‘मिशन शक्ति’ के सफल परीक्षण को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व प्रमुख वीके सारस्वत का भी बयान आया है. खबरों के मुताबिक उन्होंने कहा है कि अगर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के नेतृत्व वाली पूर्व सरकार ने इस एंटी सेटेलाइट मिसाइलों से जुड़े इस मिशन को मंजूरी दी होती 2014-15 में ही भारत यह उपलब्धि हासिल कर चुका होता. उन्होंने आगे कहा, ‘डीआरडीओ ने पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन को इस संबंध में एक प्रस्तुति दी थी. लेकिन दुर्भाग्यवश पूर्व सरकार से हमें सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली. इसलिए तब हम इस योजना पर काम नहीं कर सके थे.’

वीके सारस्वत ने यह भी कहा है, ‘2014 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में जब नई सरकार का गठन हुआ तो डॉक्टर सतीश रेड्डी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के सामने यह प्रस्ताव रखा. इसके बाद इस मिशन पर आगे बढ़ने की मंजूरी देने का साहस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाया.’

डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख के इस विचार से इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी माधवन नायर भी इत्तेफाक रखते हैं. उनका कहना है कि चीन ने साल 2007 में यह उपलब्धि हासिल कर ली थी. ऐसे में भारत को भी इस दिशा में फौरन कदम बढ़ाने चाहिए थे. उन्होंने आगे कहा प्रधानमंत्री मोदी ने मिशन शक्ति को लेकर जो राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है उसका नतीजा आज पूरी दुनिया के सामने है.

इससे पहले बुधवार को ही नरेंद्र मोदी ने इस मिशन की सफलता की जानकारी दी थी. उसके बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसकी सफलता का श्रेय यूपीए सरकार को देने की कोशिश की थी. साथ ही यह भी कहा था कि मिशन शक्ति को यूपीए सरकार के कार्यकाल में शुरू किया गया था. हालांकि उसके कुछ ही देर बाद केंद्रीय वित्त मंत्री ने कांग्रेस के नेताओं के उन बयानों पर पलटवार किया था. साथ ही यह भी कहा कि इस मिशन को नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने हरी झंडी दिखाई है.