इस चुनावी मौसम में आंध्र प्रदेश से तीन नाम पूरे देश में सुर्ख़ियां बटोर रहे हैं. पहले- सत्ताधारी टीडीपी (तेलुगु देशम पार्टी) के अध्यक्ष और राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू. दूसरे- प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्‌डी. और तीसरे- अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण. इनमें से पवन कल्याण के बारे में तो तमाम विराेधाभासी बातें सामने आ रही हैं. कुछ आरोपों और आकलनों की सूरत में. उदाहरण के तौर पर उनके बारे में आकलन ये है कि वे चुनाव बाद ‘किंगमेकर’ हो सकते हैं. मतलब अगर किसी दल को सरकार बनाने लायक बहुमत न मिला तो पवन कल्याण अपनी शर्तों पर उसे टेक लगा सकते हैं.

वहीं उन पर आरोप ये है कि वे जगन मोहन रेड्‌डी के साथ मिलकर चंद्रबाबू नायडू को कमज़ोर करना चाहते हैं. यह आरोप ख़ुद नायडू ने ही लगाया है. नायडू के मुताबिक उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र में भारतीय जनता पार्टी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी शामिल है. जबकि पवन कल्याण पर इसका विरोधाभासी आरोप यह भी है कि वे चंद्रबाबू नायडू से मिले हुए हैं. उन्हें फ़ायदा पहुंचाने के लिए प्रदेश में चुनावी लड़ाई को तिकोना बना रहे हैं. ताकि विपक्ष के वोट बंटें और चंद्रबाबू लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनें. यह आरोप जगन मोहन ने लगाया है.

और इस सबके बीच पवन कल्याण ख़ुद को ‘किंगमेकर’ के बज़ाय ‘किंग’ मानते हैं. वे दावा करते हैं कि राज्य में अगली सरकार उनकी होगी. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर आंध्र की राजनीति के इस दिलचस्प क़िरदार से जुड़े कुछ सवाल हो सकते हैं. मसलन- पवन कल्याण के अतीत और वर्तमान में ऐसा क्या-कुछ रहा है जो वे प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं के आरोपों और राजनीति के जानकारों के आकलनों के केंद्र में आ गए? और यह भी कि पवन कल्याण की भविष्य की भूमिका कैसी हो सकती है? इन सवालों के ज़वाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

अतीत, जो तमाम गलियारों से गुजर चुका है

पवन कल्याण उस वक़्त राजनीति में आए जब उनके बड़े भाई और तेलुगु फिल्म जगत के एक अन्य सितारा चिरंजीवी ने प्रजा राज्यम पार्टी (पीआरपी) का गठन किया. यह 2009 की बात है. तब अविभाजित आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान पवन कल्याण ने पीआरपी के लिए धुआंधार प्रचार किया था. हालांकि पीआरपी तब 294 सदस्यों वाली आंध्र प्रदेश विधानसभा में महज़ 18 सीटें ही जीत सकी. यही नहीं, चुनाव के बाद चिरंजीवी पहले तो धीरे-धीरे कांग्रेस के नज़दीक आए. फिर उन्होंने 2011 में पीआरपी का कांग्रेस में विलय ही कर दिया और केंद्र में मंत्री बन गए. इस घटनाक्रम से कुछ समय के लिए पवन कल्याण सियासी सुर्ख़ियों से बाहर हो गए. लेकिन जल्द ही उन्होंने वापसी की.

पवन कल्याण ने 2014 में अपनी नई पार्टी- जन सेना बनाई लेकिन चुनाव में नहीं उतरे. उस वक़्त उन्हाेंने टीडीपी-भाजपा गठबंधन का समर्थन किया. उनके पक्ष में प्रचार किया. इससे इस गठबंधन को मदद मिली और टीडीपी-भाजपा प्रदेश के साथ देश की सत्ता में भी साझीदार हुईं. पर पवन कल्याण की इन पार्टियों के साथ साझीदारी लंबी नहीं चली. जल्द ही उन्होंने अपना रास्ता अलग कर लिया. पदयात्रा और आंदोलन की राह चुनी. जाहिर तौर पर इनमें निशाने पर केंद्र और राज्य की सरकारें ही रहीं यानी दूसरे अर्थों में भाजपा और टीडीपी. इसी बीच 2018 में चंद्रबाबू नायडू ने जब भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का साथ छोड़ा और आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने का मुद्दा गरम किया तो पवन कल्याण ने उनके विरोधी जगन मोहन रेड्‌डी को समर्थन देने की बात भी कही, लेकिन कुछ शर्तों के साथ.

यानी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष या सांकेतिक तौर पर ही सही पवन कल्याण कांग्रेस, भाजपा, टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस जैसी सभी पार्टियों को छूते हुए, उनके सियासी गलियाराें से गुजरते हुए वर्तमान तक पहुंचे हैं.

वर्तमान, जो अलग तैयारी के संकेत देता है

पवन कल्याण की राजनीति के आज की बात करें तो वे इस बार राज्य में बहुजन समाज पार्टी और वामपंथी दलाें के साथ गठबंधन करके पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं. इस तरह उन्होंने दूसरे दलों और उनके ख़ास समर्थक वर्ग का समर्थन भी अपने लिए सुनिश्चित किया है. वे ख़ुद आंध्र प्रदेश के ताक़तवर कापू समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं. राज्य में इस समुदाय की आबादी लगभग 20 फ़ीसदी बताई जाती है. यही नहीं पवन कल्याण के बारे में कहा जा रहा है कि वे बीते तीन दशक में कापू समुदाय के दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता हैं. उनसे पहले वंगवीति मोहन रेड्‌डी इस समुदाय के असरदार नेता हुआ करते थे, जिनकी 1988 में हत्या कर दी गई थी.

पवन कल्याण ने चुनावी राजनीति में कुछ अलग प्रयोग भी किए हैं. मसलन- उन्होंने अपनी पार्टी के लोक सभा और विधानसभा चुनावों के उम्मीदवाराें का चयन बाक़ायदा एक लिखित परीक्षा लेकर किया. इसके लिए बिल्कुल आम लोगों से आवेदन पत्र मांगे गए. परीक्षा पुस्तिकाएं एक छानबीन समिति ने जांचीं. फिर इस समिति ने उत्तीर्ण उम्मीदवाराें को टिकट देने की पार्टी नेतृत्व से सिफ़ारिश की. इसके बाद जिन्हें टिकट मिले उनमें कोई खेतिहर मज़दूर का बेटा है तो कोई बस कंडक्टर का. पूर्व सरकारी कर्मचारी-अफ़सर भी इस सूची में हैं. पूरे राज्य के साथ ही विधानसभा क्षेत्रों के लिए अलग घोषणा पत्र जारी करना भी एक अलहदा रणनीति है, जो लोगों को उनकी तरफ़ खींच रही है.

पवन कल्याण ने टिकट देते समय युवाओं को ख़ास तरज़ीह दी है और नए चेहरे तो बहुतायत हैं. लगभग 136 के क़रीब. इनमें 60-70 प्रत्याशी 45 साल से कम उम्र के बताए जाते हैं. अपने समुदाय का भी भरपूर ख़्याल रखा है उन्हाेंने. कापू समुदाय से 16 टिकट बांटे गए हैं. यानी पवन कल्याण एक परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार करते दिख रहे हैं. परंपरागत के साथ ही नए ज़माने की सियासत कर रहे हैं.

भविष्य, जिसे अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं कह सकते

हालांकि अतीत और वर्तमान की कड़ियां जोड़ लें तो पवन कल्याण की भविष्य की राह की काेई स्पष्ट तस्वीर नहीं दिखती. इसीलिए आकलनों-अनुमानों की मदद लेनी पड़ती है, जो बताते हैं कि उनकी भूमिका उस वक़्त बेहद अहम होने वाली है जब टीडीपी या वाईएसआर कांग्रेस में से किसी को बहुमत न मिले. वैसे तो वाईएसआर कांग्रेस के बारे में कहा जा रहा है कि वह राज्य की कुल 175 में से 90 तक सीटें जीत सकती है. ऐसा हुआ तो ज़ाहिर तौर पर पवन कल्याण को अगले पांच साल इंतज़ार करना हाेगा. लेकिन अगर दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच आंकड़ा 80-80 पर सिमट गया. या मामला इसी तरह के किसी अन्य नज़दीकी आंकड़े पर सिमटा तो पवन कल्याण अहम हो जाएंगे.

पवन कल्याण के एक क़रीबी नेता की मानें तो ‘हमने 60-70 अच्छे लोगों को टिकट दिए हैं. इनमें से 30-32 की जीत का तो पवन कल्याण को भी भरोसा है. अगर वे सभी जीत गए ताे पवन कल्याण ‘किंगमेकर’ (सरकार जिसके दम पर टिकी हो) हो सकते हैं या शायद ‘किंग’ (मुख्यमंत्री) भी हो सकते हैं.’ इस दावे के साथ दो चीजें और ध्यान रखी जा सकती हैं. पहली- पवन कल्याण बीते एक महीने से खुलकर राज्य का मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा का इज़हार कर रहे हैं. उनका दावा भी है कि राज्य में अगली सरकार उनकी ही होगी.

दूसरी बात ये कि दक्षिण के ही राज्य कर्नाटक में अभी जो गठबंधन सरकार चल रही है उसका नेतृत्व करने वाली पार्टी- जेडीएस (जनता दल- सेकुलर) ने बीते साल हुए विधानसभा चुनाव में महज़ 37 ही सीटें जीती थीं और यह पार्टी तीसरे नंबर पर रही थी. कांग्रेस ने तब उससे दोगुनी सीटें जीती थीं लेकिन सरकार में नंबर-दो की हैसियत से साझीदार है. वहीं भाजपा ने सबसे ज़्यादा 104 सीटें जीती थीं मगर वह विपक्ष में बैठी है. शायद इसीलिए कहा जाता है कि सियासत में सब कुछ हाे सकता है.