इस परम्परा को तोड़ा है. उन्होंने चीजों को जिस नजरिए से देखा, महसूसा और जिया है, उसी नजरिए से लिखा भी है. इसीलिए वे जहां एक मुख्यमंत्री के रूप में ईमानदार और जिम्मेदार राजनेता के तौर पर कल्याण सिंह की तारीफ करते हैं वहीं कोल ब्लॉक आवंटन के मामले में जिम्मेदारी से इनकार करने और मौन हो जाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की आलोचना करने से भी संकोच नहीं करते.

इस किताब में एक जगह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी महत्वपूर्ण योजना के मुख्य कर्ताधर्ता के रूप में अनिल के कई बहुपरतीय अनुभवों को साझा किया गया है. वहीं दूसरी तरफ यह लखनऊ के दो बड़े पत्रकारों (जिनमें से एक बाद में राज्य के सूचना आयुक्त बने और दूसरे हिन्दी के एक बड़े दैनिक के स्थानीय सम्पादक) द्वारा कारोबारियों को बड़े ऋण देने के लिए बनी सरकारी संस्था ‘पिकप’ से एक उद्यम के लिए बड़ी रकम लेकर हड़प जाने और फिर कुछ बड़े अधिकारियों व राजनेताओं के दबाव से उसे रफा-दफा करने के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई का भी खुलासा करती है. इसीलिए पुस्तक की भूमिका में इंफोसिस के अध्यक्ष और आधार योजना के संस्थापक नंदन नीलेकणी लिखते हैं, ‘अनिल की खरी और रोचक किताब उन सारे लोगों के लिए जरूरी किताब है जो भारतीय प्रशासन तंत्र की जटिलताओं को समझना चाहते हैं और यह जानना चाहते हैं कि कुछ अच्छे लोग हालात को किस तरह बदल देते हैं.’

एक अधिकारी के रूप में अनिल हमेशा अपनी साफगोई और नतीजे दिखाने के लिए जाने जाते रहे और यही बात उनकी किताब में भी दिखती है. कोयला सचिव के रूप में उनके कार्यों की सर्वत्र सराहना हुई थी. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ग्रुप के कर्ताधर्ता के तौर पर उनकी कल्पनाशीलता, लगन और कुछ कर दिखाने की क्षमता के लिए भी उन्हें खूब प्रशंसा मिली. लेकिन उनके लिए दिल्ली के एक अस्पताल में स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत मुफ्त में इलाज करवा रही एक वृद्ध महिला से मिली सराहना सबसे ज्यादा महत्व रखती है. इसका जिक्र करते हुए अनिल ने लिखा है :

‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की असलियत जानने-समझने के लिए उस दिन मैं दिल्ली के एक अस्पताल में गया था. तभी मेरे कानों में एक कमजोर-सी आवाज पड़ी - बेटा, इधर आओ. वह बेहद बीमार एक निर्धन महिला थी. जब मैंने उससे उसके इलाज के बारे में पूछा तो उसने बेहद संतोष से कहा कि सब ठीक हो रहा है. अस्पताल वाले पैसे भी नहीं मांगते. लेकिन अब मेरा ऊपर जाने का वक्त हो गया है. मैं जब ऊपर जाऊंगी तो ऊपर वाले से कहूंगी कि वो भी इस योजना को अपना आशीर्वाद दे. फिर उसने धीरे-धीरे उठ कर अपने हाथ ऊपर उठाए और मुझे दुवाएं दीं. इस योजना ने बहुत सारे सम्मान और पुरस्कार पाए लेकिन यह उन सबसे बहुत बड़ा था.’

इस किताब में अनिल ने उत्तर प्रदेश के अपने अनुभवों से लेकर दिल्ली के अलग-अलग मंत्रालयों के अनुभवों के साथ पाकिस्तान और विदेशों के अनुभवों को भी सहेजा है. कोल आवंटन मामले में कैग विनोद राय के तौर-तरीकों की आलोचना की है तो कोल ब्लॉक आवंटन में सजा पा चुके पूर्व कोयला सचिव हरिश्चन्द्र गुप्ता के साथ तर्कों के आधार पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने के सवाल पर भी अपनी बात कही है. यहां उन्होंने खुद को कोयला सचिव बनाए जाने से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया भी साझा किया है :

‘जब मुझे कोयला मंत्रालय में भेजे जाने के बारे में पता चला तो मैंने अपने एक मित्र से जानना चाहा कि वहां किस तरह से कामकाज होता है. मेरे मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखी है और इस जवाब के बाद मुझे पूरी बात समझ में आ गई.’

किताब के अंतिम अध्याय में अनिल देश की प्रथम श्रेणी की प्रशासनिक सेवा के बारे में कहते हैं :

‘अगर मुझे दोबारा मनुष्य के रूप में जन्म लेना पड़ा तो मैं निश्चित रूप से फिर से आईएएस बनना चाहूंगा क्योंकि इस धरती पर कोई दूसरी नौकरी ऐसी नहीं है जो आपको इतनी आजादी और काम करने के इतने अवसर दे सकती है. यह एक ऐसी सेवा है जो आपको आज के भ्रष्ट सामाजिक-राजनैतिक माहौल में भी ईमानदार बने रहने के मौके देती है.’

बहरहाल यह किताब इसलिए भी पढ़ी जानी चाहिए क्योंकि यह चक्रव्यूह की तरह जटिल सरकारी तंत्र में आसानी से घुसने और इच्छित कार्य पूरा कर बाहर आने के रास्ते भी बताती है. अनिल किताब के जरिए एक राह दिखाने की कोशिश करते हैं कि एक आईएएस अधिकारी के पास काम करने के कितने अधिक अवसर होते हैं बशर्ते उसके पास काम करने की इच्छा शक्ति हो.