एक आम धारणा है कि मोटापे से ग्रस्त लोग मधुमेह का शिकार ज्यादा होते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत में देखा गया है कि मधुमेह के 20 से 30 प्रतिशत मरीज मोटे नहीं होते, ब्लकि इनमें अत्यधिक दुबले-पतले लोग भी शामिल रहते हैं. इसकी वजह जानने के लिए पिछले दिनों भारतीय वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन किया. अध्ययन से पता चला है कि सामान्य वजन वाले दुबले-पतले लोग अधिकांशता टाइप-2 मधुमेह का शिकार होते हैं.

टाइप-2 डायबिटीज इंसुलिन के प्रतिरोध से होता है. शरीर में ग्लूकोज को रक्त प्रवाह से हटाकर कोशिकाओं में स्थापित करने के लिए इंसुलिन हार्मोन संकेत भेजता है. शरीर में मौजूद मांसपेशियां, फैट एवं यकृत जब इन संकेतों के खिलाफ प्रतिरोधी प्रतिक्रिया देते हैं तो इंसुलिन प्रतिरोध की स्थिति पैदा होती है. इंसुलिन प्रतिरोध से ही मधुमेह होता है, जिसे डॉक्टरी भाषा में टाइप-2 डायबिटीज मेलेटस (डीएम) या फिर टी2डीएम भी कहते हैं.

इंडिया साइंस वायर के मुताबिक हालिया अध्ययन में 87 मधुमेह रोगियों (67 पुरुष और 20 महिलाओं) के इंसुलिन के साथ-साथ सी-पेप्टाइड के स्तर को भी मापा गया. अग्नाशय में इंसुलिन का निर्माण करने वाली बीटा कोशिकाएं सी-पेप्टाइड छोड़ती हैं. हालांकि, सी-पेप्टाइड शरीर में शुगर यानी शर्करा की मात्रा को प्रभावित नहीं करता है, लेकिन शोधकर्ताओं ने यह जानने के लिए इसके स्तर को मापा कि शरीर कितनी इंसुलिन का निर्माण कर रहा है.

शोधकर्ताओं की टीम | फोटो : इंडिया साइंस वायर
शोधकर्ताओं की टीम | फोटो : इंडिया साइंस वायर

इस अध्ययन के नतीजों में सामने आया कि मधुमेह के पतले-दुबले मरीजों के शरीर में वसा के जमाव, पेट की चर्बी और फैटी लिवर का स्तर बहुत ज्यादा था, जो आमतौर पर बाहर से दिखाई नहीं देते हैं. मधुमेह रोगियों के शरीर और आंत में उच्च वसा के स्तर के साथ-साथ इंसुलिन और सी-पेप्टाइड का स्तर भी अधिक पाया गया है. जबकि, मांसपेशियों का द्रव्यमान बेहद कम था.

शोधकर्ताओं के अनुसार इससे साफ है कि लोगों के लिवर और अग्नाशय में छिपी वसा कम उम्र और कम बजन होने पर भी इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ावा देकर मधुमेह को दावत दे सकती है. हालांकि इनका यह भी कहना है कि इंसुलिन सक्रियता बढ़ाने वाली दवाओं के उपयोग और वजन कम करने के तौर-तरीके अपनाने से ऐसे मरीजों को फायदा हो सकता है.

इस अध्ययन का नेतृत्व कर रहे फॉर्टिस-सीडॉक के चेयरमैन डॉ अनूप मिश्रा ने इंडिया साइंस वायर को बताया, ‘पतले-दुबले मरीजों में आमतौर पर सामान्य वजन के बावजूद शरीर के अंदर उच्च शारीरिक वसा पाई गयी. जबकि, उनकी मांसपेशियों का द्रव्यमान कम था. ऐसे लोगों का मोटापा बाहर से देखने पर भले ही पता न चले, लेकिन चयापचय से जुड़े महत्वपूर्ण अंगों, जैसे- अग्नाशय और लिवर में वसा जमी थी.’ डॉ अनूप मिश्रा के मुताबिक ऐसे में होता यह है कि इंसुलिन हार्मोन अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पाता जिससे शरीर में ब्लड शुगर यानी रक्त शर्करा का स्तर बढ़ने लगता है.

इस शोध में डॉ अनूप मिश्रा के अलावा शाजित अनूप, सूर्य प्रकाश भट्ट, सीमा गुलाटी और हर्ष महाजन शामिल थे. हाल में इस अध्ययन के नतीजे शोध पत्रिका ‘डायबिटीज ऐंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम : रिसर्च ऐंड रिव्यूज’ में प्रकाशित हुए हैं.