गांधीनगर में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भारतीय जनता पार्टी का नहीं अपनी ताकत का शक्ति प्रदर्शन किया. उनके नामांकन के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद थे. बिहार से रामविलास पासवान गुजरात पहुंचे. महाराष्ट्र से नितिन गडकरी अपना चुनाव प्रचार छोड़कर उनकी चुनावी सभा में शामिल हुए. दिल्ली से अरुण जेटली भी वहां मौजूद थे. इसके अलावा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी अमित शाह की तारीफ करते दिखे.

आखिर अपने ही शहर में अमित शाह ने अपनी ताकत दिखाने की कोशिश क्यों की? गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में कुछ खबरें उड़ी हुई है. अमित शाह 2019 के बाद की सियासत पर नज़र बनाए हुए हैं. लोकसभा चुनाव का नतीजा कुछ भी हो, वे अब भाजपा के अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं. दिल्ली में भाजपा के नेताओं से बात करें तो यह अब साफ हो चुका है कि लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा अपना नया अध्यक्ष चुनेगी और पार्टी में अमित शाह की भूमिका बदलेगी.

अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद अमित शाह क्या करेंगे, इस बारे में ज्यादातर कयास एक ही बात कह रहे हैं. उनके करीबी नेता बताते हैं कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमित शाह गृह मंत्रालय देख रहे थे. अगर इस बार मोदी फिर से प्रधानमंत्री बने तो अमित शाह देश के अगले गृह मंत्री बन सकते हैं. जब इसी नेता से पूछा गया कि यह कैसे संभव है कि सरकार के नंबर वन और नंबर दो दोनों एक ही राज्य के हों तो इस सवाल का मुस्कुराते हुए उन्होंने यह सवालनुमा जवाब दिया कि अगर प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष गुजरात से हो सकते हैं तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री क्यों नहीं!

लेकिन अमित शाह लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बने रहना चाहते हैं? गुजरात के एक भाजपा नेता बताते हैं कि अब यह साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा में अमित शाह दूसरे नंबर पर हैं. इसीलिए जब भाजपा ने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की तब भी प्रधानमंत्री का नाम पहले नंबर पर, अमित शाह का दूसरे और राजनाथ सिंह का और नितिन गडकरी का तीसरे और चौथे नंबर पर लिया गया. कहने को तो यह एक उम्मीदवारों की लिस्ट भर थी, लेकिन जो मोदी-शाह की कार्यशैली को जानते-समझते हैं वे मानते हैं कि उम्मीदवारों की पहली लिस्ट के साथ ही यह भाजपा में नेताओं की पोजीशन की भी सूची थी. अमित शाह अब अपनी इस नंबर दो की पोजिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

भाजपा के सूत्रों के मुताबिक 2019 में अगर नरेंद्र मोदी चुनाव जीते तो वे प्रधानमंत्री बनेंगे और अमित शाह देश के गृह मंत्री. अगर मोदी चुनाव हारे तो अमित शाह 2024 की तैयारी करेंगे. इस बात को और गहराई से समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया साक्षात्कार को ध्यान से देखा जा सकता है. इस साक्षात्कार में उनका कहना था कि 2019 में तो कोई स्थान खाली नहीं है, लेकिन 2024 में कोई नया चेहरा आ सकता है.

इसी तरह अमित शाह जब गांधीनगर की सड़कों पर रोड शो कर रहे थे तो उन्होंने अपने हर इंटरव्यू में यह जरूर कहा कि वे जनता के नेता हैं, इसलिए जनता के बीच आए हैं. दरअसल इन्हीं दो लाइनों में आगे की बात छिपी है. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि अमित शाह पर चुनाव लड़ने का दवाब था ही नहीं, वे राज्यसभा के सदस्य हैं और उनका राज्यसभा का टर्म भी अभी काफी बचा है. लेकिन उनका मन राज्यसभा में बिल्कुल नहीं लग रहा है. उन्हें लगता है कि अगर वे छह साल तक राज्यसभा में ही रह गए तो उनकी छवि ‘चाणक्य’ की बन जाएगी जबकि वे अगले ‘चंद्रगुप्त’ बनना चाहते हैं.

अमित शाह के नामांकन के लिए पत्रकारों की पूरी फौज दिल्ली से गांधीनगर बुलाई गई थी. इन सबको वहां यह समझाया गया कि शाह ने अपने राजनीतिक करियर मे कभी चुनाव नहीं हारा और हर बार उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया. कुल मिलाकर अमित शाह यह जताना चाहते हैं कि मोदी के बाद भाजपा में वे दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता हैं और अगर 2019 में भाजपा चुनाव हारती है तो 2024 में बाजी उनके ऊपर खेली जाएगी.

अगर 2019 में नरेंद्र मोदी जीतते हैं तो भी 2024 में वे 75 साल के करीब हो जाएंगे और मोदी-शाह फॉर्मूले के हिसाब से तब उनके संन्यास का वक्त करीब होगा. इसलिए भाजपा को नए नेतृत्व का निर्माण करना होगा और शाह इसके लिए अभी से तैयार हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी इन खबरों को लेकर हलचल है. संघ के एक अनुभवी प्रचारक की मानें तो मोदी के बाद अगला भाजपा नेतृत्व उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश से आना चाहिए. संघ ने विकल्प के तौर पर दो नेताओं को ढूंढ भी लिया है, लेकिन ये दोनों नेता ही इस वक्त अमित शाह का चैलेंजर नहीं बनना चाहते.

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को संघ की तरफ से भोपाल प्रेम त्यागने के लिए कहा गया है. हाल ही में उन्होंने दिल्ली में अपनी सक्रियता बढ़ाई भी है. उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में पत्रकारों से कहा भी कि वे फिलहाल हफ्ते में तीन दिन ही मध्य प्रदेश में बिताना चाहते हैं. शिवराज सिंह चौहान भाजपा के सर्वशक्तिशाली संसदीय बोर्ड के सदस्य भी हैं और जाति के हिसाब से पिछड़ी जाति के नेता भी. इसलिए संघ नेतृत्व का एक गुट उन्हें आगे लाने के पक्ष मे है. इसीलिए अगर मोदी चुनाव जीतते हैं तो शिवराज सिंह चौहान को पार्टी अध्यक्ष बनाने पर विचार हो रहा है.

संघ के सामने दूसरे विकल्प उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. उनकी कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि है. लेकिन योगी के साथ समस्या यह है कि वे पक्के अमित शाह भक्त हैं. आदित्यनाथ के करीबी बताते हैं कि अगले एक साल क्या, पांच साल तक वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे कि अमित शाह के नेतृत्व को नकार सकें. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि पार्टी के नकारने के बावजूद अमित शाह ने अपनी निजी गारंटी पर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाया था.

इसलिए मोदी के बाद कौन के अब दो ही जवाब हैं - अमित शाह या फिर शिवराज सिंह चौहान. अमित शाह इस रेस में आगे हैं क्योंकि शिवराज ही अपने हर इंटरव्यू में कहते हैं कि वे पार्टी के वफादार हैं, अध्यक्ष जी जो कहेंगे वे वह करेंगे.