अभी बीते हफ़्ते की ही बात है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक़ अब्दुल्ला 26 मार्च को आंध्र प्रदेश में थे. वहां वे राज्य के मुख्यमंत्री और सत्ताधारी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के समर्थन में प्रचार करने पहुंचे थे. फारुक़ अब्दुल्ला ने जिन जगहाें पर चुनावी सभाएं कीं, वह राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्‌डी का गढ़ माना जाता है. कड़प्पा और उससे लगा इलाका.

यहां फारुक़ अब्दुल्ला ने जगन मोहन रेड्‌डी पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा, ‘मुझे याद है, वे (जगन) एक बार मेरे घर आए थे. उन्होंने मुझे बताया था कि वे कांग्रेस को 1,500 करोड़ रुपए देने के लिए तैयार हैं. बशर्ते पार्टी उन्हें आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दे. यह तब की बात है जब जगन मोहन के पिता और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्‌डी का एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया था.’ इसके बाद अब्दुल्ला सवाल दागते बोले, ‘वह पैसा कहां से आया था? उनके (जगन के) पास ख़ज़ाना तो है नहीं? यह निश्चित ही जनता का पैसा है? अगर ऐसा व्यक्ति आपका (जनता का) भविष्य उज्जवल करने का वादा करके आप से वोट मांगता है तो उस पर भराेसा मत कीजिए. ऐसा आदमी आपका भविष्य बर्बाद कर देगा.’

यक़ीनी तौर पर फारुक़ अब्दुल्ला का आरोप निरा सियासी कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने लगभग 10 साल बाद इसका ख़ुलासा किया है. वह भी चुनावी मंच से जिसका मकसद जाहिर तौर पर अपने मित्र (चंद्रबाबू) को फ़ायदा पहुंचाना है. लेकिन इसके बावज़ूद इसमें दो बातें जानी-मानी और सोलह आने सच हैं. पहली- दो सितंबर 2009 को हेलीकॉप्टर दुर्घटना में आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्‌डी के निधन के बाद उनके पुत्र जगन मोहन रेड्‌डी ने खुले तौर पर राज्य सरकार के मुखिया का पद संभालने की मंशा जताई थी. दूसरी- कांग्रेस ने जगन को उस वक़्त ज़रा भी गंभीरता से नहीं लिया था. बल्कि कहा तो यह भी जाता है कि उन्हें पार्टी छोड़ने पर मज़बूर कर दिया गया था. लेकिन अब जमीन पर जो आसार दिख रहे हैं उससे लग रहा है कि वही जगन अब उन्हें ठुकराने वाली कांग्रेस को अफसोस की वजह दे सकते हैं.

‘छोटे’ जगन ख़ुद को ‘बड़ा’ बताने लगे तो जेल भिजवा दिए गए

भारतीय राजनीति में मुख्यमंत्री जैसे पद पर पहुंचने के लिहाज़ से जगन उस वक़्त ‘छोटे’ (37 साल) ही थे जब उनके पिता वाईएस राजशेखर रेड्‌डी का निधन हुआ. शायद इसीलिए पिता की गद्दी पर उनकी दावेदारी को कांग्रेस नेतृत्व ने ज़्यादा भाव नहीं दिया. लिहाज़ा ख़ुद को ‘बड़ा’ नेता साबित करने के लिए जगन सड़कों पर उतर आए. उस समय वाईएस राजशेखर रेड्‌डी के निधन के बाद आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में लोगों ने आत्महत्या (दक्षिण भारत में ऐसी घटनाएं आम हैं, जब किसी जनप्रिय नेता के अवसान के बाद उनके समर्थक अपनी जीवनलीला भी समाप्त कर लेते हैं) कर ली थी. जगन मोहन ने ऐसे समर्थकों के परिवाराें के प्रति सुहानुभूति जताने के मक़सद से ‘ओडारपू (सांत्वना) यात्रा’ निकाली. इसके लिए कांग्रेस ने उन्हें रोका-टोका लेकिन वे नहीं माने. पार्टी नेतृत्व और जगन के बीच दरार बढ़ती गई.

पार्टी नेतृत्व द्वारा लगातार की जा रही उपेक्षा से जगन का धीरज भी टूट रहा था. ऐसे में आख़िर एक दिन जगन मोहन ने अपना रास्ता अलग कर ही लिया. पिता के निधन के लगभग साल भर बाद उन्होंने नई पार्टी बना ली. पिता के नाम पर- वाईएसआर कांग्रेस. तब जगन कड़प्पा लोक सभा सीट से कांग्रेस सांसद थे. उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता के साथ उसकी वह सांसदी भी छोड़ दी. यह नवंबर-2010 की बात है. फिर कड़प्पा लोक सभा सीट पर 2011 में हुए उपचुनाव में उन्होंने लगभग पांच लाख मतों के अंतर से जीत दर्ज़ कर नए सियासी सफ़र की नींव डाल दी. लेकिन लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए केंद्र की सत्ता में आई कांग्रेस को यह रास नहीं आया.

साल 2011 में ही कांग्रेस के एक नेता ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई. इसमें जगन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने पिता के मुख्यमंत्रित्व काल में आय से अधिक संपत्ति जुटाई है. इसकी सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) से जांच कराई जाए. अदालत ने भी इस बाबत आदेश पारित कर दिया. सीबीआई जांच हुई और मई-2012 में उन्हें जेल भेज दिया गया. लगभग 16 महीने जेल में बिताए. लेकिन उनकी लोकप्रियता किसी दायरे में क़ैद नहीं हुई.

जगन के जेल में रहने के दौरान ही 2012 में आंध्र में उपचुनाव हुए. एक लोक सभा और राज्य में 18 विधानसभा सीटों के लिए. ये आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों के वे कांग्रेसी सांसद-विधायक थे जिन्होंने जगन के समर्थन में सदन की सदस्यता और पार्टी छोड़ दी थी. इस उपचुनाव में जगन के प्रचार के बिना ही उनकी पार्टी ने 18 में से विधानसभा 15 सीटें और इकलौती लोक सभा सीट भी जीत ली और राज्य विधानसभा में तीसरा बड़ा दल बन गई.

पिता की तरह पांव-पांव, शहर-गांव घूमते-घूमते ‘बड़ी चुनौती’ बन गए

हालांकि शायद यहां तक भी कांग्रेस और राज्य की दूसरी बड़ी पार्टी टीडीपी ने जगन मोहन को गंभीर चुनौती नहीं माना था. लेकिन वे ‘बड़ी चुनौती’ बनने की पूरी तैयारी कर चुके थे. इसके लिए उन्होंने पिता का रास्ता चुना. पांव-पांव, शहर-गांव घूमने का. साल 2003 में वाईएस राजशेखर रेड्‌डी ने यही किया था. वे राज्य के तमाम गांव-शहरों में क़रीब 1,450 किलोमीटर पैदल घूमे थे. इसे उन्होंने ‘प्रजा प्रस्थानम पदयात्रा’ नाम दिया था. इस दौरान वे किसान, छात्र, महिला, बुज़ुर्ग, युवा, पेशेवर, ग़रीब, अमीर सब से मिले. सीधा संवाद किया. उनकी समस्याएं जानीं. सरकार बनने के बाद समाधान का वादा किया. उनका यह नुस्ख़ा काम कर गया. अगले ही साल 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और वाईएस राजशेखर रेड्‌डी स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ हुए.

ऐसे ही जगन मोहन ने नवंबर-2017 से ‘प्रजालासोकम प्रजासंकल्प पदयात्रा’ शुरू की. अपने पैतृक क्षेत्र कड़प्पा से. बताते हैं कि पहले यह यात्रा लगभग 180 दिन यानी क़रीब छह महीने चलने वाली थी. इस दौरान 3,000 किलोमीटर की दूरी तय करने का कार्यक्रम था. लेकिन इस यात्रा को जनता ने कैसा समर्थन दिया होगा इसका अंदाज़ा महज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इस साल जनवरी में यह यात्रा पूरी हुई तो जगन मोहन 3,648 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके थे. लगभग एक साल दो महीने (429 दिन) से ज़्यादा का समय उन्होंने सड़कों पर बिताया. राज्य के सभी 13 जिलों और विधानसभा की 175 में से 134 से अधिक सीटों को कवर किया.

और अब ‘सरकार में बड़े’ बनने की आस

जाहिर तौर पर इतनी मेहनत-मशक्क़त के बाद कोई भी राजनेता यह आस लगाएगा कि वह ‘सरकार में सबसे बड़ा’ यानी मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे. यक़ीनन जगन मोहन को भी यह उम्मीद होगी ही. उनकी उम्मीद बेमानी भी नहीं है क्योंकि ख़बरें बताती हैं कि उनकी पदयात्रा के दौरान एक नारा बड़े जोर-शोर से पूरे राज्य में सुनाई दिया है, ‘रावाली जगन, कावाली जगन.’ यानी ‘जगन आएं, जगन की ज़रूरत है.’ बताया जाता है कि यह नारा चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने दिया है, जो जगन मोहन के लिए चुनाव प्रबंधन का काम देख रहे हैं. और जो 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री तथा 2015 में नीतीश कुमार काे बिहार का मुख्यमंत्री बनवाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. प्रदेश की जनता और प्रशांत किशोर जैसे चुनाव रणनीतिकार के अलावा पड़ोसी तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी घोषणा कर चुके हैं कि वे आंध्र की जनता से जगन मोहन के पक्ष में मतदान करने की अपील करेंगे.

इसके अलावा कुछ ओपिनियन पोल हैं. इनमें बताया गया है कि अगले मुख्यमंत्री के तौर पर आंध्र प्रदेश के 43 फ़ीसदी लोग जगन मोहन को देखना चाहते हैं. जबकि मौज़ूदा मुख्यमंत्री टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू 38 फ़ीसद लोगों की पसंद हैं. एक अन्य सर्वे बताता है कि जगन मोहन की वाईएसआर कांग्रेस आंध्र प्रदेश की 25 में से 23 लोक सभा सीटें जीत सकती है. उसे लगभग 50 फ़ीसदी मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है. जबकि ऐसे दूसरे सर्वे के मुताबिक वाईएसआर कांग्रेस को राज्य विधानसभा की 175 में से लगभग 80-90 सीटें मिल सकती हैं. यहां सरकार बनाने के लिए 87 सीटों के बहुमत की ज़रूरत है.

अब यहीं दो और जानकारियां. पहली- आंध्र प्रदेश की सभी लोक सभा और विधानसभा सीटों के लिए मतदान 11 अप्रैल को होने वाला है. दूसरी- जगन मोहन रेड्‌डी ने अपनी पदयात्रा का समापन श्रीकाकुलम जिले के ‘इच्छापुरम’ नामक कस्बे में किया था. और यहां से अगर राज्य का मुख्यमंत्री बनने की उनकी इच्छा पूरी होती है तो उनकी पूर्ववर्ती पार्टी कांग्रेस को उन्हें दरक़िनार करने का अफ़सोस होना स्वाभाविक है.