छह फ़ीट, तीन इंच का कद, लंबा चेहरा, पतली मूंछें, चौड़ी पेशानी, चौकस आंखें और खुले हुए कंधे. मतलब वह सब जो हमारे ज़हन में किसी सेनापति के लिए उभरता है, कोडेडेरा सुबय्या थिमय्या में था. यकीनन, वे सबसे पहले और सबसे सफल भारतीय जनरल तो नहीं थे. पर हां, सबसे चर्चित सेनापति ज़रूर थे. आप कहेंगे कि यह ख़िताब तो सैम मानेकशॉ को जाता है. पर हम अगर कहें कि ख़ुद भारतीय सेना के अफ़सर थिमय्या के बारे में ऐसा मानते हैं तो फिर कुछ बात तो होगी उनमें.

जनरल थिमय्या पहले भारतीय सैन्य अफ़सर थे जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में एक ब्रिगेड का नेतृत्व किया. रिटायर्ड मेजर जनरल वीके सिंह ‘लीडरशिप इन इंडियन आर्मी’ में लिखते हैं, ‘उन्हें ‘टिम्मी साहब’ कहा जाता था. वे अपने जीवन काल में ही किवदंती बन गए थे. उत्तर कोरिया में अपनी सैन्य भूमिका के बाद वे पूरी दुनिया में जाने गए. वे इकलौते भारतीय जनरल हैं जिनकी जीवनी किसी विदेशी लेखक ने लिखी है.’ लिखने वाले थे हम्फ्री एवांस और किताब थी- थिमय्या ऑफ़ इंडिया-अ सोल्जर्स लाइफ़’. उनके बारे में यह शायद बात कम ही लोग जानते हैं.

‘टिम्मी साहब’ को दुनिया से गए कई साल हो गए हैं. पर 2018 में वे अचानक चर्चा में आए. तब कर्नाटक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में उनका जिक्र किया. उन्होंने कहा कि 1948 में भारत ने जनरल थिमय्या के नेतृत्व में कश्मीर युद्ध जीता था पर वे जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री वीके मेनन के हाथों बार-बार अपमानित किए गए और इस वजह से उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. नरेंद्र मोदी के इस बयान पर सोशल मीडिया पर काफ़ी हो-हल्ला मचा कि प्रधान मंत्री ने थिमय्या के बारे में जो कहा वह ग़लत है.

पर देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने कुछ ख़ास ग़लत नहीं कहा. 1948 में मेजर जनरल थिमय्या कश्मीर में जनरल ऑफिसर कमांडिंग थे, यानी वहां के सबसे बड़े सैन्य अफ़सर. यूं तो सेना में जनरल (सेनाध्यक्ष) से एक पोस्ट नीचे है लेफ्टिनेंट जनरल और उसके बाद मेजर जनरल (थिमय्या का पद). पर आम बोलचाल की भाषा में इन दोनों रैंक के अफ़सरों को ‘जनरल साहब’ कहा जाता है. तो फिर प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा कह भी दिया तो कोई आसमान टूटने की बात नहीं थी.

अब बात करते हैं उनके कथन के दूसरे हिस्से की. ‘...थिमय्या को नेहरू और मेनन के हाथों कई बार अपमानित होना पड़ा और उन्होंने इस्तीफ़ा दिया’. बात यह है कि थिमय्या बड़े बेबाक अफ़सर थे. तत्कालीन रक्षा मंत्री साम्यवादी वीके कृष्ण मेनन से उनके सैद्धांतिक मतभेद थे. भारतीय सेना के आधुनिकरण के लिए उन्होंने कई बार आवाज़ उठाई. उन्होंने सुझाव दिया कि भारत में बेल्जियम से लाइसेंस लेकर एफएन 4 ऑटोमेटिक राइफल बनाई जाए. इस पर मेनन ने कहा कि चाहे जो हो जाए, वो नाटो देश की बंदूकें भारत में नहीं आने देंगे. जहां थिमय्या भारत के लिए चीन को सबसे बड़ा ख़तरा मानते थे, मेनन की नज़र में देश को पाकिस्तान से सावधान रहने की ज़रूरत थी.

दोनों के बीच दरार तब बढ़ गई जब मेनन ने मेजर जनरल बृज मोहन कौल को उत्तर पूर्वी कमांड का जीओसी बनाने की बात कही. उधर, जनरल थिमय्या की नज़र में बीएम कौल को फ़ील्ड ऑपरेशन्स का तजुर्बा नहीं था और चीन के नज़दीक होने की वजह से उत्तर-पूर्व कमांड महत्त्वपूर्ण थी. इस मुद्दे पर दोनों में तू-तू मैं-मैं हो गई. कड़वा बोलने के लिए प्रसिद्ध मेनन ने उन्हें अमेरिकी एजेंट कह दिया. इससे नाराज़ होकर थिमय्या ने नेहरू को पत्र लिखा कि रक्षा मंत्री और उनके बीच एक ही व्यक्ति रह सकता है, लिहाज़ा वे इस्तीफ़ा दे रहे हैं. मीडिया में यह बात लीक हो गई. विपक्ष ने मेनन को दोषी मानते हुए उनके इस्तीफ़े की मांग की. सरकार के पक्षधर अख़बारों में भी हेडलाइनें छपने लगीं कि ‘मेनन जाएं, थिमय्या नहीं’. पूरे देश में लोग थिमय्या के पक्ष में खड़े हो गए.

खैर, जवाहरलाल नेहरू के बीचबचाव के बाद मामला शांत हुआ. नेहरू ने थिमय्या से इस्तीफ़ा वापस लेने को कहा और यह भी कि वे मेनन को समझायेंगे. थिमय्या मान गए पर नेहरू ने मेनन के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की. जानकार मानते हैं कि उन्होंने जब कदम उठा लिया था तो उस पर टिके रहना था. मेजर जनरल वीके सिंह लिखते हैं ‘उसके बाद थिमय्या वह थिमय्या नहीं थे जिसके लिए वे जाने जाते थे’. तो तथ्यात्मक रूप से मोदी ग़लत हो सकते हैं पर भावनात्मक तौर पर नहीं.

बदकिस्मती से जब थिमय्या रिटायर हुए तो चीन के साथ सीमा विवाद चरम पर था और इससे निपटने के लिए देश तैयार नहीं था. सैनिकों को संबोधित करते हुए विदाई भाषण में थिमय्या ने कहा, ‘मैं आशा करता हूं कि मेरे सैनिक चीन की तोपों के आगे बेबस खड़े नज़र न आएं. ईश्वर तुम सबकी रक्षा करे.’ चीन से युद्ध में हमें ज़बरदस्त हार मिली थी. इस पर अफ़सोस करते हुए जनरल थिमय्या ने कहा था कि काश वे नेहरू को समझा पाते!

अब बातें उनके सैनिक जीवन की. थिमय्या ने भारत विभाजन के ऑपरेशन की कमान संभाली थी और उसके बाद कश्मीर युद्ध. देखा जाए तो1947 में हुई कारगिल की पहली लड़ाई के नायक वही थे. तब कबायलियों ने कारगिल और द्रास के साथ श्रीनगर और लेह को जोड़ने वाले जोजिला दर्रे पर भी कब्जा कर लिया था. पूरे आसार थे कि लेह पर भी उनका कब्जा हो जाता. ऐसे में जनरल थिमय्या ने एक साहसी योजना बनाई. उन्होंने अपने इंजीनियरों को जोजिला पास तक एक वैकल्पिक रास्ता बनाने को कहा. आठ किलोमीटर लंबा यह रास्ता बनाने में तीन हफ्ते से भी कम का वक्त लगा. इसके बाद जनरल थिमय्या ने 12 हजार फीट की ऊंचाई पर टैंक चढ़ा दिए. यह कारनामा पहले कभी नहीं हुआ था. इतनी ऊंचाई पर टैंक देखकर हमलावरों की सांस उखड़ गई. कारगिल और द्रास फिर भारत के कब्जे में आ गए. लेह भी बच गया. यह जीत भारतीय सेना के इतिहास की सबसे बड़ी कामयाबियों में गिनी जाती है.

उनको तीसरा बड़ा मौका 1953 में मिला. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र ने तटस्थ राष्ट्रों की सेना में भारत से अपने सैनिक भेजने और उस सेना की भारतीय कमांडर द्वारा अगुवाई करने का आग्रह किया. नेहरू की पसंद पर थिमय्या को भेजा गया. नेहरू ने उन्हें सलाह दी कि वे हर हाल में तटस्थ रहें और किसी एक पक्ष की ओर न झुकें. उन्होंने ऐसा ही किया. उन्होंने 22,000 कम्युनिस्ट सैनिकों को उनके घर भेजने के मसले को बड़ी सूझ-बूझ से हल किया था. संयुक्त राष्ट्र और दुनिया ने उनकी भूमिका की तारीफ़ की और सरकार ने उन्हें पद्म भूषण सम्मान से नवाज़ा.

एक सैनिक के लिए बहादुरी के साथ भाग्यशाली भी होना ज़रूरी है. नेपोलियन बोनापार्ट सेनापति का चुनाव करते के वक़्त अकसर पूछा करता कि क्या वह सेनापति किस्मत वाला होगा. थिमय्या एक बार नहीं, कई बार भाग्यशाली साबित हुए थे. वीके सिंह ने ज़िक्र किया है कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा की लड़ाई में ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी जापानियों के हाथों बुरी तरह हारी थी. हार का ठीकरा ग़लत तरीके से उनके सिर पर फोड़ा गया. एक रोज़ उन्होंने अधिकारियों की इज़ाज़त के बिना जापानी सेना पर हमला बोल दिया और करीब 100 जापानी मार गिराए. किस्मत से उनकी टुकड़ी का एक भी जवान घायल नहीं हुआ. उनके ब्रिटिश अफसर ने उन्हें डांटा पर हिम्मत की दाद देते हुए कहा कि वे किस्मतवाले हैं और अगर एक भी सैनिक मारा जाता तो उन्हें मुश्किल हो जाती.

जनरल थिमय्या की यारबाज़ी के क़िस्से भी कम दिलचस्प नहीं हैं. आजादी के पहले की बात है. वे पांच मद्रास बटालियन के मास्टर गनर थे. एक रोज़ एक ख़ूबसूरत लड़की से उनकी मुलाकात हुई जो गवर्नर से काफ़ी प्रभावित थी. उनकी उम्र यही कोई 30 साल रही होगी. जवानी भरपूर थी और जूनून बेलगाम. बस लड़की से कह दिया वे उनके लिए किसी गवर्नर से कम नहीं है. और कल उसकी शान में फ़ौज 31 तोपों की सलामी देगी. लड़की ने मज़ाक समझकर बात अनसुनी कर दी. अगले दिन सुबह-सुबह मद्रास शहर में छह तोपें एक साथ गरज उठीं. उनके साथियों को लगा कि आज तो बस थिमय्या की पेशी हो जाएगी. वे बच गए क्यूंकि मास्टर गनर के अधिकार में मौजूद तोपों के रखरखाव के लिए उनकी समय-समय पर टेस्टिंग करनी ज़रूरी होती थी. उन्होंने रिपोर्ट में छह तोपों की टेस्टिंग दिखा दी!

बात आज़ादी की चल रही है तो एक दास्तां यह भी. एक रोज एक सिनेमा हाल में जनरल थिमय्या की मुलाकात मोतीलाल नेहरू से मुलाकात हुई. तंज़ कसते हुए मोतीलाल ने पूछा कि अंग्रेज़ी वर्दी में कैसा लगता है? वे बोले ‘एकदम हॉट’. कुछ समय बाद दोनों में दोस्ती हो गई. एक दफ़ा उन्होंने मोतीलाल से गुज़ारिश कि के वे फ़ौज छोड़कर कांग्रेस में भर्ती होना चाहते हैं. मोतीलाल नेहरू ने मना करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद देश को काबिल अफ़सरों की ज़रूरत रहेगी.

बतौर कर्नल जनरल थिमय्या कुमाऊं रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे और इसलिए इस रेजिमेंट से उनका भावनात्मक जुड़ाव रहा. वर्दी में अपना अंतिम दिन उन्होंने इसी रेजिमेंट में बिताया था! कुछ इसी प्रकार सैम मानेकशॉ 3 पंजाब से लगाव रखते थे. रानीखेत स्थित कुमाऊं रेजिमेंट का गौरवशाली इतिहास है. 1948 और 1962 की लड़ाईयों में इस रेजिमेंट के जवानों और अफ़सरों ने अद्भुत शौर्य का परिचय दिया था. इसके मुख्य द्वार पर लिखा हुआ है- ‘लव आल, ट्रस्ट नन’ यानी ‘मुहब्बत सबसे करो, भरोसा किसी पर नहीं!’