बुधवार को भारत अंतरिक्ष शक्ति वाले देशों में शामिल हो गया. उसने जमीन से 300 किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में एक एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) मिसाइल के जरिये एक उपग्रह को मार गिराया. यह तकनीक अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन के पास थी. अब भारत ऐसी क्षमता रखने वाले देशों में शामिल हो गया है. हालांकि, भारत ने इस क्षमता को लेकर अपने इरादे 2010 के आसपास ही साफ कर दिए थे. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के तत्कालीन प्रमुख वीके सारस्वत ने पांच जनवरी, 2010 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इसी तरह के परीक्षण का जिक्र किया था.

हालांकि इस परीक्षण को होने में नौ साल का समय लग गया. लेकिन इस तकनीक को लेकर उस समय भी किसी तरह का संदेह नहीं था. डीआरडीओ ने छोटी, मध्यम और बड़ी रेंज की मिसाइलों के एक के बाद एक परीक्षण कर इस तकनीक में दक्षता हासिल कर ली थी. लेकिन वास्तविक परीक्षण बुधवार से पहले नहीं हुआ था. इसे लेकर डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख नियंत्रक रहे डब्ल्यू सेल्वामूर्ति इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहते हैं, ‘हमारे पास यह क्षमता थी. लेकिन इसका परीक्षण भी जरूरी था. आपको अपनी तकनीक की विश्वसनीयता को परखना होता है और ऐसा केवल परीक्षण से सुनिश्चित हो सकता है. इसके अलावा आपको अपनी तकनीकी क्षमता से (दुनिया को) अवगत भी कराना होता है. अब हमने हमारी इस क्षमता को साबित कर दिया है. आज (बुधवार) के परीक्षण के बाद दुनिया में एक मजबूत संदेश गया है.’

हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह परीक्षण ऐसे समय में हुआ आम चुनाव के चलते पूरे देश में आचार संहिता लागू है. ऐसे में कई लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या यह परीक्षण पहले नहीं किया जा सकता था. इस पर वीके सारस्वत और इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर ने कहा है कि यूपीए सरकार ने इस परीक्षण की इजाजत नहीं दी थी. नायर ने यह भी कहा कि 2007 में चीन ने एक सैटेलाइट को तबाह किया था जो सही नहीं था. उनके मुताबिक ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ था और इससे अंतरिक्ष प्रदूषण फैला.

वहीं, सेल्वामूर्ति ने कहा कि उन्हें यूपीए सरकार द्वारा किसी तरह की अनुमति नहीं दिए जाने की जानकारी नहीं है. उनके मुताबिक भारत इस तकनीक में 2014 से पहले ही परिपक्व हो गया था. उन्होंने कहा, ‘हमने 2010 के आसपास इस प्रोग्राम पर काम करना शुरू किया था. इसके लिए अलग से विशेष परियोजना की जरूरत नहीं थी. क्योंकि अग्नि और इंटरसेप्टर मिसाइलों के परीक्षण के साथ यह क्षमता हासिल कर ली गई थी. 2012 के आसपास हमने अग्नि के कुछ परीक्षण किए थे. 2014 तक मैं आश्वस्त हो गया था कि हमारी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल तकनीक परिपक्व हो गई है और हम उस समय भी ऐसा परीक्षण कर सकते थे.’ इसके साथ ही सेल्वामूर्ति ने कहा कि उस समय परीक्षण की अनुमति पहले से दी जानी चाहिए थी, क्योंकि इसमें काफी समय लगता है और अंतिम निर्णय सरकार को करना होता है.

सेल्वामूर्ति ने यह भी बताया कि परमाणु हथियारों की तरह एंटी-सैटेलाइट मिसाइल तकनीक ‘युद्ध निवारण’ के सिद्धांत पर काम करती है. बुधवार के परीक्षण से पहले दुनिया में जितने भी ए-सैट मिसाइल परीक्षण हुए हैं, उनके बाद कभी भी किसी देश की अंतरिक्ष संपत्ति (सैटेलाइट) को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है. ऐसा परमाणु शक्ति के मामले में भी देखा गया है. भारत ने 1974 और 1998 के परीक्षणों के बाद उन पर पाबंदी लगा दी थी. हालांकि ए-सैट के मामले में भारत ने ऐसा कोई आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है. लेकिन कहा जा रहा है कि अब इस तरह के परीक्षण की जरूरत न पड़े.