राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती. हाल तक विपक्षी पार्टियां अपनी एकजुटता का संदेश देने की पूरी कोशिश कर रही थीं. उनके सारे नेता आपस में मिल-जुल रहे थे. इसी जनवरी में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने कोलकाता में जो जनसभा बुलाई थी इसमें लगभग सभी प्रमुख भाजपा विरोधी पार्टियों के नेता शामिल हुए थे. माना जा रहा था कि इस बार विपक्षी दल एक साथ मिलकर भाजपा को कड़ी टक्कर देने की तैयारी में हैं.

लेकिन, चुनाव आते-आते हालात बदलते दिख रहे हैं. अलग-अलग राज्यों में विपक्षी गठबंधन के बीच दरार साफ-साफ नजर आ रही है. खुद ममता बनर्जी के राज्य पश्चिम बंगाल में ही विपक्षी एकता में सबसे बड़ी दरार पैदा हो गई है. बीती 27 मार्च को सीपीएम ने मालदा-उत्तर सीट से अपने उम्मीदवार विश्वनाथ घोष को मैदान में उतार दिया है. इससे पहले 20 मार्च को इस सीट के साथ तीन अन्य सीटें- मालदा-दक्षिण, बेहरामपुर और जांजीपुर -कांग्रेस के लिए छोड़ी गई थीं. साल 2014 के चुनाव में इन चारों सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. सीपीएम के इस फैसले पर कांग्रेस ने कहा है कि वह अपने बूते राज्य की सभी 42 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. उधर, वामदल -सीपीएम, सीपीआई, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी- एक साथ 42 सीटों पर लड़ने की तैयारी करते दिख रहे हैं.

इससे पहले सीपीएम और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन को लेकर भी चर्चा थी. लेकिन, यह परवान नहीं चढ़ सका. यहां तक कि उन छह सीटों पर, जिन पर साल 2014 के चुनाव में दोनों पार्टियों ने जीत दर्ज की थी, भी कोई रणनीतिक समझौता नहीं हो पाया. पहले दोनों ने इन सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार न उतारने की बात कही थी. लेकिन, अब सीपीएम द्वारा मालदा-उत्तर सीट पर उम्मीदवार उतारने और अकेले चुनाव लड़ने के कांग्रेस के एलान के बाद गठबंधन की बची-खुची संभावना भी खत्म हो गई है.

यानी अब पश्चिम बंगाल का चुनावी मैदान पूरी तरह सज चुका है. मैदान में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस, राज्य में तेजी से पैर पसारती भाजपा और हाशिये पर जाते वाम दल और कांग्रेस हैं. पहली नजर में माना जा सकता है कि इस बार चौतरफा लड़ाई है. लेकिन, जमीनी राजनीतिक हकीकत को देखते हुए यह लड़ाई दोतरफा यानी तृणमूल और भाजपा के बीच दिख रही है. इसके पीछे कई कारण हैं. इन सभी को एक-एक करके देखते हैं.

पिछले आम चुनाव के बाद भाजपा की लगातार मजबूत होती स्थिति

लोकसभा सीटों की बात करें तो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 42 सीटें हैं. इसके बावजूद इस राज्य में भाजपा अब तक अपनी पकड़ नहीं बना पाई. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने दो सीटें-दार्जिलिंग और आसनसोल - हासिल की थीं. दार्जिलिंग में उसकी जीत के पीछे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन की बड़ी भूमिका थी.

पिछले आम चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर 17 फीसदी था. इसके बाद पार्टी ने लगातार राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है. यह कितनी कामयाब रही है, इसकी पुष्टि पिछले साल के पंचायती चुनाव के नतीजे करते हैं. इनमें भाजपा तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी के रूप में सामने आई और उसने दूसरा पायदान हासिल किया. इससे पहले साल 2017 के नगर निकाय चुनाव में भी भाजपा तृणमूल के बाद दूसरे स्थान पर थी. 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को केवल 10.2 फीसदी वोट मिले थे लेकिन, 2011 के चुनाव के लिहाज से देखें तो तब भाजपा को मिले वोट प्रतिशत से यह आंकड़ा ढाई गुना अधिक था.

सभी फोटो : हेमंत कुमार पाण्डेय
सभी फोटो : हेमंत कुमार पाण्डेय

चुनावी नतीजों से इतर राज्य में भाजपा संगठन की स्थिति के बारे में बात करें तो तृणमूल की तुलना में यह काफी कमजोर दिखता है. लेकिन, इस कमी को पूरा करने के लिए पिछले कुछ समय के दौरान पार्टी में लगातार दूसरे दलों के बड़े नेताओं को न केवल शामिल किया गया है बल्कि उन्हें टिकट भी दिया गया है. बताया जाता है कि राज्य के लिए घोषित भाजपा उम्मीदवारों में से एक-चौथाई दूसरे दलों से आए हुए नेता हैं.

कांग्रेस और वाम दलों का हाशिए पर जाना

राज्य की राजनीति में एक ओर भाजपा जितनी तेजी से ऊपर उठी है, कांग्रेस और वाम दलों का पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ है. इन पार्टियों के कई बड़े नेता और कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में शामिल हो चुके हैं. बीते जनवरी में मालदा उत्तर से कांग्रेस सांसद मौसम नूर ने तृणमूल का दामन थाम लिया. वहीं, इस साल की शुरुआत में कांग्रेस के विधायक दुलाल बर और सीपीएम के विधायक खगेन मुर्मू ने भाजपा की सदस्यता ली थी.

गंगा नदी पर स्थित फरक्का ब्रिज के किनारे स्थित न्यू फरक्का के रहने वाले इंसान खान बताते हैं, ‘मुर्शिदाबाद और मालदा का इलाका कांग्रेस का रहा है. लेकिन अब पार्टी धीरे-धीरे कमजोर रही है. पार्टी के कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं.’ यह हाल कांग्रेस का ही नहीं, वाम दलों खासकर सीपीएम का भी है. वे कहते हैं, ‘सीपीएम में अब तो केवल बूढ़े लोग बचे हुए हैं, जो लाल रंग का झंडा उठाए हुए हैं. पार्टी के पास अब शक्ति नहीं है इसलिए इसका लोग पार्टी छोड़कर जा रहा है.’ इंसान की मानें तो इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता पहले तृणमूल के साथ जा रहे थे. लेकिन, अब वे बड़ी संख्या में भाजपा में भी शामिल हो रहे हैं.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति

बीते तीन-चार वर्षों के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा का विस्तार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण साथ-साथ बढ़ते दिखे हैं. अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगातार राज्य में हिंदुओं के उत्पीड़न और मुसलमानों के तुष्टिकरण को लेकर ममता बनर्जी की सरकार पर निशाना साधती रही है. बीते पखवाड़े अमित शाह ने मौलवियों को वेतन और मदरसों की फंडिंग पर सवाल उठाया था. उन्होंने कहा कि यदि मौलवियों को वेतन दिया जा रहा है तो पुजारियों को क्यों नहीं. इससे पहले वे हिंदुओं को रामनवमी में जुलूस निकालने से रोके जाने को लेकर ममता सरकार पर निशाना साधते रहे हैं.

सत्याग्रह ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिणी दिनाजपुर और सिलीगुड़ी का दौरा किया. इस दौरान सांप्रदायिक धुव्रीकरण का बढ़ता ताप साफ-साफ नजर आया. सिलीगुड़ी में ऑटो रिक्शा चालक चित्तरंजन गोस्वामी का कहना था, ‘जहां-जहां मुसलमानों की आबादी अधिक है, वहीं हिंदू-मुसलमान फसाद होता रहता है.’ हालांकि, भाजपा को इसका कितना चुनावी फायदा होगा, इसे लेकर मतदाता अनिश्चित ही दिखे. गोस्वामी की मानें तो यदि यह चलन बढ़ता है और सारे हिंदू एक साथ आते हैं तो भाजपा को फायदा होगा.

वहीं, मालदा में ई-रिक्शा चालक दिलीप मंडल ने राज्य सरकार की नीति पर सवाल खड़ा किया. उनका कहना था, ‘ममता दीदी ने अगर मौलवी को वेतन देना शुरू किया तो मंदिर के पुजारियों को भी देना चाहिए. ऐसा नहीं करके वो हिंदुओं के साथ गलत कर रही हैं.’ दिलीप का आगे कहना था, ‘इस बार तृणमूल और भाजपा के बीच मुकाबला होगा. कांग्रेस और सीपीएम बाहर है.’ मालदा के एक कारोबारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘पहले के चुनावों में हिंदू और मुसलमान का मुद्दा अधिक नहीं उठता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह बढ़ता जा रहा है.’ वे सवालिया लहजे में आगे कहते हैं, ‘अब बताइए कि यदि सरकार किसी एक का अधिक ख्याल रखेगी तो दूसरा नाराज होगा कि नहीं? सरकार को चाहिए कि सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करे.’

मालदा टाउन रेलवे स्टेशन
मालदा टाउन रेलवे स्टेशन

राज्य में भाजपा और सांप्रदायिक हिंसा के बीच संबंध की पुष्टि चुनावी नतीजे भी करते हैं. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन सीटों पर कब्जा किया था. इनमें एक सीट मालदा स्थित वैष्णबनगर भी थी. इसी सीट के तहत कालियाचक प्रखंड भी आता है. कालियाचक में विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले तीन जनवरी, 2016 को दो समुदायों के बीच हुई हिंसक झड़प ने बाद में सांप्रदायिक रूप ले लिया था. इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं वक्त-वक्त पर सामने आती रही हैं. मालदा को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है. साल 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने मालदा-उत्तर और मालदा-दक्षिण दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन, इस क्षेत्र में अब भाजपा की पकड़ धीरे-धीरे मजबूत होती हुई दिख रही है.

साल 2014 के बाद से पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी की पुष्टि गृह मंत्रालय के आंकड़े भी करते हैं. लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मंत्रालय ने बताया कि साल 2017 में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा के कुल 58 मामले सामने आए थे. साल 2014 में यह आंकड़ा 16 था. इसके बाद 2015 में यह बढ़कर 27 हुआ और फिर 2016 में 32. यानी 2014 से 2017 के बीच इस तरह की घटनाओं में 360 फीसदी बढ़ोतरी देखी गई.