सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण और हत्या के एक मामले में जानी-मानी सर्वणा भवन होटल श्रृंखला के मालिक पी राजगोपाल की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है. उन्हें 18 साल पहले तमिलनाडु में एक व्यक्ति का अपहरण और बाद में हत्या होने से जुड़े मामले में दोषी पाया गया था. मद्रास हाई कोर्ट ने दस साल पहले सर्वणा भवन के मालिक राजगोपाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. आज सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. शीर्ष अदालत ने मेडिकल आधार पर आत्मसमर्पण करने के लिए राजगोपाल को सात जुलाई तक का समय दिया है.

क्या है मामला

साल 2001 में पी राजगोपाल ने अपने आठ वफादार लोगों को प्रिंस संतकुमार नाम के व्यक्ति का पहले अपहरण करने और बाद में हत्या करने का काम सौंपा था. द न्यूजमिनट की रिपोर्ट के मुताबिक संतकुमार गणित के अध्यापक थे. उन्होंने राजगोपाल के एक कर्मचारी रामास्वामी की बेटी जीवाज्योति से 1999 में शादी की थी. रामास्वामी इससे खुश नहीं थे क्योंकि संतकुमार ईसाई थे.

शादी के कुछ महीने बाद संतकुमार और जीवाज्योति एक ट्रैवल एजेंसी शुरू करने के लिए राजगोपल और जीवाज्योति के अंकल के पास ऋण लेने गए थे. लेकिन राजगोपाल के मन में जीवाज्योति को लेकर भावनाएं पैदा हो गईं. वह उसे रोजाना कॉल करने लगे और तोहफे में महंगे आभूषण भेजना शुरू कर दिया. रिपोर्टों के मुताबिक जीवाज्योति को अपनी तीसरी पत्नि बनाने के लिए राजगोपाल ने दंपती के बीच दूरी बनाने की कोशिश की. लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद वह सफल नहीं हुए. बाद में 2001 में जीवाज्योति ने उन्हें पुलिस में शिकायत करने की चेतावनी दी. लेकिन राजगोपाल पर इस चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ.

आखिरकार दोनों पति-पत्नि ने चेन्नई छोड़ कर किसी अनजान जगह जाने का फैसला किया. उसी दौरान संतकुमार पर राजगोपाल और उनके लोगों ने हमला किया. फिर उसी साल अक्टूबर में संतकुमार का अपहरण कर लिया गया. वहीं, जीवाज्योति को ‘प्रेत-आत्मा उतारने’ के नाम पर तमिलनाडु के एक गांव ले जाया गया. बाद में राजगोपाल के एक वफादार डैनियल ने दावा किया कि उसने संतकुमार को रेलवे ट्रेक पर बांध कर उसकी हत्या कर दी.

लेकिन असल में संतकुमार भाग निकलने में कामयाब रहे थे. बाद में उन्हें, जीवाज्योति और उनके परिवार को तिरुचेंदूर ले जाया गया. बीच रास्ते में संतकुमार को उनसे अलग कर दिया गया और उनकी हत्या कर दी गई. बाद में उनका शव कोडाईकनल हिल स्टेशन के पास मिला. तीन साल बाद सेशन कोर्ट ने पी राजगोपाल को दोषी करार देते हुए दस साल की सजा सुनाई. लेकिन हाई कोर्ट ने यह सजा आजीवन कारावास में बदल दी.