घर हो या कार्यक्षेत्र, भारत में लैंगिक असमानता की जड़ें बहुत गहरी हैं. पर चुनाव एक ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाओं ने अपनी मौजूदगी का न सिर्फ़ अहसास कराया है बल्कि बदलाव लाने में एक बड़ी भूमिका भी निभाई है. भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी पर लिखे एक चर्चित‌ शोधपत्र में इंडियन बिज़नेस स्कूल के मुदित कपूर और अमेरिकी थिंकटैंक ब्रूकलिन इंस्टीट्यूट की शमिका रवि के शब्दों में कहा जाए तो ‘चुनावों में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह बदलाव सरकार में बैठे लोगों की बनाई नीतियों का नतीजा न होकर महिलाओं के अपने सशक्तिकरण के लिए उनके द्वारा उठाया स्वैच्छिक क़दम है.’ वे इसे निशब्द क्रांति का दर्जा देते हैं. हालांकि यह क्रांति सही मायनों में उनकी राजनीतिक हैसियत को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभा सकी है.

आंकड़े बताते हैं कि 1950 के दशक में मतदाता के तौर पर महिलाओं की भागीदारी 38.8 फ़ीसदी थी. 60 के दशक में यह भागीदारी बढ़कर लगभग 60 फ़ीसदी तक पहुंच गई जबकि इस बीच पुरुषों की भागीदारी में सिर्फ़ चार फ़ीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. पिछले कुछ समय के आंकड़ों को देखें तो 2004 में मतदान करने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं से 8.4 प्रतिशत ज़्यादा थी जबकि 2014 आते-आते बढ़त का यह आंकड़ा महज़ 1.8 प्रतिशत रह गया. 2014 में अरुणाचल प्रदेश, बिहार, गोवा, मणिपुर, तमिलनाडु, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उड़ीसा समेत कुल 16 राज्य ऐसे थे जहां महिलाओं ने पुरुषों से ज़्यादा मतदान किया.

लेकिन इसके बावजूद अब भी पुरुषों की अपेक्षा राजनीतिक गलियारों में महिलाओं की मौजूदगी कम है. जानकारों के मुताबिक इसकी एक वजह भारत का ख़राब लैंगिक अनुपात है. 2011 की जनगणना के मुताबिक़ प्रति 1000 पुरुषों पर लगभग 943 महिलाएं हैं. ऊपर से इन महिलाओं का एक मतदाता के तौर पर पंजीकरण भी काफी कम है.

पर अब तो तमाम रुकावटों के बावजूद मतदान करने के लिए निकलने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या के नज़दीक आ पहुंची है. तो फिर तमाम राजनैतिक पार्टियां महिलाओं को एक वोट बैंक और नीति निर्धारक की भूमिका में क्यों नहीं देख पा रही हैं?

इसके लिए सबसे पहले तो हम यह समझते हैं कि वोट बैंक क्या होता है. वोट बैंक मतदाताओं का एक ऐसा समूह है जो सम्मिलित रूप से अपने हितों को ध्यान में रखते हुए किसी एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान करे. ऐसा करने के लिए उसे बेहद संगठित होने की ज़रूरत होगी. क्या महिलाएं इतनी संगठित हैं या हो सकती हैं?

अमेरिका में रह रहीं भारतीय लेखिका पूनम डोगरा इस सवाल पर एक और सवाल करती हैं. वे पूछती हैं, ‘कितनी महिलाएं हैं जो राजनीतिक रूप से जागरूक हैं? पढ़ी-लिखी महिलाओं में भी कितनी हैं जो स्वतंत्र सोच रखती हैं? अधिकतर जो उनके घर के पुरुष सोच रखते हैं, वही स्वतः उनकी भी हो जाती है? ज़ाहिर है कि राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि उनके पुरुषों की सोच प्रभावित कर लो तो उनका वोट भी वहीं जाएगा. इसीलिए वे अलग से महिलाओं को प्रभावित करने के प्रयास नहीं करतीं.’

बेशक ज़मीनी हालात अब भी ऐसे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में इस लोकतंत्र की गंगा में काफी पानी बहा भी है. महिलाओं की मांग पर हम बिहार में नीतीश कुमार को शराबबंदी जैसा क़दम उठाते देख चुके हैं. बहुत से जानकार मानते हैं कि सही नेता मिलने और सही मुद्दे उठाए जाने की स्थिति में महिलाएं एक ब्लॉक बन सकती हैं. लेकिन आज के हालात में न तो उनके पास सक्षम और दूरदर्शी नेतृत्व है और न सही मुद्दे. निचले स्तर पर तो आरक्षण मिलने के बाद न सिर्फ़ स्थानीय निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है, बल्कि राजनीति में उनकी रुचि भी बढ़ी है. पर दुखद यह है कि विधानसभा और संसद के चुनावों में अब भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम है. देश की आबादी में 48.1 फ़ीसदी की हिस्सेदारी रखने वाली महिलाओं का मौजूदा लोकसभा में प्रतिनिधित्व 12.1 फ़ीसदी की छोटी सी संख्या पर सिमटा हुआ है.

भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के अब तक घोषित किए गए उम्मीदवारों की सूचियां देखी जाएं तो आने वाले चुनावों में भी इस अनुपात के बेहतर होने के कोई आसार नहीं दिखते. ये सूचियां बताती हैं कि बड़ी पार्टियों ने महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के लिए कोई कोशिश नहीं की है. जबकि सर्वे बताते हैं कि मतदाता चाहते हैं कि उन्हें अधिक महिला प्रत्याशी मिलें. ‘मेरी बहनो और भाइयो’ से अपने भाषण की शुरुआत करने वाली प्रियंका गांधी ने शायद महिलाओं को मुस्कुराने का मौक़ा ज़रूर दिया है, पर वे इससे ज्यादा कुछ करेंगी या कर पाएंगी, यह आने वाला समय बताएगा.

भारतीय महिलाओं के लिए दुर्भाग्य की बात यह भी रही है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जैसे पदों पर पहुंचकर मजबूत नेता के तौर पर सामने आईं महिला नेताओं ने भी महिलाओं को एकजुट करने या उनकी समस्याओं पर अलग से ध्यान देने या उनका नेतृत्व विकसित करने की कोशिश नहीं की. 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले हमने पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी, तमिलनाडु से जयललिता और उत्तर प्रदेश से मायावती को प्रधानमंत्री बनकर दिल्ली जाने की कोशिश तो करते देखा, लेकिन इन महिलाओं में एक महिला नेता होने से इतर महिलाओं की नेता होने की कोई उम्मीद नहीं मिली. हमने इन्हें विशेष तौर पर महिला केंद्रित नीतियां बनाते और महिलाओं को आगे लाते नहीं देखा.

ऐसा भी नहीं है कि तमाम पार्टियां और नेता महिलाओं को लुभाने के लिए कोशिश नहीं करते. लेकिन ऐसी अधिकतर कोशिशें कोई बदलाव लाने की बजाय यथास्थिति को बरकरार रखते हुए अपना चुनावी लक्ष्य साधने के लिए की जाती रही हैं. फिर चाहे वह बिहार में ग्रेजुएशन पूरी करने वाली लड़कियों को 25,000 रुपए देने या साइकिल देने की स्कीम हो या फिर कर्नाटक में सिद्दारमैया सरकार की शादी भाग्य योजना.

केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को भी तीन-तलाक मामले पर मुस्लिम वोट बैंक के भीतर से एक मुस्लिम महिला वोट बैंक तोड़ने की कोशिश करते देखा जा चुका है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जीत के बाद उनके नेताओं ने बार-बार यह कहने की कोशिश की कि मुस्लिम महिलाओं ने उन्हें वोट दिया है. इसी तरह केंद्र सरकार की उज्जवला योजना हो या महिला-ई-हाट, इनमें से ज्यादातर योजनाएं महिलाओं की सतही मदद ही करती नज़र आती हैं. ये महिलाओं को उस स्तर पर सशक्त नहीं करतीं जहां वे अपने मसलों में खुद निर्णय लेने की भूमिका में आ सकें.

हालांकि तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी द्वारा घोषित प्रत्याशियों की सूची में 41 फ़ीसदी महिलाओं का होना उम्मीद देता है. ऐसी ही एक उम्मीद महिला आरक्षण विधेयक से लगाई जा सकती है जो अगर पारित हो जाए तो नीतियां बनाने वाले गलियारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व तो बढ़ेगा ही, नीति निर्धारण में भी उनका असर देखने को मिलेगा. लेकिन यह तो करने वाले करेंगे उन पर ऐसा करने के लिए दबाव डालने का काम सही और ज्यादा मतदान के जरिये भी किया जा सकता है.

हर बार की तरह इस बार वोट डालने जा रही महिलाओं में उन लड़कियों की बड़ी संख्या भी होगी जो हाल ही में 18 साल की हुई हैं. आने वाले समय में हो सकता है कि ये लड़कियां लड़कों से ज़्यादा पढ़ी-लिखी हों. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2016 में जहां लड़कों का स्कूल में नामांकन 74.59 फ़ीसदी था वहीं लड़कियों के लिए यह प्रतिशत उनसे ज़्यादा, 75.8 था. फ़रवरी 2019 में कराए गए द क्विंट और लोकनीति-सीएसडीएस के एक सर्वे में पहली बार मतदान करने जा रही 68 फ़ीसदी लड़कियों ने कहा कि महिलाओं को पुरुषों की बराबरी पर आकर राजनीति में भागीदारी निभानी चाहिए. हर पांच में से तीन लड़कियों ने यह भी माना कि वे बिना परिवार के असर में आए अपनी मर्ज़ी से मतदान करेंगी.

यहां पर एक सवाल यह भी बनता है कि क्या लोकतंत्र की प्रक्रिया में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को हमें आम नागरिक की भागीदारी की तरह देखना चाहिए, या इसे महिला की भागीदारी के रूप में भी देखा जा सकता है? जवाब के लिए हम एक बार और मुदित कपूर और शमिका रवि के शोधपत्र पर नज़र डाल सकते हैं. यह दिखाता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अलग कारणों से मतदान करती हैं. इस शोधपत्र में वे बिहार में साल 2005 में दो बार हुए विधानसभा चुनावों को आधार बनाकर महिलाओं और पुरुषों के चुनावी व्यवहार का अंतर स्पष्ट करते हैं.

फरवरी 2005 में बिहार में हुए पहले विधानसभा चुनाव में जब किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो वहां अक्टूबर में दोबारा चुनाव कराने पड़े. इस चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों से ज़्यादा संख्या में मतदान किया. यही नहीं, जिन निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने ज़्यादा संख्या में मतदान किया वहां पिछली बार जीते विधायक को नहीं चुना गया. शोधपत्र के मुताबिक इस एक केस स्टडी कहा जा सकता है क्योंकि इस चुनाव में महिलाएं बदलाव के एजेंट की भूमिका निभा रही थीं और पुरुषों की पिछलग्गू होकर मतदान नहीं कर रही थीं. शमिका कहती हैं, ‘पुरुष जहां यथास्थिति को बढ़ावा देते हैं, वहीं महिलाएं बदलाव को चुनती हैं.’

आम मतदाताओं से बात करने पर ज़ाहिर होता है कि पुरुषों की अपेक्षा महिला मतदाता बिजली, पानी, सुरक्षा और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर ध्यान देने वाले प्रत्याशी की बात करती हैं. वे उन मुद्दों पर वोट देने की बात करती हैं जो उन्हें सीधे-सीधे प्रभावित करते हैं. पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई जाट की निम्न आय वाली बसावट में अपने घर के सामने बैठकर काग़ज़ के लिफ़ाफ़े बना रही गुजरी देवी कहती हैं, ‘मैं उसे वोट दूंगी जिसने मुझे पेंशन दी है.’ दिल्ली की बाकी महिलाएं भी बेहतर बिजली-पानी देने वाले को फिर वोट देने की बात करती हैं.

याचिकाओं पर हस्ताक्षर के लिए कैंपेन करने वाली वेबसाइट चेंज.ओआरजी का एक ऑनलाइन सर्वे भी इस बात की पुष्टि करता है. सर्वे के मुताबिक़ कुल 39 मुद्दों में से जिन मुद्दों को महिलाओं ने महत्वपूर्ण माना वे थे - महिलाओं की सुरक्षा, बेहतर कचरा निस्तारण, तेज़ न्याय व्यवस्था, प्रदूषण, बेहतर पानी और बिजली. उधर, पुरुषों ने महिला सुरक्षा को 15वें नंबर पर रखा. सर्वे में यह बात भी साफ हुई कि पुरुषों की तुलना में बहुत कम महिलाओं को इस बात से फ़र्क़ पड़ता है कि प्रत्याशी किस पार्टी का है. और 66.54 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 70.3 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे प्रत्याशी के पिछले रिकॉर्ड के आधार पर उसके पक्ष में मतदान करने का फ़ैसला करेंगे.

महिलाओं का निर्णय लेने में शामिल होना इसलिए भी जरूरी है कि वे अगर एक मतदाता के रूप में अलग तरह से सोचती हैं तो वे फैसले भी अलग तरह से ले सकती हैं. शोध बताते हैं कि यदि महिलाएं नीतियां बनाने में भूमिका निभाती हैं तो वे अधिक उदारवादी होती हैं. उदाहरण के लिए उनका स्वास्थ्य, शिक्षा या बाल कल्याण जैसे बुनियादी मुद्दों पर काफी ज़ोर होता है.