लोकसभा चुनाव 2019 में जिन संसदीय क्षेत्रों को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है उनमें से एक है बिहार का बेगूसराय. यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के ‘पोस्टर बॉय’ कहे जा रहे कन्हैया कुमार और केंद्रीय मंत्री व भाजपा सांसद गिरिराज सिंह के बीच सीधी टक्कर है. वहीं, कई जानकार दावा कर रहे हैं कि दरअसल यह मुक़ाबला त्रिकोणीय है. यहां से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उम्मीदवार तनवीर हसन भी चुनावी मैदान में हैं जिन्हें बेगूसराय से पार्टी का क़द्दावर और लोकप्रिय नेता माना जाता है. पिछली बार उनके और भाजपा सांसद दिवंगत भोला सिंह के बीच कांटे का मुक़ाबला हुआ था. लेकिन मोदी लहर के साथ भाजपा उम्मीदवार हसन को क़रीब 58,000 वोटों से हराने में कामयाब रहे थे.

लेकिन इस बार मुक़ालबे में भोला सिंह नहीं, बल्कि गिरिराज सिंह हैं जो 2014 में नवादा से सांसद बने थे. इस बार पार्टी ने उन्हें बेगूसराय से लड़ने को कहा है. गिरिराज शुरू में इसके लिए राज़ी नहीं दिख रहे थे, लेकिन बाद में मान गए. जानकारों के मुताबिक़ इस चुनाव में गिरिराज के पक्ष में दो बातें जाती हैं. पहली यह कि बेगूसराय से पिछली बार भाजपा प्रत्याशी को ही जीत मिली थी. वहीं, दूसरी वजह गिरिराज सिंह का भूमिहार होना है. बेगूसराय में भूमिहारों की आबादी सबसे ज्यादा है और यह सब जानते हैं कि बिहार में चुनाव जीतने के लिए जाति बहुत बड़ा फ़ैक्टर है. इसलिए नवादा से आए गिरिराज सिंह यहां भी मज़बूत उम्मीदवार माने जा रहे हैं.

जातिगत समीकरण और तनवीर हसन

कन्हैया कुमार भूमिहार ही हैं. फिर भी कई वरिष्ठ पत्रकार उनकी उम्मीदवारी को सीधे-सीधे मज़बूत नहीं बता रहे. जानकारों के मुताबिक़ इसके कई कारण हैं. इनमें पहला कारण हैं तनवीर हसन, जो जातीय समीकरण के लिहाज़ से कन्हैया और गिरिराज दोनों पर भारी पड़ते दिखते हैं. बताया जाता है कि बेगूसराय की कुल जनसंख्या में भूमिहार सबसे ज़्यादा (19 प्रतिशत) हैं. उनके बाद मुस्लिम 15 प्रतिशत और यादव 12 प्रतिशत के आसपास हैं. अनुसूचित जाति के लोग भी अच्छी-ख़ासी संख्या में हैं. अब चूंकि तनवीर हसन राजद के उम्मीदवार हैं, इसलिए ज़ाहिर है इन समुदायों को मिला कर 30 प्रतिशत से ज़्यादा वोट उन्हीं के पक्ष में जा सकते हैं. इसी वजह से कई जानकारों का कहना है कि अगर कन्हैया कुमार ‘महागठबंधन’ के उम्मीदवार होते तो बेगूसराय से उनकी जीत पक्की हो सकती थी, क्योंकि भूमिहार वोट बैंक का कुछ हिस्सा अपने पाले में करने के साथ उन्हें मुस्लिम, यादव और एससी वोट भी मिल सकते थे. लेकिन अब इसकी कई संभावनाओं में से केवल एक संभावना ही बचती है.

परिसीमन के बदला वामपंथ का भाग्य

इसके अलावा चुनाव के लिहाज़ से बेगूसराय का क्षेत्रीय इतिहास भी कन्हैया के पक्ष में जाता नहीं दिखता. साल 2009 के परिसीमन से पहले बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक बेगूसराय और दूसरा बलिया. कहा जाता है कि 2009 से पहले वाले बेगूसराय में अधिकतर कांग्रेस का प्रभुत्व रहा था. यही स्थिति बलिया में वामपंथियों की थी. लेकिन परिसीमन के बाद दोनों क्षेत्रों को मिलाकर केवल एक बेगूसराय कर दिया गया. उसके बाद इस लोकसभा क्षेत्र में वामपंथी दलों के लिए स्थितियां कमजोर हो गईं. 2009 में जदयू के उम्मीदवार ने सीपीआई के दिग्गज नेता शत्रुघ्न प्रसाद सिंह को हरा दिया. वहीं, 2014 में भाजपा के भोला सिंह विजयी रहे थे. इसी वजह से यह देखना दिलचस्प होगा कि कन्हैया कुमार यहां सीपीआई का खोया इतिहास वापस ला पाएंगे या नहीं.

कन्हैया के लिए मुश्किलें और भी हैं

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि राजद और भाजपा उम्मीदवार के मुक़ाबले कन्हैया कुमार की मुश्किलें थोड़ी ज़्यादा ही हैं. क्षेत्रीय इतिहास और महागठबंधन का साथ नहीं मिलने के अलावा उनकी अपनी छवि भी इस चुनावी मुक़ाबले में उनका खेल बिगाड़ सकती है. साल 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कथित रूप से लगे देश विरोधी नारे लगने के प्रकरण के चलते उन्हें बार-बार ‘देशद्रोही’ साबित करने की कोशिश की गई है. हालांकि इस मामले की जांच ख़ुद ही सवालों के घेरे में है. लेकिन इससे बेगूसराय के लोग कितने वाक़िफ़ हैं, और वाक़िफ़ हैं तो क्या इससे वे कन्हैया पर लगे देशद्रोही के तमगे को ख़ारिज कर देंगे, यह सवाल इस युवा नेता के लिए चुनौती बन सकता है. ग़ौरतलब है कि प्रत्याशियों की सूची जारी करने के बाद राजद ने कन्हैया को महागठबंधन में शामिल नहीं करने के पीछे एक कारण यह भी बताया था.

चुनावी ख़र्च का इंतिज़ाम

कन्हैया कुमार के लिए एक और चुनौती चुनावी ख़र्च के लिए पैसे का इंतज़ाम करना है. उनके दोनों प्रतिद्वंद्वियों के पास चुनावी ख़र्च के लिए पैसे की किल्लत शायद ही हो. लेकिन कन्हैया के लिए यह एक मुश्किल हो सकती है. यहां जेएनयू जैसे हालात नहीं होंगे जहां वामपंथी धड़ा ख़ुद से बनाए पोस्टर-बैनर की मदद से प्रचार कर छात्र संघ के चुनाव जीत लेता है. कन्हैया यह जानते हैं, इसलिए ऑनलाइन क्राउडफ़ंडिंग के ज़रिये 70 लाख रुपये इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं. ख़बरों के मुताबिक़ उन्होंने 30 लाख रुपये से अधिक फ़ंड मिल भी गया था, लेकिन बीच-बीच में इस वेबसाइट को कथित रूप से हैक किया जा रहा था. यह देखना होगा कि वे 70 लाख रुपये इकट्ठा कर पाते हैं या नहीं. वहीं, क्राउडफ़ंडिंग के अलावा कन्हैया के पास धन इकट्ठा करने का कोई और ज़रिया है, इसकी कोई जानकारी नहीं है. हालांकि उन्हें कई लोगों से समर्थन मिल रहा है जिनमें बॉलीवुड की हस्तियां भी शामिल हैं.

वामपंथ के ढहते क़िले को बचाना

हाल के वर्षों में वामपंथी दलों को एक के बाद एक चुनावी हारों का सामना करना पड़ा है. यह एक आम राय बन गई है कि केरल जैसे एकाध राज्य को छोड़ दें तो वामपंथ एक ढहता क़िला है जिसके पूरी तरह गिरने में अब ज़्यादा समय नहीं है. ऐसे में वामपंथ के एक मज़बूत क़िले जेएनयू से निकले कन्हैया कुमार वाम दलों के लिए भी उम्मीद लेकर आए हैं. उनकी हार से वामपंथ की राजनीतिक मौत हो सकती है. लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अगर वे जीत गए तो एक साथ कई ग़लतफ़हमियों को दूर कर देंगे.