कश्मीर घाटी में पिछले तीन दशक से जो हालात हैं उनमें किसी का मारा जाना कोई नई बात नहीं है. लेकिन इस साल मार्च के ही महीने में दो ऐसी हत्याएं हुईं जिन्होंने लोगों के दिल दहलाते हुए कुछ पुराने जख्म भी कुरेद दिए. पहले मामले में एक 11 साल का बच्चा था जिसे मिलिटेंट्स ने बंधक बनाकर मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किया. दूसरा 29 साल का एक अध्यापक जिसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई.

दो अलग-अलग जगहों पर दो अलग अलग स्थितियों में हुई इन मौतों ने कई सवाल तो उठाए ही हैं, जमीन पर दो अलग-अलग तरह के असर भी छोड़े हैं. दोनों हत्याओं में सवाल यह है कि क्या कश्मीरी लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है. और असर? कश्मीर में लोगों के दो अलग अलग रुख- एक अलगाववाद के खिलाफ और दूसरा इसके हक़ में.

सत्याग्रह ने पिछले कुछ दिनों से मारे जाने वाले दोनों लोगों के परिजनों से बात करके समझने की कोशिश की कि ये हत्याएं हुईं कैसे और इनका असर क्या हुआ है.

हाजिन

बांदीपोरा का हाजिन जम्मू-कश्मीर की गर्मियों की राजधानी श्रीनगर के उत्तर में लगभग 35 किलोमीटर दूर बसा है. इन दिनों यहां के बाज़ार में खड़े होकर आप किसी से भी पूछें कि आतिफ के घर जाना है तो वह आपको रास्ता बता देगा. हाजिन के मीर मोहल्ला में रहने वाला आतिफ हुसैन मीर 11 साल का था. 21 मार्च को वह अपने ही घर में मिलिटेंट्स और सुरक्षा बलों के बीच हुई एक मुठभेड़ में मारा गया.

कश्मीर में बच्चों का इन मुठभेड़ के दौरान मारा जाना कोई नयी बात नहीं है, लेकिन जो आतिफ के साथ हुआ वह नया था. उसके घर में फंसे दो पाकिस्तानी मिलिटेंट्स ने उसे मुठभेड़ के दौरान बंधक बनाया और ढाल की तरह इस्तेमाल किया.

आतिफ के पिता, 50 साल के मुहम्मद शफी मीर सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं कि उनका यह बुरा समय मुठभेड़ से करीब तीन दिन पहले ही शुरू हो गया था, जब रात के समय उनके दरवाजे पर एक दस्तक हुई थी. वे कहते हैं, ‘हमने दरवाजा नहीं खोला था, बावजूद इसके कि ये दस्तकें एक दो घंटे तक गूंजती रहीं. लेकिन जब मैं फ़जर (सुबह) कि नमाज़ के लिए निकला तो मैंने दो बंदूकधारी लोगों को सामने खड़ा पाया, जो मुझे डांट-डपट के घर के अंदर घुस आए.’

बाद में शफी को पता चला कि उनके घर में पनाह लेने वाला एक पाकिस्तानी मिलिटेंट अली भाई और उसका एक और साथी था. अली इलाक़े में मशहूर था. एक तो पिछले साल हुई भीषण हत्याओं के लिए उसको जिम्मेदार ठहराया जा रहा था और दूसरा इसलिए कि अभी तक कई बार सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ों के दौरान वह हमेशा फरार होने में कामयाब हो जाता था.

अगले तीन दिन शफी और उनके भाई का परिवार भय और तनाव में जीता रहा. तभी शायद ही उन्हें अंदाजा रहा हो कि इस सब का अंत कहा जाकर होगा. शफी कहते हैं, ‘तीन दिन तक उन लोगों ने मेरे अलावा किसी को भी, मेरी और मेरे भाई की 5 बेटियों समेत, घर से बाहर नहीं जाने दिया. आतिफ को तीनों दिन अपने पास रखा यह बोलके कि अगर हमने सुरक्षा बलों को बुलाया तो वो आतिफ को मार देंगे.’

शफी इन दिनों अपने घर के सामने ही स्थित अपनी दुकान पर जाते ज़रूर थे लेकिन उनका पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर लगा रहता था कि कहीं सुरक्षा बल न आ जाएं. इस दौरान कई बार सुरक्षा बल आए भी जिसके चलते शफी ने अली और उसके साथी से कई बार निकाल जाने की विनती भी की. लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए.

और फिर आखिरकार 21 मार्च की सुबह आई. सुरक्षा बलों ने उनके घर को घेर लिया. शफी अपनी दुकान पर थे और उनके सारे घर वाले घर पर. उनके परिवार के बाकी सदस्य तो घर से निकल आए थे लेकिन शफी के भाई, अब्दुल हमीद मीर और उनका 11 साल का बेटा आतिफ अंदर रह गए. जब सुरक्षा बलों को पता चला तो बार बार ऐलान हुए. अली से बंधकों को छोड़ देने की अपील की गई. ‘आतिफ की मां ने, लोगों ने, इलाके के बुज़ुर्गों ने और सुरक्षा बलों ने-सबने अगले कई घंटे तक उससे मिन्नतें कीं लेकिन वो कुछ नहीं बोला. और आखिरकार फिर....’, कहते हुए शफी बिलख पड़ते हैं.

इस दौरान आतिफ की मां शरीफा और उनकी एक और रिश्तेदार को अंदर भेजा गया था अली से बात करने के लिए, लेकिन इस भय से कि कहीं वे उन्हें भी बंधक न बना ले वे आधे रास्ते से ही लौट आयीं. शफी के एक पड़ोसी कहते हैं, ‘हम सब को यकीन था कि वो बच्चे को छोड़ देगा, क्योंकि ऐसा कभी न सुना था न देखा था. लेकिन वो शैतान निकला.’

इसी अफरातफरी में शफी के भाई हमीद अली के चंगुल से भाग आए थे. उन्होने बाद में बताया कि अली ने उन्हें दूसरे कमरे में जाने को कहा था और इसी दौरान वे भाग आए. सत्याग्रह की काफी कोशिश के बाद भी हमीद सामने बात करने के लिए नहीं आए. जिस रिश्तेदार के घर वे रह रहे हैं वहां मौजूद एक शख्स का कहना था, ‘वो किसी से बात नहीं कर रहा है. उसकी हालत बहुत खराब है.’

बहरहाल, जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो शाम के वक़्त सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों से शफी के घर को उड़ा दिया. बाद में तीन जली हुई लाशें बरामद हुईं जिनमें से एक आतिफ की थी. आतिफ उस विस्फोट में मारा गया या उसे अली ने पहले ही मार दिया था, किसी को नहीं पता. उसकी मां शरीफा बिलखते हुए कहती हैं, ‘मुझे तो सिर्फ इतना पता है कि मेरा आतिफ एक नए स्कूल जाने वाला था और पढ़-लिख कर हमारा नाम रोशन करने वाला था. ज़ालिमों ने उसे हमसे छीन लिया.’

आतिफ की हत्या की खबर आते ही पूरा कश्मीर आक्रोश में उमड़ पड़ा. लोगों ने सोशल मीडिया पर आक्रोश जताया और इस हत्या की निंदा की. कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार मुफ़्ती इसलाह ने आक्रोश जताते हुए कहा, ‘अगर आप आतिफ, जिसको मिलिटेंट्स ने बंधक बना के मार दिया, की हत्या का शोक नहीं मना रहे हैं तो आपको कोई हक़ नहीं है उस अध्यापक की मौत पर आंसू बहाने का, जिसको पुलिस हिरासत में मार दिया गया था.’ आतिफ की हत्या पर प्रतिक्रिया न देने के लिए बहुत से लोगों ने अलगगाववादियों की आलोचना की.

हाजिन में असर

शफी की दुकान, जो अभी भी बंद ही पड़ी है, के शटर पर हरे रंग से लिखा हुआ है ‘अरहान टाउन’. अरहान, जिसका असली नाम आबिद मीर था, एक मिलिटेंट था और शफी की बहन का बेटा भी. 2017 में अरहान और उसका दोस्त नसरुल्लाह सुरक्षा बलों के साथ एक मुठभेड़ में मारे गए थे. 90 के दशक में इख़वान-उल-मुस्लिमीन (गवर्नमेंट मिलिशिया) का गढ़ रहे हाजिन में हाल के समय में एक बार फिर मिलिटेंट्स ने पैर जमा लिए थे. धीरे धीरे हाजिन में पत्थरबाज़ी भी होने लगी और आलम अब यह था कि मुख्यधारा के लोग हाजिन के अंदर कदम रखने से कतराते थे.

लेकिन आतिफ की हत्या ने चीज़ें बादल दी हैं’, अरहान के पिता अब्दुल हमीद मीर कहते हैं. मीर का इशारा था आने वाले लोक सभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार अकबर लोन के हाजिन आने और वहां हालात खराब न होने की तरफ है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘सिर्फ अकबर लोन ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह भी यहां आए थे कल और हैरत की बात यह थी कि एक भी पत्थर नहीं मारा गया, बावजूद इसके कि ये लोग लगभग एक किलोमीटर पैदल चले यहां.’

क्या आतिफ की हत्या हाजिन में अलगाववाद के प्रति नफरत पैदा करके फिर इस जगह को 90 के दशक की तरफ धकेल देगी? इस सवाल पर एक स्थानीय पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘उस तरफ शायद न भी धकेले, लेकिन लोगों में अब शायद भले-बुरे की समझ आ जाए.’ वे आगे कहते हैं कि शायद अब हाजिन के लोग कम से कम इन मिलिटेंट्स को अपने घरों में जगह देना बंद कर दें.

और शायद अब होगा भी यही. शफी के एक पड़ोसी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं कि हाजिन में इस समय बहुत गुस्सा है. नाम न छापने की शर्त पर वे बताते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि अब इन लोगों को कोई अपने घर में जगह देगा. और अब लोग शायद इस सब (अलगाववाद) से दूर ही रहें.’

फिलहाल तो हाजिन वाले सिर्फ आतिफ की हत्या का मातम मना रहे हैं.

अवंतीपोरा

और ऐसा ही मातम माना रहे हैं दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में स्थित अवंतीपोरा के लोग, जहां 19 मार्च को 29 साल के अध्यापक रिजवान असद पंडित की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. रिजवान फ़िज़िक्स में पोस्ट ग्रेजुएट थे और एक निजी स्कूल के हेडमास्टर होने के साथ साथ अपना एक कोचिंग सेंटर चलाया करते थे. अवंतीपुरा में वे काफी लोकप्रिय अध्यापक थे.

17 मार्च की शाम एक पुलिस पार्टी, जिनके साथ इलाक़े के एक आला पुलिस कर्मी भी थे, रिजवान के घर पहुंची और उन्हें अपने साथ ले गए. रिजवान के भाई मुबाशिर पंडित सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘हमें बताया गया कि रिजवान से कुछ पूछताछ करनी है. लेकिन अगले दिन जब हम रिजवान से मिलने गए तो हमसे कहा गया कि उनको श्रीनगर में स्थित पुलिस की कार्गो विंग लेके चली गयी है.’

अगले एक दिन तक रिजवान का परिवार उनसे मिलने की कोशिश करता रहा लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं चला. 19 जून की सुबह पुलिस ने सिर्फ यह कहा कि एक शख्स जिसको एक आतंक के मामले में गिरफ्तार किया गया था, पुलिस हिरासत में मर गया है. पुलिस ने रिजवान के मरने की कोई वजह नहीं बताई और कहा कि इसके लिए एक उचस्तरीय जांच बिठाई गई है. लेकिन अगले दो दिन में श्रीनगर में शुरू की गयी यह जांच बंद कर दी गयी, और उल्टा रिजवान के खिलाफ एक केस दर्ज हुआ - हिरासत से भागने की कोशिश के जुर्म में.

उधर रिजवान के शव पर गंभीर रूप से हिंसा के निशान थे, जिसने उनके घरवालों, छात्रों और आम लोगों में आक्रोश भर दिया था. सत्याग्रह से बातचीत में रिजवान के पिता असदुल्लाह पंडित कहते हैं, ‘हमारे रिजवान की निर्मम हत्या की गयी है और आलम यह है कि उसी के खिलाफ मुक़द्दमा दर्ज हो रहा है. ये नाइंसाफी नहीं है तो क्या है.’

परिवार का कहना है कि वे इंसाफ के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा. लेकिन आसपास के लोग, रिजवान के दोस्त और उनके छात्र शायद ऐसा नहीं सोचते. इसीलिए रिजवान की हत्या के दो दिन बाद ही उनके करीबी दोस्त शाहिद मंजूर ने हथियार उठाने का फैसला कर लिया. शाहिद ने हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल होकर सोशल मीडिया पर अपना एक ऑडियो डाला. इसमें इस फैसले की वजह रिजवान की मौत बताई गई थी.

शाहिद का कहना था, ‘ऐसे मरने से बेहतर है कि एक छोटी लेकिन इज़्ज़तदार ज़िंदगी जी जाये. अब जिहाद के सिवा और कोई चारा नहीं बचा है.’ और भी कुछ युवाओं, जिनमें रिजवान के छात्र भी शामिल हैं, से जब सत्याग्रह ने बात की तो उन्होंने शाहिद की बातों से सहमति जताते हुए कहा कि शायद वे भी यह कदम उठाएं.

यानी जहां एक तरफ रिजवान की हत्या ने पहले से ही मिलिटेंसी का गढ़ बन चुके दक्षिण कश्मीर में और आक्रोश भर दिया है, वहीं इस हत्या ने कश्मीरी लोगों के कुछ पुराने जख्म भी ताज़ा कर दिये हैं.

कश्मीर में हिरासत में हत्याएं

एमनेस्टी इंटरनेशनल की 1995 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कश्मीर घाटी में 1990 से लेकर 1994 तक 715 लोग सुरक्षा बलों की हिरासत में मारे गए थे. रिपोर्ट के मुताबिक उनके साथ कथित तौर पर या तो मारपीट हुई थी या फि उन्हें सीधे गोली मार दी गई थी.

यह सिलसिला रुका नहीं. कश्मीर के ‘कोलीशन ऑफ सिविल सोसाइटीज’ की मानें तो 2002 से लेकर 2009 तक राज्य में 225 लोग हिरासत में मारे जा चुके हैं. तो कुल मिलाकर यह संख्या बीते सालों में हज़ार से ऊपर चली गयी है. इन हत्याओं में आज तक सिर्फ एफआईआर दर्ज हुई हैं और जांच के आदेश दिये गए हैं, इंसाफ किसी को नहीं मिला है.

लेकिन यह सिलसिला 2011 में रुक गया था और शायद इसलिए लोग इस चीज़ को इतिहास मानने लगे थे. रिजवान की हत्या ने ये जख्म तो कुरेद ही दिये हैं, लोगों में फिर से वही भय भी पैदा कर दिया है. मुख्यधारा के राजनेताओं समेत, कश्मीर में हर किसी ने रिजवान की हत्या की निंदा की है, लेकिन रिजवान के घरवालों के साथ साथ कश्मीर में सब जानते हैं कि इस मामले में भी इंसाफ नहीं मिलेगा.

आतिफ और रिजवान की हत्याओं से उठते सवाल

कई सवाल हैं और जवाब शायद कोई नहीं. सब से अहम सवाल यह है कि क्या कश्मीरियों की जान की कोई कीमत नहीं है. आतिफ की हत्या के बाद कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि क्या सुरक्षा बलों ने यह जाने बगैर कि आतिफ ज़िंदा है या नहीं, मकान को उड़ा दिया. इस घटना को कवर करने वाल एक पत्रकार कहते हैं, ‘किसी को नहीं पता कि वो ज़िंदा था या नहीं. मुझे नहीं लगता है कि दुनिया के किसी कोने में बंधक की मौ की पुष्टि किए बिना घर को ऐसे विस्फोटकों से उड़ा दिया जाता है.’ वे पूछते हैं कि क्या कश्मीरी बच्चों का खून इतना सस्ता है कि यह जाने बिना वह ज़िंदा है या नहीं, मकान को उड़ा दिया जाता है.

पुलिस का कहना तो यही है कि आतिफ को अली ने मार दिया था लेकिन सूत्रों से बात करें तो पता चलता है कि किसी को नहीं पता था कि वह ज़िंदा है या नहीं. हाजिन में पुलिस के एक अधिकारी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘ऐसी स्थिति में मुझे नहीं लगता था कुछ और किया जा सकता था. लेकिन हां, ये किसी को नहीं पता था आतिफ ज़िंदा था या उसको अली ने मार दिया था.’

यही सवाल अवंतीपोरा में रिजवान के घरवाले और उनके रिश्तेदार भी कर रहे हैं.

‘क्या हमारा खून इतना सस्ता है?’