इस संग्रह की कहानी ‘हरसिंगार के फूल’ का अंश :

‘बाग़ में कल रात के मुक़ाबले अधिक अंधेरा था. आंवले और अनार की सुबुक छायाएं अंधेरे में अदृश्य थीं. हरसिंगार के झाड़ पर फूल जुगनू से झलक रहे थे. हरसिंगार तले पापा की बैठने की पसंदीदा जगह पर शाम को अस्थि-कलश रखा गया था. संगमरमर की बैंच पर राख का धूमिल वर्तनी दिखाई दे रहा था. मोना ने कुर्ते की जेब से फ़ोन निकाला.

‘मोना, एट लास्ट… सारा दिन तुम्हारे बारे में सोचता रहा हूं. तुम कैसी हो?’

‘मैं हरसिंगार के नीचे खड़ी हूं विश्वा. फूल झर रहे हैं. उनकी ख़ुशबू से शायद मेरे कपड़ों, बालों, देह में जज़्ब गंध धुंए की गंध धुल जाए.’

‘मोना...’

‘फूल मेरे चेहरे पर, बांहों पर, वक्ष पर गिर रहे हैं. धुंए की जलांध के बावजूद मैं इन्हें सूंघ पा रही हूं, महसूस कर पा रही हूं. तुम्हें याद है जब हम महीनों बाद अचानक उस कॉन्फ़्रेंस में मिले थे?’

‘मोना, हनी, आई नो इट इज़न्ट द राइट टाइम, बट तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे बारे में… व्हाट आई फ़ील अबाउट यू...’

‘हरसिंगार के फूल सुबह झर जाते हैं, विश्वा. कल तुमने कहा था कि अगर मेरे लिए कुछ कर सको.’

‘ऑफकोर्स.’

‘अभी आ सकते हो?’’


कहानी संग्रह : जापानी सराय
लेखिका : अनुकृति उपाध्याय
प्रकाशक : राजपाल
कीमत : 195 रुपए


‘जापानी सराय’ किताब का नाम सुनते ही किसी रहस्यमयी दुनिया में होने का बोध होता है. लेकिन किताब पढ़ते हुए आप महसूस करने लगते हैं कि ये कहानियां हमें अपनी ही बेज़ार-सी लगने वाली दुनिया के रहस्यों से रू-ब-रू करा रही हैं. अनुकृति उपाध्याय साहित्य की दुनिया में नया नाम हैं, पर इनके हस्ताक्षर इन्हें नए-पुराने से आगे ले जाकर एक सहज-सरल साहित्यकार के रूप में पाठक से मिलवाते हैं. ऐसी सहजता जो जीवन और साहित्य की गहरी समझ के बाद ही संभव है.

21वीं सदी की पढ़ी-लिखी, कामकाजी मगर पारंपरिक समाज में जीती स्त्रियों के जीवन की कई परतों को नरमी से छूती इन कहानियों में न तो किसी तरह की नाटकीयता है न को कोई फ़िल्मी नकलीपन. कहानियों में एक लड़की या एक स्त्री के जीवन, उसकी बंधने और आज़ाद होने के बीच की इच्छाओं को एक स्त्री की नज़र से देखने की कोशिश है. पिछले दशकों में भारतीय स्त्रियों के आत्मनिर्भर होने से समाज की दशा और दिशा तो बदली ही है, उनकी स्वयं को देखने की दृष्टि में भी धीमा मगर क्रांतिकारी परिवर्तन आया है. जापानी सराय की किरदार स्त्रियों में आप आत्मनिर्भरता के बाद खुद को नए सिरे से समझने और स्वीकारने की कोशिश देखेंगे. लेखिका का इस कोशिश के संघर्ष को समझना, उसे सराहना, उस पर बात करना इन कहानियों का ताज़ापन है.

इस कहानी संकलन की शीर्षक कहानी ‘जापानी सराय’ की नायिका चमकदार टोक्यो में रहकर भी एक ढर्रे की ज़िंदगी जी रही है. वह दिनभर बस काम करती है और होटल लौट जाती है. हम कहानी में उसके परिवार के बारे में कुछ नहीं जान पाते, नहीं जानते कि भारत में उसका घर-परिवार कहां है और उसमें कौन-कौन है. पर नूडल की सुगंध के पीछे देर रात को बार में जाकर पहली बार शराब के नाम पर जिन-टॉनिक ऑर्डर करने वाली नायिका की कल्पना करते हुए आप उस के कंधों के तनाव को भी महसूस कर सकते हैं. वह जापान में होकर भी वहां पूरी तरह नहीं है. एक पारंपरिक समाज की कंडीशनिंग उसे वहां आज़ाद महसूस नहीं करने देती.

लेकिन जब वह एक अनजान शहर में किसी नीली आंखों वाले अजनबी से यह सुनती है, ‘जानती हो सब कुछ कह डालने के लिए अजनबियों से अच्छा कोई नहीं होता. ख़ासकर वह अजनबी जो अगली सुबह जापान सी के लिए जा रहा हो, जहां हो सकता कि उसे कोई शार्क खा जाए.’ वो शायद खुद को थोड़ा और आज़ाद महसूस कर पाती है.

लेखिका अपनी कहानियों में कथ्य की न्यूनता चाहती है. ऐसा लेखन जहां रोज़ की ज़िंदगी के आम ब्यौरों के बीच के बारीक रेशे मिलकर एक ऐसी कहानी रच दें जिसे शब्दों में न कहा गया हो फिर भी पाठक उसे पढ़ सके, महसूस कर सके. कहानी ‘शावर्मा’ इस न्यूनता का सुंदर उदाहरण है. यहां इच्छाओं का ऐसा बयान है कि शब्दों के कठोर, निर्मम आवरण में भी उनकी सर्द-गर्म संवेदना बनी रहती है. नायिका और उसके सहकर्मी की इच्छाओं के बहाने आपके भीतर कोई आपकी अपनी इच्छाओं को टटोलने लगता है, उन्हें अभिव्यक्ति देने लगता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाली अनुकृति की स्त्री अंदर-बाहर, परंपरा-आधुनिकता के विरोधाभास में जीने के बावजूद काफी सुलझी हुई दिखती है. उसमें स्वच्छंदता नहीं, स्वतंत्रता की आकांक्षा है. भटकाव की जगह परिपक्वता भरी स्थिरता है, सब संभाल लेने का विश्वास है जो पाठक को प्रभावित करता है.

इन कहानियों में मौजूद संवादों में भी ऐसा बहुत कुछ मौजूद है जिस पर आप रुककर सोचना चाहेंगे, जिसे आप अंडरलाइन कर रखना चाहेंगे, खुद दोबारा पढ़ने या किसी प्रिय को पढ़ाने के लिए. जैसे शीर्षक कहानी कि ये पंक्तियां : ‘मैं जापान के लिए अपने प्यार को उसके लिए प्यार समझ बैठा. वह क्या समझी यह मैं आज तक जान नहीं पाया. ऐसा अक्सर हो जाता है क्योंकि हम अपने को समझने में उतना भी समय नहीं खर्च करते जितना एक शर्ट चुनने में.’ या फिर ‘शावर्मा’ कहानी का संवाद जहां नायिका कहती है, ‘सब कुछ का सब कुछ से संबंध होता है, विज्ञान में भी और जीवन में भी.’

कुछ कहानियों में कीड़ों और जानवरों की किरदार के रूप में स्थापना भी इस संकलन की विशेषता है. पर ‘जानकी और चमगादड़’ कहानी के चमगादड़ के अलावा कोई और जानवर उतना प्रभावित नहीं करता. ‘छिपकली’ कहानी में छिपकली के होने के बजाय मां और बेटे का रिश्ता ज़्यादा उत्सुकता जगाता है. आप छिपकली के बजाय उन दोनों की दुनिया में थोड़ा और झांकना चाहते हैं. वहीं ‘डेथ सर्टिफ़िकेट’ और ‘चेरी ब्लॉसम’ जैसी अन्य कहानियां हमें सफल और कामकाज़ी औरतों के उस संसार में ले जाती हैं जिस पर हिंदी साहित्य की नज़र अभी-अभी पड़ी है. इस दुनिया की बारीकियों को समझने, सराहने के लिए इस संकलन को पढ़ा और याद रखा जाना चाहिए.