राष्ट्रीय पार्टियों के बीच भाजपा की पहचान हिंदी पट्टी के राज्यों में मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टी की रही है. साल 2014 के आम चुनाव में इन राज्यों में भाजपा ने करीब 200 सीटें हासिल की थीं. इसके बाद उसने पूरे देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने का नारा दिया था. लेकिन बीते पांच वर्षों में सभी राज्यों को कांग्रेस से मुक्त करने का भाजपा का मकसद पूरा नहीं हो पाया. हालांकि, अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा ने कांग्रेस को पूर्वोत्तर के सभी राज्यों की सत्ता से बाहर करने में कामयाबी जरूर हासिल की है. इस काम में अमित शाह को कांग्रेस के पूर्व नेता हेमंत बिस्वा सरमा का भरपूर साथ मिला है. सरमा अगस्त, 2015 में भाजपा में शामिल हुए थे.

बीते महीने अमित शाह ने हेमंत बिस्वा सरमा से लोकसभा चुनाव में बतौर उम्मीदवार न उतरने को कहा था. पार्टी अध्यक्ष ने उन्हें पूर्वोत्तर के राज्यों में पार्टी के विस्तार पर ध्यान देने को कहा. इसके बाद पार्टी महासचिव राम माधव ने भी कहा कि पूर्वोत्तर के राज्यों में हेमंत बिस्वा सरमा की भूमिका अमित शाह से अधिक अहम है. फिलहाल, सरमा असम सरकार में मंत्री पद के साथ नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नीडा) के संयोजक की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

नीडा का गठन 24 मई, 2016 में किया गया था. इसमें पूर्वोत्तर की गैर-कांग्रेस पार्टियों को शामिल किया गया है. इनमें असम गण परिषद (एजीपी), नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिव प्रोगेसिव पार्टी (एनडीपीपी) और इंडिजनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) सहित कई अन्य पार्टियां शामिल हैं. हालांकि, नीडा में शामिल नेशनल पीपल्स पार्टी ने मेघालय की दोनों सीटों पर लड़ने का फैसला किया है. वहीं, आईपीएफटी के उम्मीदवार भी त्रिपुरा की दोनों सीटों पर चुनावी मैदान में हैं. इस चुनाव में इन सहयोगियों के अलग होने को लेकर पूर्वोत्तर में भाजपा के चुनाव प्रभारी राम माधव ने कहा है कि नतीजों के बाद ये सभी दल उनके साथ ही रहेंगे. उन्होंने इन राज्यों की कुल 25 में से 20 सीटें इस गठबंधन को मिलने का दावा किया है.

उधर, भाजपा ने मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मेघालय में अकेले उतरने का फैसला किया है. इन राज्यों में लोकसभा की दो-दो सीटें हैं. वहीं, सिक्किम और मिजोरम की एक-एक सीट पर भी पार्टी ने उम्मीदवार उतारा है. दूसरी ओर, नगालैंड में पार्टी ने अपनी सहयोगी एनडीपीपी को समर्थन देने का एलान किया है. भाजपा पूर्वोत्तर में सबसे बड़े राज्य असम की 14 में से 10 सीटों पर लड़ रही है. बाकी चार सीटें उसने अपने सहयोगियों एजीपी और बोडो पीपल्स फ्रंट को लड़ने के लिए दी हैं.

इस तरह देखें तो भाजपा सिक्किम सहित पूर्वोत्तर की कुल 25 में से 20 सीटों पर अकेले लड़ रही है. साल 2014 के चुनाव में उसने आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी. इनमें से सात असम और एक अरुणाचल प्रदेश की थीं. यानी इस चुनाव में भाजपा पहले की तुलना में करीब ढाई गुना अधिक सीटें जीतने के लक्ष्य के साथ उतरी है. वैसे भी, जिन इलाकों में उसे पिछले चुनाव से अधिक सीटें हासिल करने की उम्मीद है उनमें पूर्वोत्तर के राज्य सबसे ऊपर हैं. इसकी वजह बीते तीन चार वर्षों में पार्टी का प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियां रही हैं.

असम

इन राज्यों में हम सबसे पहले असम की बात करते हैं. साल 2014 के चुनाव में यहां भाजपा को सात और कांग्रेस को तीन सीटें हासिल हुई थीं. भाजपा को कुल 37 फीसदी वोट पड़े थे और कांग्रेस को 30 फीसदी. इसके करीब दो साल बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा क्रमश: 29.5 फीसदी और 31 फीसदी था. हालांकि, भाजपा ने कांग्रेस के 122 के मुकाबले 89 सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे थे. उसने राज्य की कुल 126 विधानसभा सीटों में से 60 अपनी झोली में डालीं. कांग्रेस सिर्फ 26 सीटें जीत सकी. इसके अलावा भाजपा के सहयोगी दलों में एजीपी ने 30 में से 14 और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने 13 में से 12 सीटों पर जीत हासिल की. इनकी कुल मतों में हिस्सेदारी क्रमश: आठ और चार फीसदी रही.

विधानसभा चुनाव के लिहाज से देखें तो भाजपा और सहयोगी दलों-एजीपी-बीपीएफ का वोट शेयर करीब 42 फीसदी हो जाता है. यह आंकड़ा कांग्रेस की तुलना में 11 फीसदी अधिक है. लेकिन, कांग्रेस के साथ ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को पड़े वोट जोड़ दिए जाएं तो यह आंकड़ा नीडा से दो फीसदी अधिक हो जाता है. लोकसभा चुनाव 2019 में बदरुद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ ने इस बार केवल तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. इनमें करीमगंज, धुबरी और बारपेटा हैं. साल 2014 में पार्टी ने इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज की थी.

भाजपा को उम्मीद है कि नीडा को इस चुनाव में 14 में से 12 सीटें हासिल हो जाएंगी. हेमंत बिस्वा सरमा का दावा है कि मोदी सरकार के दौरान पूर्वोत्तर में विकास से जुड़े काफी काम हुए हैं जिनमें सड़क और रेलवे के क्षेत्र में कई परियोजनाओं को अंजाम दिया गया है. पूर्वी सीमांत रेलवे जोन में तैनात एक रेलवेकर्मी सत्याग्रह को बताते हैं, ‘कई जगहों पर रेलवे मार्गों का दोहरीकरण किया गया है. साथ ही, कई दुर्गम इलाकों को भी रेलवे द्वारा देश के मुख्य हिस्से से जोड़ा गया है या इसका काम किया जा रहा है.’ दिसंबर, 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सबसे लंबे रेलवे-सड़क पुल बोगीबील का उद्घाटन किया था. इस पुल की वजह से असम के तिनसुकिया से अरुणाचल प्रदेश के नाहरलगुन कस्बे तक की यात्रा में लगने वाले समय में करीब 10 घंटे की कमी आने की बात कही गई है.

लेकिन विकास से जुड़े इस महत्वपूर्ण काम के बाद भी असम में भाजपा की राह इतनी आसान नहीं है. नागरिकता संशोधन विधेयक की वजह से उसे असम सहित पूरे पूर्वोत्तर में लोगों की भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा है. इस विधेयक के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले गैर-मुस्लिमों के लिए नागरिकता आसान बनाने की बात कही गई है. असम के मूल निवासियों ने इस विधेयक का भारी विरोध किया है. यहां तक एजीपी इस मुद्दे पर भाजपा का साथ छोड़ दिया था. वहीं, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की वजह से भी पार्टी को कुछ नुकसान की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

भाजपा को इस संभावित नुकसान का अंदाजा है, इसलिए उसने कई रणनीतियों पर काम किया है. मसलन, पार्टी ने असम के छह स्थानीय समुदायों को आदिवासी दर्जा देने का वादा किया है, सहयोगी बीपीएफ को उसने आदिवासियों के लिए सुरक्षित कोकराझाड़ की सीट दी है. वहीं, एजीपी को कालीबोर, धुबरी और बारपेटा की सीट दी गई है. इनमें धुबरी और बारपेटा मुस्लिम आबादी की बहुलता वाली सीटें हैं.

त्रिपुरा

साल 2018 में त्रिपुरा में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद लोकसभा चुनाव में पार्टी आश्वस्त दिख रही है. यहां तक कि राज्य में अपनी सहयोगी आईपीएफटी के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए भी वह तैयार नहीं हुई. लेकिन आईपीएफटी का राज्य के आदिवासी इलाके में असर है. उसने भी राज्य की दोनों लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. यह देखना होगा कि वह आदिवासी इलाकों में भाजपा का समर्थन विधानसभा चुनाव के मुकाबले घटाने में सफल रहती है या नहीं.

साल 2014 चुनाव में इन दोनों सीटों पर सीपीएम ने जीत दर्ज की थी. इस चुनाव में पार्टी ने दोनों सांसदों- शंकर प्रसाद दत्ता और जितेंद्र चौधरी की उम्मीदवारी बरकरार रखी है. लेकिन, माना जा रहा है कि इन सांसदों को सत्ता विरोध लहर का सामना कर पड़ सकता है.

वहीं, कांग्रेस खुद को मजबूत करने की कोशिश में दिख रही है. इसके लिए पार्टी में पुराने सदस्यों और अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं को जोड़ा जा रहा है. बीते महीने भाजपा-त्रिपुरा के उपाध्यक्ष सुबल भौमिक कांग्रेस में शामिल हो गए. पार्टी ने उन्हें त्रिपुरा-पश्चिम सीट से उम्मीदवार घोषित किया है.

वहीं, त्रिपुरा पूर्व सीट से पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष प्रद्युत देब बर्मन ने अपनी बहन प्रज्ञा देब बर्मन को उतारा है. उनका संबंध त्रिपुरा के राजघराने से है. इस सीट पर आदिवासियों का प्रभाव है. इस बीच मंगलवार को आईपीएफटी के उपाध्यक्ष कीर्तिमोहन त्रिपुरा ने भी पार्टी के 400 कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस की सदस्यता ली. जानकारों के मुताबिक यह कहा जा सकता है कि त्रिपुरा विधानसभा चुनाव की तुलना में आम चुनाव में भाजपा के लिए सीपीएम की जगह कांग्रेस एक बड़ी चुनौती होने वाली है.

बाकी राज्य

पूर्वोत्तर में असम और त्रिपुरा के अलावा मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है. इन दोनों राज्यों में भी पार्टी अपने दम पर लड़ने की तैयारी में है. साल 2017 में मणिपुर की सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा लोकसभा की दोनों सीटें हासिल करने की कोशिश में हैं. हालांकि, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफ्स्पा) और नागरिकता संशोधन विधेयक की वजह से पार्टी को मतदाताओं की नाराजगी का सामना भी करना पड़ सकता है. कांग्रेस ने इस विधेयक को वापस लेने और अफ्स्पा की समीक्षा करने का चुनावी वादा किया है.

दूसरी ओर, बीते तीन-चार वर्षों में अरुणाचल प्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक राजनीतिक उठा-पटक वाला राज्य रहा है. यहां फिलहाल पेमा खांडू के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है. इस राज्य की दो सीटों में से एक अरुणाचल पश्चिम में भाजपा उम्मीदवार किरण रिजिजू ने कांग्रेसी प्रत्याशी संजय तकाम को करीब 42,000 मतों से मात दी थी. इस बार पार्टी ने उन पर फिर भरोसा जताया है. हालांकि, इस बार उनके सामने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी के रूप में एक मजबूती प्रतिद्वंद्वी है.

भाजपा पूर्वोत्तर में विकास के दावे के आधार पर ही अरुणाचल प्रदेश विजय पताका लहराने की उम्मीद कर रही है. हालांकि एक फैसले की वजह से बीते महीने पार्टी की सरकार को स्थानीय लोगों के उग्र विरोध का सामना करना पड़ा. यह फैसला था राज्य के छह समुदायों को स्थायी निवासी का दर्जा (पीआरसी) देना. भारी हिंसा के बाद आखिरकार सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा.

भाजपा के लिए मुश्किलें और भी हैं. बीते महीने पार्टी के 18 नेता विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) में शामिल हो गए. इससे पहले फरवरी में भी दो वरिष्ठ नेताओं ने भाजपा को छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया था. गौरतलब है कि राज्य में लोकसभा की दो सीटों के साथ विधानसभा की 60 सीटों के लिए भी चुनाव होना है.

उधर, मेघालय में भाजपा की सहयोगी एनपीपी ने बिना गठबंधन के चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है. इससे पहले पार्टी नेता और राज्य के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया था. 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा को केवल दो सीटें हासिल हुई थीं. उधर, ईसाई बहुल आबादी वाले मिजोरम में भी भाजपा अपने दम पर चुनाव में है. बीते साल विधानसभा चुनाव में पार्टी ने यहां पहली बार अपना खाता खोला था. इस राज्य में मुख्य मुकाबला मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और कांग्रेस के बीच है.

उधर, सिक्किम में चुनाव से ऐन पहले भाजपा को बड़ा झटका लगा है. बीते महीने गठबंधन के एलान के कुछ दिन बाद ही सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) ने अकेले राज्य की 32 विधानसभा सीटों और एक लोकसभा सीट पर लड़ने का फैसला किया. भाजपा ने शेरिंग शेरेपा के रूप में अपना उम्मीदवार उतारा तो है, लेकिन राज्य में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) और एसकेएम के बीच बताया जा रहा है. एसडीएफ के पवन कुमार चामलिंग बीते 25 वर्षों से राज्य की सत्ता पर काबिज हैं. इनके अलावा नगालैंड में भाजपा ने अपनी सहयोगी एनडीपीपी के उम्मीदवार को समर्थन देने का एलान किया था. इस पार्टी ने बीते साल विधानसभा चुनाव में 60 में से 32 सीटें जीती थीं.

पूर्वोत्तर के इन सभी राज्यों में भाजपा की चुनावी रणनीति के लिहाज से देखें तो हेमंत बिस्वा सरमा मुख्य भूमिका में हैं. साल 2015 में पार्टी में शामिल होने के बाद उनके नेतृत्व में भाजपा ने येन-केन प्रकारेण जिस तरह से इन राज्यों में पकड़ बनाई है, उसके चलते उसकी उम्मीदें इस बार खूब बढ़ी हुई हैं. हालांकि, इस बीच एनआरसी, नागरिक विधेयक और पीआरसी की वजह से उसके लिए चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. अब 23 मई को चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि हेमंत बिस्वा सरमा पूर्वोत्तर में भाजपा के लिए ‘2014 के अमित शाह’ साबित होंगे या नहीं.