चुनाव आयोग ने झारखंड की 14 लोकसभा सीटों के लिए चार चरण में मतदान तय किया है. सबसे पहले 29 अप्रैल को चौथे चरण में तीन लोकसभा सीटों के लिए मतदान होना है. वहीं, छह और 12 मई को चार-चार और उसके बाद सातवें और आखिरी चरण यानी 19 मई को तीन सीटों के लिए वोटर कतारों में दिखेंगे. राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल इस चुनावी संघर्ष के लिए अपनी-अपनी कमर कसते हुए दिख रही हैं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां 12 सीटें हासिल की थीं. बाकी दो सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को जीत मिली थी.

इस बार झारखंड में चुनावी संघर्ष भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और महागठबंधन के बीच है. राजग में भाजपा के साथ ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) है. आजसू को गिरिडीह सीट दी गई है. वहीं, महागठबंधन के भीतर कांग्रेस सात, जेएमएम चार और झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) को दो सीटें लड़ने के लिए मिली हैं. इनके अलावा पलामू सीट राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के हिस्से में गई है. हालांकि, इसके साथ चतरा सीट न मिलने पर राजद ने महागठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया है और यहां भी अपना उम्मीदवार उतार दिया है.

इन उम्मीदवारों के अलावा राजग और महागठबंधन की ओर से अब तक घोषित उम्मीदवारों में एक भी मुसलमान नहीं है. आगे भी इसकी संभावना न के बराबर ही है जबकि राज्य में इस समुदाय की आबादी करीब 15 फीसदी है. यानी झारखंड में हर सात में एक व्यक्ति इस समुदाय से आता है. इसके बावजूद संसद में इसके प्रतिनिधि को भेजने के लिए कोई पार्टी तैयार नहीं दिख रही है. अब अगर हम इस राज्य की तुलना पड़ोसी राज्य बिहार से करें तब यह तथ्य चौंकाता है. बिहार में मुसलमानों की आबादी करीब 17 फीसदी यानी झारखंड से बस दो फीसदी ही ज्यादा है. लेकिन, मुसलमान प्रत्याशियों की संख्या पर ध्यान दें तो दोनों राज्यों में एक बड़ा अंतर दिखता है.

बिहार में राजद ने चार, कांग्रेस ने दो और जदयू ने एक मुसलमान उम्मीदवार को चुनावी दंगल में उतारा है. पूरे देश में यदि इस समुदाय से उम्मीदवार खड़े करने की बात की जाए तो बाकी दलों के बीच राजद इस मामले में अव्वल है. वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय और दोराब आर सोपारीवाला की किताब ‘द वर्डिक्ट’ की मानें तो साल 2014 तक हुए लोकसभा चुनावों में कुल राजद उम्मीदवारों में मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक 17 फीसदी थी. वहीं इस बार यह आंकड़ा 25 फीसदी है. लेकिन इस समुदाय को सबसे अधिक हिस्सेदारी देने के मामले में अव्वल रहने वाली राजद ने भी इस बार झारखंड में इनको प्रतिनिधित्व नहीं दिया है. दिलचस्प बात है कि बिहार के बेगूसराय में तनवीर हसन को उम्मीदवार घोषित करने को लेकर पार्टी नेतृत्व ने एक दलील यह भी दी थी कि यदि ऐसा नहीं किया जाता तो अल्पसंख्यक समुदाय में गलत संदेश जाता. इस सीट पर सीपीआई ने दावेदारी की थी लेकिन महागठबंधन ने उसे यह सीट नहीं दी है.

अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में पार्टीवार मुसलमान उम्मीदवारों की हिस्सेदारी | साभार : द वर्डिक्ट
अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में पार्टीवार मुसलमान उम्मीदवारों की हिस्सेदारी | साभार : द वर्डिक्ट

हालांकि झारखंड में महागठबंधन की ओर से इस समुदाय के मतदाताओं को यह आश्वासन देने की कोशिश की गई है कि किसी मुस्लिम को राज्यसभा भेजा जाएगा. जानकारों की मानें तो महागठबंधन को इस बात की आशंका है कि इस चुनाव में मुसलमानों को प्रतिनिधित्व नहीं देने की वजह से उन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है. इस नुकसान को कम करने की कोशिश के तहत ही ये भरोसा दिया गया है. दूसरी ओर, भाजपा भी मुसलमानों को टिकट देने से झारखंड सहित अन्य राज्यों में बचती हुई दिखती है.

16वीं लोकसभा (2014-19) में राज्य का प्रतिनिधित्व करने वालों सांसदों में एक भी मुसलमान समुदाय से नहीं है. इससे पहले 15वें लोकसभा चुनाव में भी राज्य की किसी भी सीट पर मुसलमान उम्मीदवार को जीत नहीं मिली थी. हालांकि, गोड्डा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार फुरकान अंसारी दूसरे पायदान पर रहे थे. उन्हें भाजपा के निशिकांत दुबे के हाथों हार का सामना करना पड़ा. इससे पहले 2004 के चुनाव में उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज की थी. इस चुनाव में गोड्डा सीट बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के हिस्से में चली गई है जहां प्रदीप यादव उसके उम्मीदवार हैं. इस पार्टी ने साल 2009 के चुनाव में रांची और गिरिडीह से मुसलमान उम्मीदवारों को उतारा था. लेकिन, दोनों चुनावी नतीजों में तीसरे पायदान पर रहे.

वहीं, अगर विधानसभा की बात करें तो साल 2014 के चुनाव में 81 में से केवल पाकुड़ और जामतारा सीट पर मुसलमान उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी. इससे पहले साल 2009 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के एक और जेएमएम के दो मुसलमान उम्मीदवारों ने जीत का स्वाद चखा था. वहीं, झारखंड के पहली विधानसभा (2005) में इस समुदाय के विधायकों की संख्या भी केवल दो ही थी. यानी अब तक राज्य में कुल सात मुसलमान प्रत्याशी ही विधानसभा के दरवाजे तक पहुंच पाने में कामयाब हो पाए हैं.

लोकसभा चुनाव में मुसलमान प्रत्याशी उतारने की मांग | साभार : आम्या
लोकसभा चुनाव में मुसलमान प्रत्याशी उतारने की मांग | साभार : आम्या

झारखंड की राजधानी रांची में स्थित स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि जीत की उम्मीद को केंद्र में रखते हुए ही पार्टियां उम्मीदवारों के नाम तय करती हैं. पार्टी की ओर से उम्मीदवारों की इस प्रतिद्वंदिता में जातिगत समीकरण हावी होते हैं. इस वजह से मुसलमान सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के नेता इसमें पिछड़ जाते हैं. वहीं, आबादी के लिहाज से राज्य की सीटों की संरचना ऐसी है कि किसी सीट पर मुसलमान मतदाताओ की संख्या निर्णायक नहीं है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक पाकुड़ में मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक 35.8 फीसदी है. वहीं, साहेबगंज में यह आंकड़ा 34.6 फीसदी है. ये दोनों जिले राजमहल संसदीय क्षेत्र के तहत आते हैं. लेकिन इस सीट को अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए सुरक्षित घोषित किया गया है.

रांची स्थित एनजीओ ऑल मुस्लिम यूथ एसोसिएशन (आम्या) के अध्यक्ष एस अली सत्याग्रह को बताते हैं, ‘हम लोगों ने लोकसभा चुनाव में मुसलमान नेताओं को टिकट देने को लेकर सभी प्रमुख पार्टियों को पत्र भी लिखा था. सभी ने हमारी मांग पर विचार करने का भरोसा दिया लेकिन आखिर में न कह दिया.’ इस पत्र में राज्य की पांच सीटों- गोड्डा, चतरा, धनबाद, गिरिडीह और जमशेदपुर में से किन्हीं दो पर मुसलमान प्रत्याशी उतारने की मांग की गई थी.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लिखा गया पत्र | साभार : आम्या
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लिखा गया पत्र | साभार : आम्या

एस अली कहते हैं, ‘मुसलमानों का वोट यूपीए (महागठबंधन) को जाता है. हम लोगों ने पार्टियों से कहा कि वोट मांगते हो लेकिन उम्मीदवार नहीं बनाते. ऐसा कैसे चलेगा?’ वे आगे कहते हैं, ‘दूसरा समुदाय मुसलमानों को वोट नहीं देता लेकिन, हमसे वोट मांगता है. जब राजमहल सीट पर चार लाख से अधिक मुसलमान आदिवासी को वोट कर रहा है तो गोड्डा में जो आदिवासी हैं, उनको तो (मुसलमानों के बारे में) सोचना पड़ेगा न?’

अली की इस दलील के साथ ऊपर दिए कुछ और तर्क-तथ्य जोड़े जा सकते हैं. इनसे यह काफी हद तक साफ हो जाता है कि झारखंड में करीब-करीब बिहार जितनी आबादी होने के बावजूद मुसलमान राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में हाशिये पर क्यों दिखते हैं.