फिल्मों को आसानी से अपने दर्शकों तक पहुंचाने के लिए नेटफ्लिक्स अलग-अलग मिजाज की फिल्मों को मुख्तलिफ श्रेणियों में बांट देता है. अपने एल्गोरिदम अनुसार वह इनमें नई फिल्मों को लगातार जोड़ता चलता है और जो पुरानी फिल्में पसंद की जा रही हैं उन्हें भी श्रेणीबद्ध कर नए दर्शकों की नजरों में बनाए रखता है.

‘पॉपुलर ऑन नेटफ्लिक्स’ ऐसी ही एक श्रेणी है जो वही करती है जो इसका नाम कह रहा है. दिलचस्प यह है कि इस श्रेणी में मौजूद तकरीबन 40 फिल्मों के बीच पिछले काफी वक्त से एक नाम लगातार अपनी जगह बनाए हुए है. कौन-सा? सुजॉय घोष जिस स्पेनिश फिल्म को लगभग सीन दर सीन रीमेक कर हिंदुस्तान में वाहवाही लूट रहे हैं, उस ‘बदला’ की गंगोत्री ‘द इनविजिबल गेस्ट’ (2016)!

होने को ‘द इनविजिलबल गेस्ट’ काफी वक्त से नेटफ्लिक्स पर मौजूद है और कई सुधी सिनेप्रेमी इसका लुत्फ पहले ही ले चुके हैं. लेकिन ‘बदला’ की रिलीज के बाद इसे नेटफ्लिक्स पर दोबारा काफी ज्यादा देखा जाने लगा है. ये शर्तिया ‘बदला’ से काफी बेहतर फिल्म है और यह बात आप हमारी समीक्षा से भी जान सकते हैं. हमने कुछ वक्त पहले विश्व-सिनेमा की धरोहर मानी जाने वाली ‘फॉरेस्ट गम्प’ पर लिखते वक्त कहा भी था कि कुछ ओरिजनल फिल्मों की ‘मौलिक शुद्धता और सुंदरता’ की बराबरी उनके रीमेक कतई नहीं कर सकते हैं. यही बात ‘द इनविजिबल गेस्ट’ के लिए भी कही जा सकती है.

दुनिया भर में तारीफें बटोर चुकी ‘द इनविजिबल गेस्ट’ (2016) को स्पेनी फिल्मकार ओरिओल पाउलो (Oriol Paulo) ने लिखा और निर्देशित किया था. यह उनकी दूसरी निर्देशित फिल्म थी और मजेदार बात है कि उनकी पहली निर्देशित फिल्म पर भी बॉलीवुड काफी पहले से निगाहें जमा चुका है! ‘द बॉडी’ (2012) नाम की यह फिल्म खासी उम्दा थ्रिलर-मिस्ट्री है जिसमें एक खूबसूरत लड़की की लाश शवघर से गायब हो जाती है और कई सारे अविश्वसनीय ट्विस्ट एंड टर्न्स के बाद सच्चाई सामने आती है. 2018 से ही खबरें आ रही हैं कि इमरान हाशमी और ऋषि कपूर को लेकर निर्देशक जीतू जोसफ (मलयालम भाषी ‘दृश्यम’ बनाने वाले) इसे हिंदी में रीमेक कर रहे हैं.

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कहने का मतलब है – मतलब कि इतनी लंबी भूमिका बांधने का मतलब है – कि इस कुशल स्पेनी निर्देशक की हर फिल्म पर बॉलीवुड गिद्ध नजरें गढ़ाए बैठा है! इससे पहले कि उनकी ताजातरीन बढ़िया फिल्म भी बाकी दो फिल्मों की तरह हमारे यहां रीमेक होकर अपनी मौलिक शुद्धता और सुंदरता खो दे, कृपा करके ‘मिराज’ देख लीजिए!

2018 में रिलीज हुई ‘मिराज’ इन दिनों भारतीय नेटफ्लिक्स पर मौजूद है. ‘द इनविजिबल गेस्ट’ से ओरिओल पाउलो की प्रतिभा को पहचान चुके चुनिंदा हिंदुस्तानी दर्शकों के चलते पिछले कई दिनों तक ये नेटफ्लिक्स की ‘ट्रेंडिंग नाउ’ श्रेणी का हिस्सा भी रह चुकी है. ये फिल्म एक साइंस-फिक्शन थ्रिलर है जो कि टाइम ट्रेवल का उपयोग कर एक हत्या की गुत्थी सुलझाती है. लेकिन 25 साल पहले की इस घटना को रोकने के चक्कर में नायिका का आज प्रभावित हो जाता है और उस आज को सही करने की जद्दोजहद भी रहस्य सुलझाने की तरह इस फिल्म का अहम हिस्सा बनती है. यह सब करने के लिए नायिका (अद्रियाना उगार्ते) के पास 72 घंटे होते हैं क्योंकि एक तूफान के सहारे ही 25 बरस पहले वाले उस समय से संपर्क साधा जा सकता है जब एक हत्या हुई थी और कुछ जिंदगियां हमेशा के लिए बदल गई थीं.

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अंग्रेजी में ‘मिराज’ नाम से पहचानी जाने वाली यह स्पेनी भाषी फिल्म - Durante La Tormenta - नेटफ्लिक्स पर स्पेनिश, इंग्लिश और हिंदी भाषा में दिखाई जा रही है और साथ ही इसके इंग्लिश सबटाइटल्स भी मौजूद हैं. जाहिर है कि नेटफ्लिक्स खुद भी प्रयास कर रहा है कि हिंदुस्तानी दर्शक अपनी पसंद की भाषा में भी विश्व-सिनेमा का लुत्फ ले सकें (हिंदी और अंग्रेजी) और इसके लिए वो खुद ही विदेशी फिल्मों को डब कर अपने हिंदुस्तानी मंच पर उपलब्ध करा रहा है. आजकल वैसे भी स्पेनिश सस्पेंस-थ्रिलर फिल्में दुनिया भर में बेहद पसंद की जा रही हैं और इसीलिए हॉलीवुड में रीमेक होने के साथ-साथ कई सारे हिंदुस्तानी ऑनलाइन मंचों पर ये दर्जन भर की संख्या में मौजूद मिलती हैं.

नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम जैसे ऑनलाइन मंच समझ चुके हैं कि हिंदुस्तान में मुख्यधारा की बुद्धिमान विदेशी फिल्मों का वृहद बाजार है, जिसे अब तक हिंदुस्तानी निर्देशक ही अनाधिकारिक-आधिकारिक रीमेक बना-बनाकर शोषित करते रहे हैं. इन ओटीटी (ओवर द टॉप) ऑनलाइन मंचों के चलते हिंदुस्तानी दर्शक अब मौलिक फिल्मों को उनकी मौलिक शुद्धता के साथ आराम से घर बैठे देख सकता है और जो फिल्में केवल अपने-अपने देशों में प्रसिद्ध रही हैं उन्हें भी वैश्विक स्तर का मंच आसानी से नसीब हो रहा है.

विश्व भर में कम पहचाने जाने वाले कुशल स्पेनिश फिल्मकार ओरिओल पाउलो का सिनेमा यथार्थवाद और तार्किकता की टेक लेकर कहानी नहीं कहता. अविश्वसनीय घटनाओं और साइंस-फिक्शन की मदद लेकर ऐसी सस्पेंस से लबरेज कहानियां पेश करता है जिनमें दर्शकों को कुछ लूपहोल्स नजर आने के बावजूद उन्हें नजरअंदाज करना होता है और तभी भरपूर मजा आता है. इस फिल्मकार का उद्देश्य हमेशा से थ्रिलर, मिस्ट्री, साइंस-फिक्शन जैसे ‘सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ’ वाले जॉनर्स का उपयोग कर मुख्यधारा का बेहद दर्शनीय सिनेमा रचना रहा है.

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इस फिल्मकार का सिनेमा केवल त्वरित तृप्ति देने वाला टाइमपास सिनेमा या पॉपकॉर्न एंटरटेनमेंट भर है. इसके उलट इसकी राइटिंग बेहद कसी हुई और बुद्धिमत्ता वाली होती है. अपनी अविश्वसनीय घटनाओं के इर्द-गिर्द ये गहन बातचीत आधारित मिस्ट्री रचता है और सारे खुले सिरे आखिर में आपको जुड़े मिलते जरूर हैं. अगर ‘द इनविजिबल गेस्ट’ या फिर ‘बदला’ जैसी गहन और उलझी बातचीत आधारित फिल्में आपने देखी हैं तो आप समझ सकते हैं कि हम क्या कहना चाह रहे हैं. कोई किरदार पाउलो की कहानी में बेवजह नहीं होता और जो दिख रहा होता है वह आगे चलकर वैसा नहीं होता.

वहीं, हमारा हिंदी सिनेमा थ्रिलर-मिस्ट्री फिल्मों में आखिर तक रहस्य छिपाए रखने में अक्सर असफल साबित होता है क्योंकि वह मुख्य कर्ताधर्ता को लार्जर देन लाइफ व्यक्तित्व दे देता है. ‘बदला’ के अमिताभ बच्चन को ही याद कर लीजिए. ‘द इनविजिबल गेस्ट’ में यह किरदार एक सामान्य-सी दिखने वाली महिला ने निभाया था जिसे आप आखिर तक नजरअंदाज ही करते चलते हैं. लेकिन बच्चन के वृहद व्यक्तित्व के चलते ‘बदला’ में वक्त से पहले ही उनका ‘मोटिव’ सामने आ जाता है. पाउलो की ओरिजनल फिल्मों में ‘सामने होकर भी नजर न आने’ वाला मोटिव आपको लगातार मिलता है और यही उनके सिनेमा को दिलचस्प और घोर दर्शनीय बनाता है. ऐसी मुश्किल पटकथाएं बार-बार लिखने के बावजूद वे ऊलजलूल सिनेमाई लिबर्टी भी नहीं लेते और जो-जितनी लेते हैं उन्हें दर्शकों के लिए विश्वसनीय बना देते हैं.

पाउलो की नवीनतम फिल्म ‘मिराज’ के बारे में ज्यादा कुछ तो बताया नहीं जा सकता, नहीं तो देखने का मजा खराब हो जाएगा. बस यह बताते चलें कि साइंस फिक्शन जॉनर में जिस ‘बटरफ्लाई इफेक्ट’ का उपयोग अक्सर फिल्में करती रही हैं उसे ही ‘मिराज’ ने भी अपनी कहानी में शामिल किया है. टाइम ट्रेवल फिल्मों की यह एक पसंदीदा थ्योरी भी है कि अगर टाइम ट्रेवल के दौरान भूतकाल/भविष्य में कोई छोटा-सा भी बदलाव हो जाता है – जैसे किसी तितली का मर जाना – तो उसका विशाल (व अक्सर भयावह) असर भविष्य/भूतकाल पर पड़ता है.

हॉलीवुड इस थीम पर कई कमर्शियल फिल्में बना चुका है. शायद पहली बार इस इफेक्ट को पॉप कल्चर का हिस्सा एस्टन कोचर की कमर्शियल मसाला फिल्म ‘द बटरफ्लाई इफेक्ट’ (2004) ने बनाया था. लेकिन निकट के समय में इस थ्योरी की नयी, दिलचस्प व उलझी हुई विवेचना ‘प्रीडेस्टिनेशन’ (2014) जैसी दिमाग की खपच्चियां उड़ा देने वाली बेहद उम्दा फिल्म से लेकर नेटफ्लिक्स की अलहदा जर्मन वेब सीरीज ‘डार्क’ (2017) तक में देखने को मिलती है. ‘मिराज’ इस तरह के सिनेमा जितनी माइंड-बॉग्लिंग तो नहीं है, लेकिन इस थीम का सुघड़ उपयोग करने में बेहद सफल रहती है. दो घंटे तक उलझते चले जाने के बाद जब फिल्म खुद को सुलझाकर खत्म होती है तो आपके दिमाग की खासी कसरत हो चुकी होती है!

इन दो घंटों के दौरान आप फिल्म से नजर भी नहीं हटा सकेंगे क्योंकि जब भी ऐसा करेंगे कुछ न कुछ जरूरी देखना छूट चुका होगा. फिर बहुत आगे चलकर यह किसी अहम सीन का जरूरी हिस्सा बनेगा और तब आपको समझ आएगा कि सीधे-सीधे चलने की जगह नॉन-लीनियर तरीके से कहानी कहने वाली फिल्म में बारीक लिखाई क्या चीज होती है. ‘द इनविजिबल गेस्ट’ की तरह ‘मिराज’ की भी सबसे बड़ी खासियत इसकी उस्ताद लिखाई ही है.

वक्त मिलते ही ‘मिराज’ को नेटफ्लिक्स पर देख लीजिए. इससे पहले कि कोई हिंदुस्तानी निर्देशक इस फिल्म को भी रीमेक कर आपसे बदला ले ले, आप अपनी तकदीर बदल लीजिए! बटरफ्लाई इफेक्ट का उपयोग निजी जीवन में कीजिए और आज ओरिजनल देखकर भविष्य में सस्ता रीमेक देखने से बच लीजिए!

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