लंबे समय की आपसी खींचतान के बाद बिहार में दोनों प्रमुख गठबंधनों ने अपनी सीटों और उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन है जिसमें भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी है. वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन है जिसमें राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी है.

एनडीए में यह तो बहुत पहले तय हो गया था कि भाजपा और जेडीयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और रामविलास पासवान की एलजेपी छह सीटों पर चुनाव लड़ेगी. लेकिन कौन सी पार्टी किस सीट पर चुनाव लड़ेगी, इसकी घोषणा एकदम आखिरी समय में हुई.

दूसरी तरफ महागठबंधन में सीटों की संख्या और सीटों के बंटवारे को लेकर और अधिक खींचतान चली. सिर्फ एक सीट मांग रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को महागठबंधन में जगह नहीं मिली. आरजेडी के सांसद रहे लेकिन अपनी अलग जन अधिकार पार्टी चला रहे पप्पू यादव की सीट मधेपुरा को लेकर भी काफी खींचतान रही. इस सीट से शरद यादव आरजेडी के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरने जा रहे हैं, जबकि इस सीट पर पप्पू यादव सबसे मजबूत दिखते रहे हैं.

बिहार में कई ऐसी लोकसभा सीटें दिख रही हैं जिन पर दोनों गठबंधनों ने जिस तरह से समझौते किए हैं और जिस तरह से उम्मीदवार उतारे हैं, उससे यही लगता है कि इन गठबंधनों की पार्टियों के बीच पर्दे के पीछे बहुत कुछ चल रहा है. आइए ऐसी पांच सीटों के बारे में जानते हैं.

औरंगाबाद

बिहार में अगर कुछ गिनी-चुनी सीटों पर कांग्रेस की जीत पक्की मानी जा रही थी तो उनमें एक औरंगाबाद की सीट थी. कांग्रेस अपने दम पर भी कई बार यहां से जीतती रही है. लेकिन जब भी वह राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर लड़ी है तो उसे यहां से हराना बेहद मुश्किल हो गया है. केरल के राज्यपाल रहे निखिल कुमार कांग्रेस पार्टी की ओर से यहां से तैयारी कर रहे थे. लेकिन महागठबंधन में यह सीट जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा को दे दी गई. जिस दिन यह घोषणा हुई उस दिन निखिल कुमार के समर्थकों ने पटना में कांग्रेस कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन भी किया. औरंगाबाद के लोगों को लग रहा है कि हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के उम्मीदवार उपेंद्र प्रसाद को हराकर अब यहां से पिछले 10 साल से सांसद रहे सुशील कुमार सिंह के लिए एक बार और जीत हासिल करना आसान हो गया है. क्योंकि औरंगाबाद में जीतन राम मांझी, उनकी पार्टी और उनके उम्मीदवार तीनों में किसी की कोई खास पहचान नहीं है.

गया

बिहार में पिछले 20 सालों में भाजपा गया सीट पर जीत हासिल करती आई है. जेडीयू के साथ भी और उसके बिना भी. 2014 में भी भाजपा के हरी मांझी को इस सीट पर जीत हासिल हुई थी. इस पर अपना सांसद होने के बावजूद इस बार भाजपा ने यह सीट जेडीयू को दे दी. जेडीयू ने अपने पूर्व विधायक विजय कुमार मांझी को इस सीट पर उम्मीदवार बनाया है.

वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन ने यह सीट हिंदुस्तान आवाम मोर्चा को दी है. इस सीट पर मोर्चा के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी खुद चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में वे जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार के तौर पर तीसरे स्थान पर रहे थे. आरजेडी का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था. गया के लोगों का कहना है कि भाजपा द्वारा इस सीट को छोड़े जाने से जीतन राम मांझी की जीत थोड़ी आसान हो जाएगी. भाजपा ने यह सीट क्यों छोड़ी, यह किसी को समझ नहीं आ रहा.

नवादा

नवादा में भाजपा के गिरिराज सिंह 2014 का चुनाव जीते थे. 2014 में वे यहां से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे लेकिन, पार्टी ने उनके पास सिर्फ यहीं से लड़ने का विकल्प छोड़ा. इसके बाद गिरिराज सिंह यहां से जीते और केंद्र में मंत्री भी बने. अपने विवादास्पद बयानों को लेकर वे चाहे जितनी भी चर्चा में रहते हों, लेकिन उनका दावा है कि उन्होंने नवादा संसदीय क्षेत्र में काफी काम किया है. वे खुद तो इस जिले के रहने वाले नहीं हैं लेकिन इस जिले में उनकी रिश्तेदारियां हैं. नवादा के लोग कहते हैं कि इस वजह से गिरिराज सिंह ने इस क्षेत्र के साथ अपना संबंध बढ़ाया और अगर इस बार उन्हें भाजपा ने यहां से उम्मीदवार बनाया होता तो वे आसानी से जीत सकते थे.

लेकिन भाजपा ने यह सीट लोक जनशक्ति पार्टी को दे दी. गिरिराज सिंह को नवादा की आसान सीट से बेगूसराय की मुश्किल सीट का रुख करना पड़ा. रामविलास पासवान की एलजेपी ने यहां चंदन कुमार को उम्मीदवार बनाया है. चंदन कुमार की राजनीतिक पृष्ठभूमि यही है कि वे पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के छोटे भाई हैं. नवादा सीट पर उनकी भाभी वीणा देवी की उम्मीदवारी की चर्चा थी. नवादा सीट के लिए गिरिराज सिंह पर भारी पड़ गए चंदन कुमार बिहार के बड़े ठेकेदारों में गिने जाते हैं. उनके खिलाफ आरजेडी ने इस सीट पर बेहद प्रभावशाली रहे बाहुबली राजबल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी को टिकट दिया है.

सिवान

बिहार में सिवान को लंबे समय तक आरजेडी के बाहुबली शहाबुद्दीन की सीट के तौर पर जाना जाता था. 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ओमप्रकाश यादव ने यहां शहाबुद्दीन के वर्चस्व को तोड़ा. 2009 में उनकी जीत के बाद 2014 में लोकसभा चुनावों के पहले भाजपा उन्हें अपने पाले में ले आई. 2014 का चुनाव वे भाजपा उम्मीदवार के तौर पर लड़े और जीत हासिल की.

लेकिन इस बार यह सीट भाजपा ने जेडीयू को दे दी है. वह भी तब जब 2014 में ओमप्रकाश यादव और जेडीयू के उम्मीदवार मनोज कुमार सिंह को मिले मतों का अंतर तकरीबन तीन लाख था. इससे खुद भाजपा के अदंर यह सीट जेडीयू को देने के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. नाराज ओमप्रकाश यादव के निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं. आरजेडी की ओर से इस सीट पर शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब उम्मीदवार होंगी.

बेगूसराय

महागठबंधन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) सिर्फ एक सीट मांग रही थी और यह थी बेगूसराय. इसके बावजूद आरजेडी ने उसे यह सीट नहीं दी. इस सीट पर आरजेडी के उम्मीदवार तनवीर हसन हैं. नवादा से टिकट नहीं पाने वाले गिरिराज सिंह बेगूसराय से भाजपा उम्मीदवार हैं. गिरिराज सिंह के नवादा आने की स्थिति जब बनी तो यह माना जा रहा था कि अगर सीपीआई और आरजेडी मिलकर यहां लड़ते हैं तो गिरिराज सिंह के लिए जीत बेहद मुश्किल हो जाएगी. लेकिन सीपीआई की ओर से कन्हैया कुमार और आरजेडी की ओर से तनवीर हसन के उम्मीदवार बनने से गिरिराज सिंह समर्थक बहुत खुश हैं. अब उन्हें बेगूसराय से गिरिराज सिंह की जीत पक्की दिख रही है.