करीब 23 साल पहले भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर बसे पश्चिम बंगाल के जिले नादिया से निकले कृष्णा अपने दिल्ली तक के सफर की दास्तान बहुत उत्साह के साथ सुनाते हैं. वे बताते हैं कि कैसे पहली बार घर से निकलकर वे देश के एक छोर कोलकाता से उठकर दूसरे छोर अहमदाबाद पहुंच गए थे. कई साल तक अहमदाबाद के कुछ होटलों में काम करने के बाद एक बार जब वे अपने गांव जा रहे थे तो सफर में उनके सारे दस्तावेज और बाकी सामान चोरी हो गए. कृष्णा कहते हैं कि फिर वह सफर कभी पूरा नहीं हो सका क्योंकि पहले वे जयपुर में रुके और फिर दिल्ली आ गए. और फिर यहीं के होकर रह गए.

अब जिंदगी कैसी चल रही है, के सवाल पर कृष्णा बताते हैं कि ‘अब मैं पर्सनल कुक की तरह काम करता हूं और तीन-चार घरों में खाना बनाता हूं. इससे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती है. बाकी वक्त मिले तो व्हाट्सएप पर मां से वीडियो चैट, वॉयस मैसेज करने या मोबाइल पर गाने सुनने में बीत जाता है.’ दो दशक पहले महज 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई करने वाले कृष्णा से वीडियो चैट, वॉयस मैसेज, व्हाट्सएप जैसे शब्द सुनना जरा चौंकाता है.

समाज के जिस तबके से कृष्णा आते हैं, उसके बारे में हममें से ज्यादातर की राय यही होगी कि यहां पर लोग फोन को केवल ‘हरे से उठता है और लाल से कटता है’ वाले तरीके से ही इस्तेमाल कर पाते होंगे. कृष्णा से बात करते हुए पता चलता है कि तीन चीज़ों ने उनके कम्युनिकेशन का तरीका क्रांतिकारी तरीके से बदल दिया है - आधार, रिलायंस जियो और व्हाट्सएप. आधार ने जहां उनके लिए सिम कार्ड खरीदना आसान बनाया, वहीं जियो ने उन्हें इफरात में फ्री-इंटरनेट दे दिया और फिर व्हाट्सएप ने अपने यूजर फ्रेंडली होने के चलते उनका संवाद करने का तरीका हमेशा के लिए बदल डाला.

थोड़े-थोड़े समय बाद आधार के दुरुपयोग या इसका डेटा चोरी होने से जुड़ी खबरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं. इसके अलावा, इसमें लिए जाने बायोमीट्रिक डेटा से जुड़ी बहस भी संसद, सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क तक जारी है. लेकिन असली आम आदमी का इससे कितना लेना-देना है, यह बिहार से आकर नोएडा में रिक्शा चलाने वाले मदन पोद्दार की बातों से पता चलता है. ‘मैंने बहुत शुरूआत में ही, करीब 4-5 साल पहले अपना आधार बनवा लिया था. मुझको लगा कि इससे सरकारी (योजनाओं का) पैसा आसानी से मिल सकेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पर आधार सिम कार्ड लेने में और बैंक वगैरह में पहचान पत्र की तरह चल जाता है, इसलिए ठीक लगता है.’

कृष्णा की कहानी पर वापस लौटें तो जब उन्होंने ट्रेन में अपना सारा सामान गुमा दिया था तब दिल्ली आकर उन्हें सालों कबाड़ी का काम करना पड़ा था. वे हंसते हुए कहते हैं कि ‘उस दौर की कहानी मैं आपको नहीं सुनाऊंगा, वर्ना बात भटक जाएगी. लेकिन कागज का एक भी पुर्जा न होने के चलते मुझे कोई नौकरी उस वक्त नहीं मिल सकी थी. बाद में सब डॉक्युमेंट बनवाने में बहुत मेहनत लगी. अब मेरा आधार तो गांव के पते पर बना है लेकिन यहां पर अंगूठा लगाते ही बहुत सा काम हो जाता है.’

आधार के जरिए सरकारी योजनाओं से एक पैसा फायदा ना मिलने की बात कृष्णा भी कहते हैं. और मदन पोद्दार की तरह उन्हें भी यह समझ नहीं आता कि आधार के लिए ली गई उनकी निजी जानकारियों का कोई कैसे दुरुपयोग कर सकता है.

जियो पर आएं तो साल 2016 में लॉन्च होने के साथ ही इसने अपने ग्राहकों को कॉल और इंटरनेट डाटा काफी कम कीमत पर उपलब्ध करवाकर टेलिकॉम क्षेत्र में हलचल मचा दी थी. इसके बाद दूरसंचार क्षेत्र हमेशा के लिए बदल गया. शुरुआत में काफी हो-हल्ला मचाने के बाद दूसरी टेलिकॉम कंपनियों को भी अपनी कॉल और डाटा की दरें काफी कम करनी पड़ीं. इनमें से कई कंपनियों का आरोप है कि वर्तमान सरकार लगातार जियो को फायदा पहुंचाने वाले फैसले लेती रही है. कई विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से अंबानी समूह की ये कंपनी टेलिकॉम क्षेत्र पर एकाधिकार करती रही है वह आने वाले समय में ग्राहकों के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान का सबब बनने वाला है.

ऐसा ही कुछ हाल व्हाट्सएप के साथ भी है, खासतौर से यह तब से विवादों में ज्यादा घिर गया है जब से फेसबुक ने इसका अधिग्रहण किया है. इसे फायदेमंद या विश्वसनीय (और उपयोगी), में से एक बनाए रखने के लिए फेसबुक और इसे बनाने वालों के बीच इतने विवाद हुए कि उन्होंने कंपनी से ही किनारा कर लिया. इसके अलावा व्हाट्सएप का अफवाहें फैलाने के माध्यम की तरह भी जमकर इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसके चलते कंपनी को इसमें तमाम नये फीचर्स को शामिल करना पड़ा. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अति का यूजर फ्रेंडली होने के चलते वहाट्सएप ने एसएमएस और फेसबुक मैसेंजर जैसी तमाम मैसेजिंग सुविधाओं की जरूरत को खत्म कर दिया है.

कुल मिलाकर, जियो और व्हाट्सएप ने भले ही अपनी-अपनी तरह से बाज़ार के समीकरण बिगाड़ दिए हों लेकिन फिलहाल के लिए ही सही इन्होंने कई लोगों की जिंदगी बेहद आसान औऱ उनकी जेब के समीकरणों को दुरुस्त कर दिया है. नोएडा में बतौर हाउस हेल्प काम करने वाली पूजा कहती हैं कि ‘मैं पिछले दो साल से व्हाट्सएप और यूट्यूब चला रही हूं. मेरे पास एयरटेल का कनेक्शन है जिसमें तीन महीने में रिचार्ज करवाना होता है. उसी में बात करने का काम हो जाता है और इंटरनेट भी चलाने को मिल जाता है. व्हाट्सएप पर मैसेज फॉरवर्ड करने के अलावा वॉयस मैसेज और वो जो दिन भर के लिए फोटो लगाने वाला होता है (व्हाट्सएप स्टोरी), वही मुझे आता है.’

पूजा आगे बताती हैं कि ‘मुझे लिखना नहीं आता. इसलिए अगर मुझे किसी दिन कोई काम होता है और मैं काम करने नहीं जा सकती हूं तो मैं दीदियों को व्हाट्सएप पर बोलकर बता देती हूं. बिन बताए छुट्टी मारना अच्छी बात नहीं होती न. और देर रात को फोन करना मुझे अच्छा नहीं लगता.’ पूजा जैसी ही बात कृष्णा भी दोहराते हैं और साथ में जोड़ते हैं कि ‘फोन करने पर चार बातें सुननी और बतानी पड़ती हैं. इसलिए वॉइस मैसेज करना आसान लगता है.’

नोएडा सिटी सेंटर के बाहर मोमोज और अंडा रोल का ठेला लगाने वाली सुहासिनी केसरी कहती हैं कि ‘बात करने के अलावा मैं व्हाट्सएप से दो काम करती हूं. एक तो वाइस मैसेज भेजती हूं क्योंकि मुझे लिखना-पढ़ना नहीं आता है. ये आसान भी है, दबाया, बोला और हो गया. और दूसरा अगर कभी कुछ पढ़ने में नहीं आता तो फोटो खींच के अपनी बेटी को भेज देती हूं. इसके बाद मैं उसे फोन करती हूं तो वो मुझे बता देती है कि फोटो में क्या लिखा है और क्या करना है.’ सुहासिनी लगभग रहस्योद्घाटन वाली मुद्रा में यह भी बताती हैं कि ‘नया ट्रेंड चला है जहां सब लेडीज लोग शॉपिंग के समय व्हाट्सएप पर वीडियोचैट करके घर बैठे लोगों से भी चीजें पसंद करवा लेती हैं.’

वहीं बिहार के खगड़िया से दिल्ली के ऐम्स पहुंचे देवीदीन पाठक इसका एक ऐसा इस्तेमाल बताते हैं जो भावुक कर देता है. देवीदीन करीब पांच महीने पहले अपने 11 साल के बेटे बृजेश का इलाज करवाने के लिए दिल्ली आए थे और उन्हें नहीं पता कि वे यहां कितने दिन और बिताने वाले हैं. फिलहाल वे ऐम्स और सफदरजंग को जोड़ने वाले सब-वे में रहते हैं. वे बताते हैं कि अपने फोन के जरिए वे घर पर मौजूद उनकी पत्नी, दो बच्चों और खेत-खलिहान को देख सकते हैं. इसके अलावा देवीदीन बताते हैं कि ‘कभी उधर वाले फोन ना उठा पाएं तो मैं व्हाट्सऐप पर बोलकर बता देता हूं कि अब कितनी देर बाद फोन करूंगा.’

बृजेश फोन के इस्तेमाल पर कहते हैं कि ‘मुझको मोबाइल पर वीडियो देखना आता है तो टाइम पास हो जाता है. घर पे बात कर लेता हूं तो मां की याद कम आती है. व्हाट्सऐप पर मैं बस उन्हें छू नहीं सकता हूं, बाकी मैं सब देख सकता हूं कि गांव में क्या चल रहा है.’ फोन के खर्च से जुड़ा सवाल पूछने पर देवीदीन हंसते हुए कहते हैं कि ‘मैंने तो अपना फोन खरीदा था और घरवाली ने मायके से जुगाड़ा है. बैलेंस तो ढाई-तीन सौ रुपए से कम का नहीं पड़ता लेकिन बहुत दिन (तीन महीना) चलता है, इसलिए नहीं अखरता.’

ये उनमें से कुछ बातें हैं जिन्होंने तमाम विवादों के बाद भी आधार, रिलायंस जियो और व्हाट्सएप को एक बड़े तबके के लिए उपयोगी और लोकप्रिय बनाया हुआ है. खबरों-सूचनाओं से लबरेज़ रहने वाला तबका भले इस बात की चिंता में लगा रहे कि उसकी निजता, उसकी जानकारियां खतरे में है. लेकिन इन तीन चीजों ने पिछड़े तबके के लोगों को फोन का इस्तेमाल करने के नये और उपयोगी तरीके दे दिये हैं. इनकी मदद से वे अब बगैर किसी की चार बातें सुने अपने छुट्टी लेने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं, अपने परिवार के संपर्क में रह सकते हैं, सरोजिनी नगर में बिना साथ गये मिलकर शॉपिंग कर सकते हैं और ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने की सूरत में अपने बच्चों से किसी लिखे का मतलब भी समझ सकते हैं.