जब राजीव गांधी 1989 में चुनाव हार गए थे , उसके बाद पत्रकार वीर सांघवी ने उनसे एक बातचीत की थी. सांघवी ने उनसे पूछा कि उनकी नजर में उनके कार्यकाल की दो सबसे बड़ी ग़लतियां क्या थीं. बाद में उन्होंने लिखा कि राजीव गांधी ने जो जवाब दिया वह अप्रत्याशित था. राजीव गांधी ने कहा कि उनकी दो सबसे बड़ी ग़लतियां थीं - शरद पवार की पार्टी कांग्रेस (एस) का कांग्रेस में विलय और जम्मू कश्मीर में फ़ारुख अब्दुल्ला के साथ सरकार बनाना.

राजीव गांधी ने दोनों बातों का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि कांग्रेस और कांग्रेस (एस ) महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनैतिक ताक़तें थीं. जब दोनों मिल गईं तो विपक्ष की जगह ख़ाली हो गई और इस शून्य को भरने के क्रम में भाजपा और शिवसेना मज़बूत हो गईं जो तब तक महाराष्ट्र में हाशिये की ताक़तें थीं. इसी तरह जब जम्मू कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के एक साथ मिल जाने से कोई विपक्ष ही नहीं रहा और और इस ख़ाली जगह को उग्र अलगाववादियों ने हथिया लिया.

ये उदाहरण क्या बताते हैं? यही कि लोकतंत्र में यह ज़रूरी है कि एक मज़बूत विपक्ष रहे, वरना उस शून्य को ऐसी ताक़तें भर सकती हैं जो सत्तापक्ष या लोकतंत्र के लिए भी भारी पड़ जाएं. बल्कि अगर सत्तापक्ष बहुत ज्यादा मज़बूत है तो उसे अपनी ओर से यह कोशिश करनी चाहिए कि वह विपक्ष को उसकी ताक़त के मुक़ाबले ज्यादा सम्मान दे ताकि लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे. इसीलिए चुनावों में विरोधियों को हराने की कोशिश करना जायज़ है लेकिन उन्हें नेस्तनाबूद करने की कोशिश लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हो सकती है.

यह बात इस वक्त इसलिए कि फ़िलहाल भारत की राजनीति जिस तरह चल रही है, ख़ास तौर पर सत्तारूढ़ भाजपा की नीति जो विपक्ष को रौंदने की है, वह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है. कांग्रेस को हराने की कोशिश करना एक जायज़ लोकतांत्रिक कोशिश है लेकिन ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का नारा लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. न ही विपक्ष को आतंकवादियों या पाकिस्तान का समर्थक बता कर उसकी देशभक्ति पर कीचड़ उछालना कोई जायज़ रणनीति है

यूं रणनीति के तौर पर भी इसकी उपयोगिता संदेहास्पद है क्योंकि पिछले कुछ वक्त से यह मामला उलटता हुआ दिखाई दे रहा है. कांग्रेस आज़ादी के बाद से ही कोई जुझारू पार्टी नहीं रही थी क्योंकि ज़्यादातर वक्त वह सत्ता में रही. लेकिन जब उसके अस्तित्व पर संकट आया तो वह जूझने के लिए तैयार हो गई. पिछले कई विधानसभा चुनावों में उसने भाजपा का मुक़ाबला उसी के स्तर पर आकर किया और सफलता भी पाई.

दूसरे, सत्ता में रहते हुए भाजपा के आक्रामक तेवरों से दूसरी पार्टियां यहां तक कि भाजपा की सहयोगी पार्टियां भी आशंकित हो गईं और भाजपा के विरोध में खड़ी हो गईं , जिसका नुक़सान भाजपा को होता दिख रहा है. अभी आने वाले आम चुनावों में भाजपा को जिस प्रतिपक्ष का सामना करना पड़ रहा है वह 2014 के मुक़ाबले ज्यादा आक्रामक, चौकन्ना और संगठित है और भाजपा ने किसी भी क़ीमत पर जीतने की और निरंकुश सत्ता हासिल करने की कोशिश की है उससे जनता के बड़े हिस्से का उससे मोहभंग हुआ है.

लेकिन राजनैतिक हानि लाभ अपनी जगह, अपने विरोधी को किसी भी क़ीमत पर हराने या उसे ध्वस्त करने की इच्छा और कोशिश लोकतंत्र के लिए बुरी है. इससे राजनीति का स्तर किस क़दर गिरता है यह हम अपनी आंखों से देख रहे हैं. जितनी नफ़रत और हिंसा भारतीय राजनीति में भाषा और कर्म के स्तर पर आज दिखाई दे रही है वह किसी भी सभ्य नागरिक का दिल दहला देती है. इस स्तर की नफ़रत और आक्रामकता लोकतंत्र की जड़ों को और समाज के रोज़मर्रा के सभ्य व्यवहार को भी कमजोर करती है.

लोकतंत्र में प्रतिपक्ष को कैसे सम्मान और महत्व दिया जाता है इसका उदाहरण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे. नेहरू के दौर में विपक्ष बहुत कमजोर था और संसद में उसकी कोई ख़ास मौजूदगी नहीं थी. लेकिन नेहरू प्रतिपक्षी नेताओं के भाषण के दौरान संसद में बैठकर सुनते थे और नए से नए सांसद की बातों पर जवाब देते थे. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जब पहली बार संसद सदस्य बने तो उन्होने एक बार किसी मुद्दे पर सरकार की कड़ी आलोचना की. शाम को नेहरू ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता नाथ पै से कहा कि यह नौजवान इतना नाराज़ क्यों है. जब नाथ पै ने चंद्रशेखर से बात करके उनका जवाब नेहरू को सुनाया तो नेहरू ने अगले दिन संसद में चंद्रशेखर ने जो मुद्दे उठाए थे उन पर खुद जवाब दिया. क्या आज की राजनीति में पहली बार संसद पहुंचा कोई नेता प्रधानमंत्री से ऐसे व्यवहार की उम्मीद कर सकता है?

विपक्ष का सम्मान न करना और उससे लड़ते हुए सभ्यता के तमाम नियमों को ताक पर रखना न सिर्फ लोकतंत्र के लिए बुरा है बल्कि समाज और संस्कृति के लिए भी कोई अच्छी बात नहीं है. सत्ता के लिए अगर हम समाज में नफ़रत और संदेह के बीज बोते जाएंगे तो उनकी फ़सल कितनी ज़हरीली होगी यह सोच कर देखें.