निर्देशक : रॉबी ग्रेवाल

लेखक : रॉबी ग्रेवाल, राहुल सेन गुप्ता

कलाकार : जॉन अब्राहम, जैकी श्रॉफ, सिकंदर खेर, मौनी रॉय, रघुवीर यादव, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, अनिल जॉर्ज

रेटिंग : 2/5

जासूसी थ्रिलर फिल्मों का अपना रोमांच होता है. थोड़ी-सी हकीकत में ढेर-सारा फसाना मिलाकर अमेरिकी और ब्रिटिश ऐस्पियनॉज थ्रिलर फिल्में कई दशकों से हमारा मनोरंजन करती आ रही हैं. बॉन्ड, बॉर्न और मिशन इम्पॉसिबल सीरीज से लेकर हाल के समय की ‘टिंकर, टेलर, सोल्जर, स्पाई’ (2011), ‘आर्गो’ (2013), ‘किंग्समैन’ (2014, 2017), ‘द मैन फ्रॉम अंकल’ (2015) जैसी कई विदेशी फिल्में फैक्ट और फिक्शन का दिलचस्प फेंटा लगाकर विश्व-भर के दर्शकों को अपना मुरीद बनाती रही हैं.

वहीं हमारे यहां निकट के समय की सर्वश्रेष्ठ जासूसी थ्रिलर फिल्म होने का खिताब महिला-प्रधान ‘राजी’ (2018) को जाता है. आलिया भट्ट अभिनीत इस फिल्म ने इस जॉनर की विदेशी फिल्मों से प्रेरित होने की जगह अपनी कहानी में ‘भारतीय इमोशन्स’ को प्रमुखता दी थी. इस जॉनर की सभी फिल्मों की तरह जासूसी के तौर-तरीकों को रोचकता से कहानी में शामिल करने के बावजूद फिल्म में मौजूद शुद्ध भारतीय भावनाएं ही थीं जिन्होंने ‘राजी’ को करोड़ों हिंदुस्तानी दर्शकों से जोड़ा था.

दूसरी तरफ ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ में निर्देशक रॉबी ग्रेवाल मशहूर विदेशी ऐस्पियनॉज थ्रिलर फिल्मों के जैनेरिक टेम्पलेट के प्रति ही प्रतिबद्ध रहते हैं. उसके इर्द-गिर्द ही बेहद गंभीरता से अपनी कहानी बुनते हैं और जासूसी के (फिल्मी) तौर-तरीकों को दिखाने के प्रति भी हद प्रतिबद्ध नजर आते हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि जॉन अब्राहम की ‘देशभक्ति फ्रेंचाइची’ की इस नई फिल्म में फिर भी वह थ्रिल मौजूद नहीं मिलता जिसकी उम्मीद आपको एक होशियार जासूसी थ्रिलर फिल्म से हमेशा रहती है. उम्दा प्रोडक्शन डिजाइन और सिनेमेटोग्राफी की मदद से ग्रेवाल 70 के दशक का विश्वसनीय माहौल रचने में तो सफल हो जाते हैं लेकिन अपनी बेहद धीमी रफ्तार वाली फिल्म की लिखाई में उस स्तर की मेहनत नहीं करते कि वह रहस्य और रोमांच से लबरेज हो सके.

‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ देखकर आपको दिबाकर बनर्जी की ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी!’ (2015) भी याद आ सकती है. मुख्तलिफ जॉनर की होने और कथाएं भी अलग कहने के बावजूद उस फिल्म ने भी जॉन अब्राहम की फिल्म की तरह लंबे समय तक बिल्ड-अप लिया था, दर्शकों को खूब घुमाया था, तकनीकी पक्ष मजबूत रखा था, लेकिन आखिर में जब रहस्य से परदा हटा तो फिल्म खोदा पहाड़ निकला चूहा वाली वीरगति को प्राप्त हुई थी. ‘रोमियो…’ का रहस्य भी ऐसा नहीं है कि आप हिल जाएं, न ऐसा है कि पूरी तरह विश्वसनीय लगे, और न ऐसा कि धीमी गति की इस बेहद लंबी लगती फिल्म की रफ्तार को जस्टीफाई ही कर सके.

इसीलिए, दिबाकर बनर्जी की उस लंबे नाम वाली फिल्म की तरह ही ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ के लिए भी कहा जाएगा - ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे!’

एक जमाने में डेविड फिंचर की ‘सेवन’ (1995) से प्रभावित होकर सुष्मिता सेन और जैकी श्रॉफ अभिनीत दर्शनीय ‘समय’ (2003) बनाने वाले रॉबी ग्रेवाल ने अपनी नयी फिल्म की कहानी साफ तौर पर रवींद्र कौशिक के जीवन से प्रभावित होकर लिखी है. रवींद्र कौशिक रॉ के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने वाले हिंदुस्तानी एजेंट थे और ‘रोमियो...’ उनके जीवन की कई सार्वजनिक घटनाओं को अपनी फिल्म का हिस्सा बनाती है.

नाटकों में काम करने की उनकी दिलचस्पी से लेकर उनके पाकिस्तानी आर्मी में मेजर बन जाने तक की सार्वजनिक जानकारियों को 1971 के हिंदुस्तान-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश की आजादी के लिए तैयार की गई मुक्ति बाहिनी सेना जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों से जोड़ा गया है. हालांकि कहा जाता है कि रवींद्र कौशिक 1974-75 के दौरान पाकिस्तान गए थे (रॉ के जासूसों की जिंदगी की असली कहानी जानने के लिए इस पुरानी रिपोर्ट को जरूर पढ़ें) लेकिन ग्रेवाल ने उन्हें अपनी काल्पनिक कहानी में 1971 की ऐतिहासिक घटनाओं के बीच ही पाकिस्तान पहुंचा दिया.

हममें से कोई नहीं जानता कि रवींद्र कौशिक ने पाकिस्तान में रहकर कौन-कौनसी संवेदनशील जानकारियां रॉ से साझा की थीं. जान भी नहीं पाएंगे, क्योंकि यह सब कभी सार्वजनिक डोमेन में नहीं आता. लेकिन ‘रोमियो...’ जब यह दिखाती है कि उसके नायक जासूस की वजह से हिंदुस्तान पूरे 10 साल तक पाकिस्तानी साजिशों को नाकाम करता रहा और पाकिस्तानियों को अपनी असफलताओं की भनक तक नहीं लगी, तो यह सबकुछ सिनेमा के परदे पर देखना अतिशयोक्ति मालूम होता है. विश्वास करना मुश्किल होता है.

इसी के चलते ‘रोमियो...’ की एक बड़ी कमी कल्पना की जरूरत से ज्यादा ऊंची उड़ान भरना भी है. रियलिज्म के प्रति आग्रह रखने वाली फिल्म को ऐसी घटनाओं में भी यथार्थवाद बरकरार रखना चाहिए था.

‘रोमियो...’ को रवींद्र कौशिक और दूसरे अनजान भारतीय जासूसों के आंतरिक संघर्षों को भी परदे पर उतारना था. तभी इस अविश्वसनीय कथा को वह आयाम मिल पाता जिससे कि वो ‘राजी’ की लीग की ‘मानवीय’ फिल्म बनती. रॉबी ग्रेवाल इसकी थोड़ी-बहुत कोशिश करते भी हैं तो उनके मुख्य अभिनेता का काठ-सा अभिनय नायक के आंतरिक द्वंद्वों को उभारने में हमेशा आड़े आ जाता है. जॉन अब्राहम केवल कठोर और सपाट चेहरे की आवश्यकता वाले रोल ठीक-ठाक तरीके से निभा पाते हैं लेकिन ‘रोमियो...’ का उनका किरदार ऐसे कठोर-सपाट चेहरे की मांग करने के अलावा भी उनसे बहुत ज्यादा की दरकार रखता था.

‘रोमियो...’ में एक बढ़िया चेज-सीक्वेंस भी है जिसमें पार्श्व में बजती अजान के आगे जॉन पुलिस से भागते नजर आते हैं. इसी दौरान वे एक पानी की हौज में डुबकी लगाकर लंबे वक्त तक छिपे रहते हैं. लेकिन जब पानी से बाहर निकलते हैं तो आश्चर्य होता है यह देखकर कि वे देर तक सांस रोकने की वजह से पैदा हुई चेहरे को छटपटाहट तक का अभिनय नहीं कर पा रहे! सिर्फ इस सीन को देखकर आप माथा पीट सकते हैं और सोच सकते हैं कि भुजाओं की मछलियों में हद दिलचस्पी लेने वाले स्टार चेहरे का व्यायाम करने में इतना आलस्य क्यों दिखाते हैं!

लचर पटकथा के अलावा जॉन का निर्जीव काठ अभिनय ही ‘रोमियो...’ की सबसे बड़ी कमी है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस जरूर प्रभावी है लेकिन भावनात्मक गहराई की मांग करने वाले किरदार के लिए वे उपयुक्त नहीं हैं. पहले इस फिल्म से जुड़े रहे सुशांत सिंह राजपूत इस किरदार में ज्यादा फबते.

मौनी रॉय को फिल्म ज्यादा कुछ करने के मौके नहीं देती और वे भी कम में ही खुश नजर आती हैं. रघुवीर यादव छोटे किरदारों में भी छाप छोड़ने वाले अदाकार हैं और यहां भी वे यही करते हैं. सिकंदर खेर पाकिस्तान का स्थानीय लहजा खूब पकड़ते हैं और ‘तेरे बिन लादेन 2’ (2016) के वक्त से ही निखरता चला जा रहा उनका अभिनय यहां भी प्रभाव छोड़ता है.

जैकी श्रॉफ रॉ के चीफ श्रीकांत राय के रोल में हैं और यह रोल रॉ के संस्थापक रहे आरएन कॉव पर आधारित है. अगर आपने कॉव के बारे में पढ़ा है या उनकी रहस्यमयी शख्सियत के बारे में थोड़ी-बहुत मालूमात रखते हैं तो जैकी श्रॉफ का अभिनय आपको काफी पसंद आएगा. इस रोल के लिए जिस रहस्यमयी आभामंडल की आवश्यकता थी उसे जैकी श्रॉफ ने बेहद कुशलता से परदे पर रचा है और उनकी नैचुरल स्टाइल व स्वैग ने भी ऐसा करने में बड़ी भूमिका अदा की है.

उनके लिए, समाज में हाशिए पर रहने वाले जासूसों की कहानी कहने की अच्छी नीयत रखने के लिए, और निर्देशक रॉबी ग्रेवाल की (अधूरी) मेहनत के लिए इस साधारण फिल्म को देख लीजिए. ये अपने तीसरे और आखिरी हिस्से में आपको थोड़ी राहत जरूर देगी, हालांकि गर्मी के इस मौसम में केवल एक तिहाई पानी से भरे गिलास से भला किसकी प्यास बुझ सकेगी!