हाल की बात है. दिल्ली में भाजपा चुनाव समिति की बैठक चल रही थी. बिहार के टिकटों पर फैसला होने वाला था. भाजपा नेता शाहनवाज़ हुसैन इस समिति के सदस्य के तौर पर बैठक में हाजिर थे, लेकिन चाहकर भी वे अपने लिए एक सीट नहीं मांग पाए. चुनाव समिति में शाहनवाज़ की सीट भागलपुर पर चर्चा नहीं हुई क्योंकि वह सीट पहले ही सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड को दे दी गई.

सुनी-सुनाई है कि शाहनवाज़ तब से नाराज़ हैं. शाम चार बजे से रात नौ बजे तक टीवी चैनलों पर बहस में हिस्सा लेने वाले नेताजी चुनाव से पहले अपने पंत मार्ग के बंगले पर ज्यादातर खाली बैठे रहते हैं. भाजपा के एक सूत्र बताते हैं, ‘शाहनवाज़ को उम्मीद है कि किसी दिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व का फोन उनके पास भी आएगा और उन्हें मनाया जाएगा.’ लेकिन अब तक ऐसा हो नहीं हो सका है.

इसके विपरीत गिरिराज सिंह का उदाहरण है. जिस चुनाव समिति में शाहनवाज़ चाहकर भी अपनी बात नहीं कह पाए उसी समिति ने गिरिराज को बेगूसराय भेज दिया. गिरिराज के चुनाव लड़ने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. 2014 में वे अपने गृह जिले बेगूसराय से ही चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन तब उन्हें नवादा भेज दिया गया. पांच साल तक अपने इलाके में उन्होंने मेहनत की. और 2019 में जब वे नवादा से चुनाव लड़ने का मन बना चुके थे तो उन्हें बेगूसराय जाने का फरमान सुना दिया गया.

सुनी-सुनाई है कि जब दिल्ली से यह फैसला हुआ तो गिरिराज गुस्से से लाल हो गए और कोप भवन में जाकर बैठ गए. बताया जाता है कि गिरिराज ने अमित शाह से मिलने का वक्त मांगा. जब दो दिन तक पार्टी नेतृत्व से वक्त नहीं मिला तो गिरिराज ने बगावती तेवर अपना लिए. वे दनादन देश के सभी समाचार चैनलों पर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व और बिहार के प्रभारी भूपेंद्र यादव को खरी खोटी सुनान लगे. शांत गिरिराज की कोई नहीं सुन रहा था, लेकिन बागी गिरिराज के पास अगले ही अमित शाह का फोन आ गया और उन्हें मना लिया गया. उनकी सारी बातें सुनी गईं और भरोसा दिया गया कि चुनाव के बाद उनकी शिकायतों का समाधान निकाला जाएगा. आखिरकार गिरिराज का गुस्सा शांत हो गया और वे कन्हैया कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ने बेगूसराय रवाना हो गए.

भाजपा की राजनीति को करीब से कवर करते रहे एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘यह देखकर शाहनवाज़ के दिल पर क्या गुजरी होगी, आप समझ सकते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘शाहनवाज़ के पास हर दिन समाचार चैनलों के फोन आ रहे हैं क्योंकि अचानक भाजपा में प्रवक्ताओं की कमी सी हो गई है. हफ्ते में पांच दिन, चार बजे से ग्यारह बजे तक किसी ना किसी टीवी चैनल पर दिखने वाले संबित पात्रा खुद पुरी से उम्मीदवार बन गए हैं इसलिए आजकल टीवी स्टूडियो में नहीं दिखते. दूसरे प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी राजस्थान के प्रभारी हैं और ज्यादातर वक्त जयपुर में रहते हैं, इसलिए उनके पास भी वक्त की कमी हो गई है. तीसरे राजीव प्रताप रुडी हैं जिन्हें अमित शाह ने कुछ महीने पहले ही अपनी टीम में लिया है, लेकिन वे कभी सक्रिय हो ही नहीं पाए और फिर बिहार के सारण से चुनाव लड़ने चले गए.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसलिए शाहनवाज़ ही इकलौते विकल्प बचे हैं जो दिल्ली में ही रहते हैं, ज्यादा व्यस्त भी नहीं हैं, लेकिन समाचार चैनल के लगातार आग्रह के बाद भी अपनी पार्टी का बचाव करने से खुद बचने लगे हैं.’

एक अन्य वरिष्ठ टीवी पत्रकार की मानें तो शाहनवाज़ हुसैन अब दुखी हैं. उन्हें लगता है कि वरिष्ठ होने के बाद भी उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही है. जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो शाहनवाज़ की किस्मत चमकी थी. वे बिहार की मुस्लिम बहुल सीट किशनगंज से जीतने के बाद भाजपा के इकलौते मुस्लिम सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे थे. उन्होंने तेजी से तरक्की की. नागरिक उड्डयन जैसा भारी भरकम मंत्रालय तक संभाला. उस वक्त शाहनवाज़ उमा भारती के करीबी माने जाते थे. उमा भारती के करीबी होने के नाते उनका नाम आडवाणी कैंप से जोड़ा गया. लेकिन शाहनवाज़ ने अटल बिहारी वाजपेयी के निकट माने जाने वाले प्रमोद महाजन से भी दोस्ती की और दिल्ली लॉबी में हावी हो गए. 2004 में अटल सरकार का पतन हुआ और धीरे धीरे शाहनवाज़ हुसैन के दिन बदल गए. 2014 में वे भागलपुर सीट बस कुछ हजार वोट से हार गए. चुनाव हारने वालों में मुख्तार अब्बास नकवी भी थे, लेकिन नकवी जब थोड़े बागी से दिखने लगे तो मोदी सरकार में मंत्री बना दिए गए. वहीं शाहनवाज़ से पार्टी का भरोसा कमजोर होता गया.

शाहनवाज़ हुसैन का चढ़ाव और पतन देखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी की मानें तो शाहनवाज़ का बड़बोलापन ही उन पर भारी पड़ा. वे कहते हैं, ‘कुछ पत्रकारों से बात करते हुए शाहनवाज़ कभी-कभी खुलकर अपनी पार्टी के बारे में राय रख देते हैं और ये बात ऊपर तक पहुंच जाती है. बीते कुछ महीनों में शाहनवाज़ हुसैन ने भागलपुर से चुनाव लड़ने की खातिर पूरी तैयारी और मेहनत भी की. दिल्ली में प्रवक्ता की भूमिका जमकर निभाई. वरिष्ठ होने के बावजूद कांग्रेस के छोटे छोटे और नए प्रवक्ताओं से खुद भिड़े, संघ से लेकर सरकार तक का बचाव किया. हफ्ते दो हफ्ते के लिए भागलपुर जाकर चुनाव की तैयारी भी की. प्रखंड से लेकर प्रांत तक के नेताओं से अपने संबंध ठीक किए.’

लेकिन साफ है कि इतना काफी नहीं हो पाया. इसलिए जब भाजपा और जेडीयू के बीच सीटों का बंटवारा होने लगा तो भागलपुर की सीट चुपके से जेडीयू को दे दी गई जबकि सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि यह सीट नीतीश कुमार ने मांगी भी नहीं थी. शाहनवाज़ के मित्र भाजपा में भी हैं और जेडीयू में भी, इसलिए उन्हें पूरी खबर है कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ. लेकिन उनका धर्मसंकट यह है कि वे गिरिराज की तरह बागी स्वर नहीं उठाना चाहते और सांसद भी बनना चाहते हैं.

अंदर की खबर रखने वालों की मानें तो फिलहाल शाहनवाज़ हुसैन ख्वाहिश पालकर बैठे हैं कि पार्टी उन्हें लोकसभा न भेज पाई, न सही लेकिन राज्यसभा की एक सीट का वादा कर दे. उनकी नज़र रविशंकर प्रसाद की राज्यसभा सीट पर है जो भाजपा कोटे की सीट होगी क्योंकि रविशंकर अब पटना साहिब से चुनाव मैदान में उतर चुके हैं. लेकिन यहां भी समस्या है. समस्या यह है कि रामविलास पासवान से समझौता करते वक्त खुद अमित शाह ने ऐलान कर दिया था कि पहली राज्यसभा की सीट से रामविलास ही राज्यसभा भेजे जाएंगे.