‘महोदय... जुलाई-2015 तक हमारे वेतन और भत्तों का उचित भुगतान किया जा रहा था. लेकिन इसके बाद यह व्यवस्था अनियमित हो गई. साल 2016 के आखिरी तीन और 2017 के शुरुआती महीनों का वेतन हमें मार्च-2018 में मिला. और फरवरी- 2017 के बाद यानी करीब दो साल से हमें कोई भुगतान नहीं किया गया है. लिहाज़ा हम कर्मचारियों के परिवार बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं...

...हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हम में से कई अपना और अपने परिजनों का उचित इलाज़ तक करा पाने में असमर्थ हो गए हैं. कईयों की बेटियों की शादी रुक गईं और कईयों को इसके लिए अपनी पुश्तैनी जमीनें बेचनी पड़ीं. हमारे बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट गई है. मकान और अन्य कर्जों की किश्तें रुक जाने की वजह हम पर कई गुना ज्यादा कर्ज़ चढ़ चुका है. कईयों को बड़े घाटे सहकर भी अपने निवेश समय से काफी पहले ही भुनाने पड़े जो उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद के लिए बचाए थे...

इस तनाव की वजह से बीते करीब तीन साल में हमारे 44 साथी असामयिक मौत का शिकार हो गए और दो ने निराश होकर आत्महत्या कर ली. हमें रोजमर्रा के जीवन में ऐसी तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है जिनका ज़िक्र यहां नहीं किया जा सकता...’

ये लाइनें उस दरख़्वास्त का लब्बोलुआब हैं जिसे हिंदुस्तान पेपर कॉर्पोरेशन (एचपीसी) के कर्मचारियों ने बीती फरवरी ‘भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय भारत सरकार’ को भेजा था. हिंदुस्तान पेपर कॉर्पोरेशन, भारत सरकार का एक उपक्रम है जिसकी दोनों पेपर मिलें असम में स्थित हैं. इनमें से नौगांव पेपर मिल (एनपीएम) मरिगांव और कछार पेपर मिल (सीपीएम) हैलाकंदी जिले में पड़ती है और एचपीसी का मुख्यालय कलकत्ता में हैं. लेकिन बीते तीन साल से एचपीसी के अस्तित्व पर भी कुछ अन्य प्रमुख सरकारी कंपनियों की तरह बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है.

एनपीएम और सीपीएम को क्रमश: 1985 और 1988 में तब स्थापित किया गया था जब असम में अतिवादी संगठन ‘यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम’ (उल्फा) अपने चरम पर था. जानकार बताते हैं कि इन दोनों मिलों ने स्थानीय युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार देकर उन्हें अतिवादी बनने से रोकने में अहम भूमिका निभाई थी.

एचपीसी के एक प्रबंधन अधिकारी के मुताबिक कंपनी में हाल-फिलहाल तक तकरीबन 1,500 कर्मचारी काम करते रहे हैं जिनके हालात का अहसास आपको उनकी दरख्वास्त से हो गया होगा. ये कर्मचारी इससे पहले भी ऐसी कई अर्ज़ियों के जरिए अपनी गुहार अलग-अलग स्तर पर लगा चुके हैं. लेकिन इनके हाथ अभी तक कुछ नहीं लगा है. इनके अलावा बताया जाता है कि करीब दो लाख स्थानीय लोगों की भी रोजी-रोटी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर इन दोनों मिलों से जुड़ी थीं. इनमें से अधिकतर काग़ज तैयार करने में प्रमुखता से काम आने वाले बांस की खेती से जुड़े थे. स्थानीय पत्रकार स्वप्निल भट्टाचार्जी बताते हैं कि दोनों मिलें बंद होने से संबंधित इलाकों के छोटे व्यवसाइयों की मानो कमर ही टूट गई है. निजी स्तर पर जुटाए आंकड़ों के आधार पर स्वप्निल का कहना है कि कछार मिल के नजदीकी बाज़ार में ही प्रतिदिन दो करोड़ रुपए का लेनदेन होता था, जो अब पूरी तरह ठप हो चुका है. तकरीबन यही हाल नागांव के भी हैं.

एचपीसी की इस बदहाली का जिम्मेदार कौन?

स्थानीय जानकार और एचपीसी के अधिकतर कर्मचारी सत्याग्रह से हुई बातचीत में कंपनी की बदहाली के लिए केंद्र की मोदी सरकार को बड़ा जिम्मेदार ठहराते हैं. एचपीसी कर्मचारी संगठन के चीफ कन्वीनर मनोबेंद्र चक्रवर्ती इस परेशानी के बारे में हमें विस्तार से बताते हैं कि 2009 से इन मिलों का उत्पादन नीचे गिरने लगा था. लेकिन इसके कारण प्राकृतिक थे. बकौल चक्रवर्ती, ‘हर पचास साल में बांस में फूल आते हैं. यह वो समय होता है जब बांस की फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है. 2007 के बाद यह समस्या सामने आई थी. लेकिन हर बार की तरह तब भी करीब चार साल बाद बांस फिर से बहुतायात में पैदा होने लगा.’

चक्रवर्ती आगे जोड़ते हैं, ‘धीरे-धीरे बांस की आपूर्ति सामान्य होने लगी. लेकिन 2012 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मेघालय में, जो कि कोयले का प्रमुख स्त्रोत था, खनन पर पाबंदी लगा दी. अब हमारे पास बांस था लेकिन कोयला नहीं. परंतु 2015 आते-आते इस हालात से भी निपट लिया गया और मिलों में उत्पादन शुरू हो गया. लेकिन जैसे ही स्थिति काबू में आई सरकार ने बिना किसी नोटिस के कछार पेपर मिल में उत्पादन बंद करने के आदेश दे दिए.’ चक्रवर्ती के शब्दों में, ‘कछार पेपर मिल मुनाफे में चलने वाली मिल है. इसलिए क्राइसिस के दौरान भी यूपीए सरकार ने इसे चलाए रखा. लेकिन मोदी सरकार बनने के सालभर बाद ही कछार मिल और मार्च-2017 में नौगांव मिल को भी बंद कर दिया गया.’

बंद पड़ी कछार मिल
बंद पड़ी कछार मिल

चक्रवर्ती इस पूरी कवायद को एक बड़ा घोटाला करार देते हैं. वे बताते हैं, ‘देशभर में कछार मिल के पेपर की इतनी भारी डिमांड थी कि छह से आठ महीने की प्रीबुकिंग रहती थी. लेकिन इस मिल के बंद हो जाने के बाद कोरिया और चीन जैसे देशों से काग़ज मंगवाया जाने लगा. जिस गुणवत्ता के पेपर के लिए हमारी लागत करीब पचास हजार रुपए प्रति टन थी उसके लिए राष्ट्रवादी सरकार अब एक लाख प्रति टन से भी ज्यादा भुगतान कर रही है. जानबूझकर देश में झूठा पेपर क्राइसिस का हौव्वा दिखाकर लोगों से कई गुना ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं. इसका बड़ा असर मध्यमवर्गीय और निचले तबके के बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है.’

एचपीसी प्रबंधन से जुड़ी वरिष्ठ कर्मचारी पामेला नंदी भी चक्रवर्ती की बातों से सहमति जताती हैं. वे कहती हैं, ‘जब कछार मिल को बंद किया गया उस समय वहां करीब पचास हजार मीट्रिक टन बांस, पंद्रह हजार मीट्रिक टन कोयला, दो हजार मीट्रिक टन चूना और दो हजार मीट्रिक टन सोपस्टोन (एसएस) पाउडर स्टोर था; जिससे दस हजार मीट्रिक टन से ज्यादा काग़ज बनाया जा सकता था. लेकिन सरकार ने जिस तरह आनन-फानन में इस मिल को बंद किया, वह न सिर्फ हम लोगों की समझ से बाहर है बल्कि शक भी पैदा करता है.’

कछार के स्थानीय विधायक कमलक्या डे पुरकायस्थ अपनी नाराज़गी हमसे साझा करते हुए कहते है कि 2016 में हुए असम विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कछार मिल के पास में एक बड़ी चुनावी रैली की थी जिसमें उन्होंने जल्द से जल्द इस मिल को शुरू करने के आश्वासन को प्रमुखता से उठाया था. लेकिन उसके तीन साल बाद भी यहां कुछ नहीं हुआ. कांग्रेस विधायक पुरकायस्थ इस मामले को दस से ज्यादा बार असम विधानसभा में उठा चुके हैं. लेकिन उनका आरोप है कि केंद्र की ही तरह प्रदेश की भाजपा सरकार ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है.

वे फ़िक्र जताते हुए कहते हैं, ‘इन मिलों को सिर्फ मुनाफ़े के लिए नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक जरूरत के हिसाब से भी शुरू किया गया था. लेकिन इनके बंद हो जाने से हमारे नौजवान फिर से अपराध की दुनिया से जुड़ने लगे हैं.’ प्रदेश के प्रमुख छात्र संगठन ‘असम गण परिषद’ के पदाधिकारी रह चुके अबंती कुमार बोरा भी पुरकायस्थ की आशंका से इनकार नहीं करते. बोरा की मानें तो, ‘यहां के अधिकतर नौजवान किसी न किसी तरह से इन मिलों से जुड़े थे. लेकिन अब सभी के सामने रोजी का संकट खड़ा हो गया है. यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो क्षेत्र में भारी अराजकता फैलने का डर है जिसे काबू में कर पाना मुश्किल होगा.’

मिलें बंद होने का मामला मानवाधिकार आयोग तक भी जा चुका है!

नौगांव मिल के ऑफिसर्स एंड सुपरवाइज़र्स एसोशिएसन के अध्यक्ष हेमंत ककाटी के मुताबिक नियमित और अनियमित कर्मचारियों को मिलाकर अब तक एचपीसी पर 500 करोड़ रुपए बकाया हैं. ककाटी की मानें तो कर्मचारियों के अलावा कंपनी पर ठेकेदार और वेंडर संस्थाओं को मिलाकर 2800 करोड़ रुपए उधार हैं. ककाटी आगे जानकारी देते हैं, ‘वेंडर इस मामले को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्युनल (एनसीएलटी) में ले गए हैं. लेकिन एनसीएलटी के नियमों के मुताबिक अधिकतम 270 दिनों के बाद भी इस मामले का कोई हल नहीं निकाला जा सका है. इस वजह से एचपीसी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की शक्तियां छीन ली गई हैं और कंपनी की नीलामी की भी घोषणा कर दी गई. लेकिन पिछले कुछ सालों में कंपनी इस स्थिति में पहुंच गई है कि इसे अब कोई खरीददार भी नहीं मिल रहा है.’

शिलचर में विरोध करते कछार मिल के कर्मचारी
शिलचर में विरोध करते कछार मिल के कर्मचारी

ककाटी आगे बताते हैं कि पिछले साल भारत सरकार ने कर्मचारियों के लिए नब्बे करोड़ रुपए का वेतन देने की घोषणा कर औपचारिकता भी पूरी कर दी, और साथ ही मामला एनसीएलटी में होने का हवाला देकर उसका भुगतान भी नहीं किया. ककाटी के मुताबिक कर्मचारियों में आवंटित न होने की वजह से ये पूरी राशि 31 मार्च को लैप्स हो गई.

इस पूरे घटनाक्रम से निराश होकर एचपीसी के कर्मचारियों ने फरवरी में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की. इस पर मानवाधिकार आयोग ने मुख्य श्रम आयुक्त को 12 फरवरी तक लिखित रूप से जवाब देने का निर्देश भी दिया था. लेकिन मनोबेंद्र चक्रवर्ती की मानें तो मानवाधिकार आयोग के इस निर्देश का पालन नहीं किया गया जिसके बाद आयोग ने आयुक्त को हाज़िर होने का निर्देश दिया है. एचपीसी के कुछ अन्य कर्मचारी का अपना रोष प्रकट करते हुए कहते हैं कि भारत की छवि को नुकसान ना पहुंचे इस कारण उन्होंने इस मुद्दे को ज्यादा हवा नहीं दी है. लेकिन यदि देश का मानवाधिकार आयोग उनके मामले को सुलझा पाने में असमर्थ दिखा तो उन्हें मजबूरन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का रुख करना पड़ेगा.

लोकसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान!

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार तिलक भट्टाचार्य का कहना है कि मिलें बंद होने की वजह से कर्मचारियों और स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश है. उनके मुताबिक ये सभी लोग इस नाराज़गी को अब तक कई बार आंदोलन की शक्ल दे चुके हैं. सूत्रों के हवाले से भट्टाचार्य संभावना जताते हैं कि अगले कुछ दिनों में होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मोदी इलाके में जो रैलियां करने वाले हैं, उनका बड़ा विरोध तय है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘इन मिलों से न सिर्फ असम बल्कि मिज़ोरम, मेघालय और त्रिपुरा राज्यों तक के लोग जुड़े हुए थे जो अब भाजपा से नाराज़ हैं. ऐसे में उत्तरपूर्व के इन राज्यों से उम्मीद लगाए बैठी भाजपा के हाथ यहां से निराशा आ सकती है.’

भट्टाचार्य बताते हैं, ‘यदि कछार और नौगांव की बात करें तो ये दोनों इलाके क्रमश: शिलचर और करीमगंज लोकसभा क्षेत्रों में आते हैं. जहां भाजपा 2014 में मोदी लहर के बावजूद जीत पाने में नाकाम रही थी. और अब मिलों की वजह से पार्टी के लिए यहां स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है. अगर यहां के नाराज़ लोगों को मना पाने में भाजपा नाकाम रहती है तो उसे इन दो सीटों की उम्मीद इस बार भी छोड़ देनी चाहिए.’

हालांकि एचपीसी के कुछ कर्मचारियों को अभी भी उम्मीद है कि चुनावों के मद्देनज़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दोनों मिलों को लेकर कोई बड़ी घोषणा कर सकते हैं. वहीं, कंपनी के कुछ अन्य वरिष्ठ कर्मचारी सत्याग्रह के माध्यम से सरकार से तंजभरी अपील करते हैं, ‘जिम्मेदारी के नाते न सही, चुनावों की ख़ातिर ही हमारी और इस सरकारी कंपनी की सुध ले लीजिए मोदी जी!’