चुनाव का पहला चरण नजदीक आ गया है. अब तो आप काफी व्यस्तता होंगे.

हां, थोड़ी व्यस्तता तो है ही. दिनभर देखना पड़ता है कि नेताओं के भाषण सुन-सुनकर चुनाव आचार संहिता ने कहीं बिल्कुल दम ही तो नहीं तोड़ दिया. हमारी पूरी कोशिश है कि आचार संहिता बनी रहे. भले ही वो घायल हो जाए, मरणासन्न हो जाए लेकिन उसका जीवित बचे रहना भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है. आयोग इसी कोशिश में लगा है.

आखिर चुनाव आयोग आचार संहिता का सख्ती से पालन क्यों नहीं करवा पाता?

देखिए, हमारे नेता लोग लोकतंत्र के बच्चे हैं और बच्चों पर ज्यादा सख्ती ठीक नहीं है. ज्यादा सख्ती करने पर भी बच्चे बिगड़ जाते हैं. कई बार तो ज्यादा सख्त होने पर पलटकर जवाब भी देते हैं. अब देखिए, महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर जी पुलवामा हमले और सेना को राजनीतिक भाषणों में न लाने की बात पर इतना नाराज हो गए कि उन्होंने कहा कि हम सत्ता में आए तो चुनाव आयुक्त को दो दिन के लिए जेल भेजेंगे. तो हमने तय किया है कि आचार संहिता का उतना ही पालन करवाओ कि जितने में जेल न जाने पड़े.

चुनाव आयोग तो एक संवैधानिक संस्था है. आपने इस बयान का संज्ञान लेकर इस पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की?

हां, चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है. लेकिन जिस संविधान ने चुनाव आयोग बनाया, उसी संविधान ने ही तो सत्ता भी बनाई है, जेल भी बनाई है और नेता भी बनाए हैं. सब संविधान से ही जन्मे हैं. इसीलिए हर आदमी की बात को गंभीरता से लेना चाहिए. और वैसे भी चुनाव आयुक्त को जेल भेजने की बात कहने से चुनाव प्रक्रिया पर तो कोई असर पड़ता नहीं. एक जाएगा दूसरा आ जाएगा. चयन समितियां अपने काम में लगी ही हुई हैं. न्यायपूर्ण चुनाव प्रक्रिया के लिए हमने इसे तूल नहीं दिया.

लेकिन इस चुनाव में हद हो रही है. देश की सेना को ‘मोदी जी की सेना’ कहा जा रहा है. शहीदों की तस्वीरें प्रचार गाड़ियों, रैलियों में लग रही हैं. लेकिन आयोग की तरफ से कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाया जा रहा?

हीं ऐसा नहीं है. हमने इस बारे में विचार-विमर्श किया कि इस पर क्या सख्त कदम उठाया जा सकता है. तो पता चला कि जो सबसे ज्यादा सख्त कदम उठाया जा सकता है, वो है नोटिस. हमने सख्त कदम उठाते हुए योगी आदित्यनाथ जी को नोटिस भेज दिया और उन्होंने हमारे सख्त नोटिस का बड़े प्यार से जवाब भेज दिया. नोटिस के प्यार से भेजे गए जवाब के बाद भी हमने सख्ती दिखाई और उन्हें आगे ऐसा न करने की नसीहत दी. अब और क्या किया जा सकता है!

लेकिन, आयोग पर बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं? रफाल पर किताब आने वाली थी तो पुलिस ने उसकी प्रतियां जब्त कर लीं. जबकि प्रधानमंत्री के भाषण वाले नमो टीवी पर कुछ फैसला ही नहीं हो पा रहा है.

आजकल चुनाव आयोग तो किसी चीज का स्वतः संज्ञान लेता नहीं है. पुलिस ने रफाल सुना तो उसे लगा कि ये कुछ जरूर चुनाव में गड़बड़ कर सकता है तो उसने स्वतः संज्ञान लेकर रफाल वाली किताब की कापियां जब्त कर लीं. चुनाव आयोग का इसमें कोई हाथ नहीं है. बाद में आयोग ने कहा कि किताब लॉन्च होने दो. वैसे भी किताब कौन पढ़ रहा है. बाकी नमो टीवी पर सरकार के मंत्रालय ही तय नहीं कर पा रहे हैं कि ये समाचार चैनल है या कुछ और है. वैसे भी उस पर दिनभर मोदी जी के भाषण ही आते हैं और वो तो बाकी चैनलों पर भी आते रहते हैं. आयोग किस-किस को बंद करे.

‘मिशन शक्ति’ की घोषणा भी बहुत सनसनीखेज और राजनीतिक लाभ लेने वाले अंदाज में की गई, लेकिन आयोग ने उस शिकायत पर भी कोई गौर नहीं किया.

हां, हमें पता चला कि मिशन शक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बात है इसलिए हमने उसके चुनावी इस्तेमाल की बात पर गौर करने के बजाय गर्व किया. अब आप क्या चाहते हैं कि देश के चुनाव आयोग को भी देशद्रोही बताकर उसे पाकिस्तान का चुनाव आयोग कहा जाने लगे!

‘पीएम नरेंद्र मोदी’ फिल्म पर भी चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया जबकि विपक्ष कह रहा है कि इससे भाजपा को चुनाव में फायदा हो सकता है.

चुनाव आयोग के पास अपने खुद के काम बहुत ज्यादा हैं और आप चाहते हैं कि हम सेंसर बोर्ड का काम भी अपने हाथ में ले लें. अदालतें देख रही हैं इस फिल्म को. जैसा कहेंगी, वैसा कर लेंगे.

लेकिन एक दौर था कि जब टीएन शेषन या लिंगदोह के समय में चुनाव आयोग ने अपनी एक साख बनाई थी. उसके मुकाबले अभी का चुनाव आयोग कमजोर क्यों दिख रहा है?

अच्छा! आपको चुनाव आयोग कमजोर लग रहा है. आप उन संस्थाओं को नहीं देख रहे हैं जो यह आंकड़े तक नहीं जारी कर पा रहीं कि कितने बेरोजगार हैं, कितनों को काम मिला. कोर्ट तक में टाइपिंग एरर हो जा रही हैं. अरे, हम कम से कम चुनाव तो करवा रहे हैं. वीवीपैट भी कर दिया और क्या चाहिए!

एक आखिर सवाल...?

नहीं अब कोई सवाल नहीं. मुझे लग रहा है कि आचार संहिता कहीं मुश्किल में हैं. मुझे जाना होगा.