कश्मीर घाटी में लगभग पिछले एक दशक से लोग राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाइवे)- 44 पर चल रहे काम के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे थे. यह वाजिब भी था. इस परियोजना का मकसद था लोगों के लिए सफर को बेहतर बनाना. कश्मीर में पिछले तीन दशक के दौरान विकास की सबसे अहम परियोजना माने जाने वाले इस हाइवे पर काम पिछले साल निपटा. लेकिन लोगों को आराम से सफर करते हुए और राहत की सांस लिए हुए कुछ ही महीने हुए थे कि यही हाइवे लोगों के लिए एक बुरा सपना बन गया है.

14 फरवरी को पुलवामा हमले के बाद से लेकर अब तक इस राजमार्ग पर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजामात में सबसे ज़्यादा दिक्कत आम नागरिकों ने उठाई है. अब सरकार के नए फैसले को देखें तो उनकी मुश्किलें कम होने के बजाए और बढ़ती दिखाई दे रही हैं. राज्य सरकार ने दो महीनों के लिए हर हफ्ते के इतवार और बुधवार को एनएच-44 पर असैनिक यातायात पर रोक लगा दी है.

जम्मू कश्मीर सरकार, जिसकी डोर अभी राज्यपाल सत्यापल मलिक के हाथों में है, ने यह आदेश तीन अप्रैल को जारी किया था. आदेश में कहा गया है, ‘आम जनता को दिक्कत न हो, इसलिए सरकार ने ये फ़ैसला लिया है कि इन दो दिनों, सुबह चार बजे से लेकर शाम के पांच बजे तक उत्तर कश्मीर के बारामूला से लेकर जम्मू के पास ऊधमपुर तक कोई असैनिक यातायात नहीं चलेगा.’ यह भी कि यह फैसला फिदायीन (आत्मघाती) हमलों से सावधान रहने के लिए लिया गया है क्योंकि पुलवामा हमले के बाद हाल में बनिहाल में भी इसी तरह के हमले की एक और कोशिश की गई.

बारामूला और ऊधमपुर का रास्ता कुल मिलाकर करीब 270 किलोमीटर का है जिस पर हफ्ते के दो दिन अब कोई असैनिक गाड़ी नहीं चलेगी. ज़ाहिर है, कश्मीर में लोग परेशान हैं. जहां कुछ लोग इस आदेश को मानवाधिकारों का उलंघन मान रहे हैं वहीं कुछ यह कह रहे हैं कि यह कश्मीर को इसराइल के नक्शे कदम पर चलते हुए फिलिस्तीन बनाने की एक कोशिश है.

इससे पहले कि इन सब बातों पर कोई चर्चा की जाये, यह जानना ज़रूरी होगा कि आखिर हुआ क्या और कैसे.

हुआ क्या?

बीती 14 फ़रवरी को इसी एनएच-44 पर पुलवामा जिले में एक फिदायीन (आत्मघाती) हमला हुआ था, जिसको हम सब अब पुलवामा हमले के नाम से पहचानते हैं. इस हमले में एक कश्मीरी युवक ने अपनी गाड़ी, जो विस्फोटकों से लैस थी, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की गाड़ी से भिड़ा दी थी. हमले में 40 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी मारे गए और करीब इतने ही घायल हो गए. इस हमले ने भारत और पाकिस्तान को युद्ध के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया.

कश्मीर घाटी में भी चीज़ें बहुत तेज़ी से बदलती नज़र आईं. हमले के अगले दिन ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर आए और सुरक्षा का जायज़ा लेते हुए यह निर्णय लिया कि सुरक्षा बलों के काफिले जब सड़क से गुज़र रहे हों तो असैनिक यातायात नहीं चलने दिया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘लोगों को थोड़ी तकलीफ होगी लेकिन मुझे लगता है वे हमें समर्थन देंगे.’

उस समय किसी को शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि यह थोड़ी सी तकलीफ थोड़ी सी नहीं होगी. अगले दिन से ही गाड़ियों की लंबी कतारें घंटों तक एनएच-44 पर खड़ी नज़र आने लगीं. इन गाड़ियों को सुरक्षा बलों की गाड़ियां गुज़रने से पहले आधा घंटा और उनके गुज़र जाने के बाद आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ता था.

अनंतनाग और श्रीनगर के बीच रोज सफर करने वाले एक यात्री का कहना था, ‘यहां तक कि स्कूल बसों और एंबुलेंसों को भी रोका जा रहा था. जहां कहीं कोई सुरक्षा बलों के साथ बहस करने की कोशिश करता उसको गाड़ी में से नीचे उतार कर सरेआम पीटा जाता.’

लोग अपने दफ्तर देर से पहुंचने लगे. स्कूल के बच्चे घंटों ठंड में खड़े रहते और मरीज रास्ता मिलने के इंतज़ार में एंबुलेंस में परेशान रहते. कुछ दिन बाद सरकार ने यह निर्णय तो ले लिया कि स्कूल बसों और एंबुलेंसों को सुरक्षा बलों के काफिलों के साथ चलने दिया जाएगा, लेकिन ऐसा हो रहा है या नहीं कहा नहीं जा सकता. सरकार, पुलिस अधिकारी या सेना-कोई भी इस मुद्दे पर बात नहीं कर रहा था, न अभी कर रहा है.

सत्याग्रह ने सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल से बात करने की कोशिश की. उनका कहना था कि वे वापस फोन करके इसका जवाब देंगे. लेकिन न फोन आया और न उन्होंने इसके बाद किए जाने वाले फोन का जवाब दिया. एक आला पुलिस अधिकारी ने यह तो कह दिया कि वे इन सब शिकायतों की जांच करेंगे, लेकिन यह भी उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर कहा. वहीं सेना के एक आला अधिकारी ने कुछ दिन पहले श्रीनगर में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन सब बातों को प्रोपेगेंडा कहते हुए नकार दिया था.

उधर, ज़मीन पर चीज़ें बिगड़ती रहीं और नतीजा यह हुआ कि कुछ दिन पहले पुलवामा जिले के लेथ्पोरा, जहां पुलवामा हमला हुआ था, में लोग सड़कों पर आ गए. उन्होंने इल्ज़ाम लगाया कि सुरक्षा बलों ने एक स्कूल बस के शीशे तोड़े और कुछ लोगों के साथ मारपीट की. स्थानीय सूत्रों ने सत्याग्रह को बताया कि मौके पर वहां के एसपी और कुछ आला अधिकारी पहुंच गए थे और लोगों से बात करके उन्होंने मामला निपटा लिया था. इस घटना के अगले दिन ही सरकार ने दो दिन सारा असैनिक यातायात रोक देने का ऐलान कर दिया.

पिछले दो महीने की ही तरह सरकार और सुरक्षा अधिकारी इस बात पर चुप्पी साधे हुए हैं. आलम यह है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह इस पर बात करने से कतराते नजर आए. उनका कहना था, ‘आपको आदेश जारी करने वाले प्राधिकरण से बात करनी चाहिए.’

लेकिन सरकार भले ही चुप हो, लोग और उनके प्रतिनिधि बोलते दिखाई दे रहे हैं.

किसने क्या कहा?

हाल फिलहाल ही आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीतिक पार्टी बनाने वाले शाह फैसल ने इस आदेश को कश्मीर को दक्षिण एशिया का फिलिस्तीन बनाने की कोशिश बताया. उनका कहना था, ‘यह और कुछ नहीं है, बस इसराइली मानसिकता है कश्मीर को दक्षिण एशिया का फिलिस्तीन बनाने की.’ उनका सवाल था कि कैसे कोई लोकतांत्रिक समाज लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगा सकता है. शाह फैसल ने कहा, ‘और ऐसे प्रतिबंध को औचित्य कैसे साबित किया जा सकता है?’

उधर कश्मीर की लगभग सारी राजनीतिक पार्टियों ने इस फैसले की निंदा की है. पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने चिंता जताते हुए कहा कि भारत सरकार को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कश्मीरी लोगों के साथ क्या होता है. उनका कहना था, ‘उनको बस कश्मीर चाहिए, कश्मीर के लोग नहीं.’ एक और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उन्होंने 1990 से कोई ऐसी सरकार नहीं देखी है जिसने कश्मीर के लोगों को मुख्यधारा से इतना दूर किया हो.

कश्मीर में स्थित और सारे बड़े मुख्यधारा के राजनेताओं, जिनमें फारुक अब्दुल्ला, सज्जाद लोन, इंजीनियर रशीद और अन्य लोग शामिल हैं, ने सरकार के इस फैसले की कड़ी निंदा की है. अलगाववादी संगठन भी अपनी और से इस बात का विरोध कर रहे हैं. कश्मीर के वरिष्ठ अलगाववादी नेता सैय्यद अली गिलानी ने सरकार के इस फैसले को कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन कहा है. उनका कहना था, ‘कश्मीर में विस्तार से कब्रिस्तान बनाने के बाद भारत सरकार अब बेशर्मी से आम जनता को गला घोंट कर मार देना चाहती है.’ उनका यह भी कहना था कि लोगों को इस बुनियादी ज़रूरत से दूर रखना एक अक्षम्य अपराध है. गिलानी ने कहा, ‘सरकार को चाहिए कि सारे अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटियां बंद कराके सिर्फ सशस्त्र बलों को घूमने की इजाज़त दे.’ साथ ही चेतावनी भी दी कि सरकार के इस फैसले से भूचाल आ जाएगा.

लेकिन राजनेताओं की ऐसी टिप्पणियों और आपत्तियों के बावजूद सरकार टस से मस होती नहीं दिखाई दे रही है. यह बात आम जनता को बहुत परेशान करती दिखाई दे रही है क्योंकि सरकार के इस फैसले का प्रभाव सिर्फ रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर ही नहीं बल्कि लोगों के व्यवसाय पर भी पड़ने वाला है.

असर

कश्मीर चेम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (केसीसीआई) के अध्यक्ष शेख आशिक कहते हैं कि यह फैसला लोगों को होने वाली दिक्कतों को मद्देनज़र रखे बिना ही लिया गया है. वे बताते हैं, ‘कश्मीर में जो भी सामान आता है वो अन्य राज्यों से आता है और ये एक ही सड़क है जिससे यह सारा सामान आता है. इसको ऐसे बंद कर देना कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकरी साबित हो सकता है.’

उनके मुताबिक इससे कश्मीर के पर्यटन उद्योग पर भी बहुत बुरा असर पड़ने वाला है. शेख कहते हैं, ‘जहां एक तरफ सरकार और निजी स्तर पर लोग कश्मीर में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की कोशिशों में लगे हुए हैं वहीं ऐसे फैसले कश्मीर में पर्यटकों का आना कम कर देंगे.’

पर्यटन के अलावा बागवानी क्षेत्र के लोग भी बहुत चिंतित हैं. उन्हें डर है कि सरकार का यह फैसला उनका करोड़ों का नुकसान करा देगा. कश्मीर में सेब की खेती करने वालों ने अच्छे दाम न मिलने के चलते, अपनी फसल का ज्यादातर हिस्सा कोल्ड स्टोर्स में रख दिया था और अब ये उसको बाहर भेजने का प्रबंध कर रहे थे ताकि उन्हें अपनी फसल के अच्छे पैसे मिल पाते. एक अनुमान के मुताबिक कश्मीर में इस समय 250 करोड़ रु से ज़्यादा के सेब कोल्ड स्टोर्स में पड़े हुए हैं.

दक्षिण कश्मीर के शोपियां में रहने वाले सेब के किसान राशिद हसन सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘अब जबकि दो दिन हफ्ते में यातायात बंद रहने वाला है, हमारी गाड़ियां हफ्ते भर से पहले जम्मू नहीं पहुंच पाएंगी. ऐसे में सेब तो सड़ ही जाएंगे और गाड़ियों का खर्चा अलग देना पड़ेगा.’

इकलौता राजमार्ग होने के चलते एनएच-44 पर आम हालात में भी सामान से लदी गाड़ियों को 300 किलोमीटर तय करने में-तीन से चार दिन लग ही जाते हैं. शेख आशिक कहते हैं, ‘यह कोई और राज्य तो है नहीं जहां एक रास्ता बंद कर दिया जाये तो दो और तैयार हैं. हमारे पास यही एक रास्ता है और इसको बंद कर देना हमें बहुत कष्ट देने वाला फैसला है.’

इधर, स्थानीय टैक्सी वाले भी परेशान हैं. ये लोग अपनी रोज़ी-रोटी कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच यात्रियों को ढोकर कमाते हैं. अनंतनाग के जावेद अहमद शेख ऐसे ही एक टैक्सी ड्राइवर हैं. उन्होंने पिछले साल बैंक से लोन लेकर एक ‘टैवेरा’ गाड़ी खरीदी थी. शेख रोज़ 500-700 रुपये बचाकर हर दो-तीन दिन में अपने बैंक खाते में जमा करा देते हैं, ताकि थोड़ा बोझ कम हो. वे कहते हैं, ‘अब जब हफ्ते में दो दिन में कुछ नहीं करूंगा तो कम से कम 6000 रुपये कम पड़ने वाले हैं. मैं सोच सोच के हलकान हुआ जा रहा हूं कि कैसे अपने परिवार का पेट पालूंगा और कैसे लोन चुकता करूंगा.’

शेख की तरह ही सैकड़ों लोग हैं जो अलग-अलग तरह की गाड़ियां चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं. ये सब अब महीने में आठ दिन कुछ नहीं कमाएंगे. वहीं आम जनता के दिल में सैकड़ों सवाल हैं. ‘कोई बीमार हो गया तो क्या होगा?’, ‘कोई रिश्तेदार मर गया तो कैसे जाएंगे?’, ‘बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे?’, ‘दफ्तरों में काम कैसे होगा?’

जवाब लेकिन कोई नहीं है. प्रशासन चुप्पी साधे हुए है. अब जो होगा शायद वक़्त ही बताएगा.