निर्देशक : तिग्मांशु धूलिया, विशाल फूरिया

लेखक : श्रीधर राघवन (एडॉप्टिड स्क्रीनप्ले)

कलाकार : विक्रांत मैसी, पंकज त्रिपाठी, जैकी श्रॉफ, अनुप्रिया गोयनका, पंकज सारस्वत, दिब्येंदु भट्टाचार्य, मीता वशिष्ट, मधुरिमा रॉय, रुचा ईनामदार, राज गोपाल अय्यर, जगत रावत

रेटिंग : 2.5/5

(समीक्षा में कुछ छोटे-मोटे स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

2019 की ‘क्रिमिनल जस्टिस’ इसी नाम की 2008 में आई एक ब्रिटिश टीवी सीरीज का आधिकारिक रीमेक है. इसका निर्माण बीबीसी ने किया था और इसके पहले और दूसरे सीजन (2009) ने केवल पांच-पांच एपीसोड में अपनी कथा कही थी. दोनों सीजन मुख्तलिफ अपराध-कथाओं का चित्रण करते थे और हॉटस्टार पर हाल ही में रिलीज हुई इस सीरीज के हिंदुस्तानी संस्करण में इसके पहले सीजन की ही कहानी दिखाई गई है.

इस चर्चित और पुरस्कृत टीवी सीरीज के पहले सीजन का एक अमेरिकी रीमेक भी 2016 में बना था. नाम था - ‘द नाइट ऑफ’. एचबीओ पर प्रसारित हुई आठ एपीसोड की यह मिनीसीरीज बेहद प्रशंसित होने के साथ-साथ दुनियाभर में खासी मशहूर भी हुई थी. अपने रोल के लिए बेस्ट एक्टर का ऐमी अवॉर्ड जीतने वाले रिज अहमद और जॉन टूर्टोरो (John Turturro) की बेमिसाल अदाकारी के अलावा कहानी के अलहदा ट्रीटमेंट के चलते इसने ठसाठस भरे अमेरिकी टीवी/वेब स्पेस में एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की थी.

दस एपीसोड की हिंदुस्तानी वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस’ कहने को तो ब्रिटिश सीरीज पर आधिकारिक रूप से आधारित है, लेकिन ये समय-समय पर मन मुताबिक दोनों ही मशहूर सीरीज से कुछ न कुछ लेती रहती है और ‘द नाइट ऑफ’ की ज्यादा मुरीद नजर आती है. इसका एडॉप्टिड स्क्रीनप्ले श्रीधर राघवन ने लिखा है और हाल के समय में विदेशी फिल्मों की धड़ाधड़ सीन दर सीन नकल करने वाला हिंदी सिनेमा देखने के बाद (‘बदला’, ‘नोटबुक’) इस सीरीज में एक विदेशी अपराध-कथा को हिंदुस्तानी परिवेश के अनुसार ‘एडॉप्ट’ करने की राघवन की कोशिश काबिलेतारीफ मालूम होती है.

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मूल कहानी के ही अनुसार हिंदुस्तानी संस्करण में भी एक जवान लड़के पर उस अजनबी लड़की का रेप और मर्डर करने का आरोप है जिसे उसने पिछली रात टैक्सी में घर छोड़ा था और दोनों ने रात साथ बिताई थी. जवान लड़के आदित्य शर्मा (विक्रांत मैसी) को पहली नजर में गुनहगार माना जाता है और पुलिस, अदालत व जेल ही उसकी जिंदगी का अभिन्न अंग बन जाते हैं.

ब्रिटिश और अमेरिकी सीरीज ने जहां उन देशों के ‘क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ से दो-चार होने को मजबूर एक नौजवान की कहानी कही थी, और उस सिस्टम से जूझते वक्त उस नौजवान में आ रहे बदलावों का सूक्ष्मतम चित्रण किया था, वहीं हिंदुस्तानी वेब सीरीज उसी कहानी को ज्यादा खुरदरे माने जाने वाले भारतीय क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के परिप्रेक्ष्य में कहने की कोशिश करती है.

यही इस रीमेक को बनाने का मकसद भी रहा होगा कि आखिर हिंदुस्तान का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम कैसे काम करता है? जो शख्स खुद को निर्दोष बता रहा है वह निर्दोष है भी या झूठ बोल रहा है? क्या इस सिस्टम में वह पारदर्शिता मौजूद है जो खुद को निर्दोष मानने वाले एक लड़के को तटस्थ होकर न्याय दिला सकती है? और क्या इस सिस्टम में काम करने वाली पुलिस और कानून की जोड़ी अपने पूर्वाग्रहों और निजी मोटिव को किनारे रख निष्पक्ष जांच कर सकती है?

ब्रिलियंट अमेरिकी टीवी सीरीज ‘द नाइट ऑफ’ ने इस तरह के कई ज्वलंत सवाल उठाकर हिला देने वाली एक बेमिसाल कहानी कही थी. हिंदुस्तानी सीरीज के साथ दिक्कत यह है कि वो उसी बेमिसाल कथा को बेहद फिल्मी बनाकर प्रस्तुत करती है. यह फिल्मी होना भी बॉलीवुड के जन्मजात गुण (अवगुण?) नाटकीयता की टेक लेकर हासिल किया जाता है और हमारे जस्टिस सिस्टम की असलियत को प्रोसीजरल जॉनर की खासियतों की टेक लेकर नहीं दिखाया जाता. हिंदुस्तानी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के नाम पर हमें जो दस एपीसोड की इस बेवजह लंबी सीरीज में देखने को मिलता है वह दसियों बार हम जेल-ड्रामा दिखाने वाली हिंदी फिल्मों में देख चुके हैं. जिन मानवीय भावनाओं से बेकसूर नायकों के मां-बाप-बहन-जीजा हजारों बार हिंदी फिल्मों में गुजर चुके हैं, उन्हीं से हमें एक बार फिर यहां गुजरना पड़ता है और बार-बार गुजरना पड़ता है. कथा में नयापन होने के बावजूद ‘डिटेल्स’ में भी बॉलीवुड से जुड़े पुराने-बासी क्लीशे ही भरे मिलते हैं.

अगर आपने ‘द नाइट ऑफ’ देखी है तो आपको आसानी से हिंदुस्तानी ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में ढेर सारी कमियां नजर आ ही जाएंगी. नहीं देखी तो जान लीजिए कि हॉटस्टार की इस वेब सीरीज को इसमें मौजूद अभिनेताओं के उच्च के अभिनय के लिए जरूर देखा जाना चाहिए. लेकिन अगर सिस्टम में फंसे नायक की उम्दा कैरेक्टर-स्टडी देखनी है, बेवजह के फिल्मी क्लीशे से खुद को दूर रखना है, साधारण-सी नजर आ रही अपराध-कथा के अंदर मौजूद जस्टिस सिस्टम की चुभती असफलताओं से रूबरू होना है, जो कि आरोपित से लेकर उसके परिवार की जिंदगी तक दोजख कर देती हैं और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हर नजर में आरोपी को गुनहगार बना देती हैं, तो फिर पहले ‘द नाइट ऑफ’ देखिए. ये उसी हॉटस्टार नामक मंच पर मौजूद है जहां कि हिंदी में बनी ‘क्रिमिनल जस्टिस’ हाल ही में रिलीज हुई है!

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हिंदुस्तानी ‘क्रिमिनल जस्टिस’ की एक बड़ी कमी यह भी है कि वह जेल-ड्रामा के अलावा मर्डर-मिस्ट्री वाले अपने प्लॉट पर भी जरूरत से ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है. लड़की का खून आखिर किसने किया? लड़के ने नहीं किया तो किसने किया? इस ‘किस’ की तलाश के लिए यह सीरीज बेहद लंबा वक्त ले लेती है और यह रहस्य जल्द ही प्रिडिक्टिबल तो हो ही जाता है लेकिन साथ ही सबसे ज्यादा निराशाजनक बात यह लगती है कि सीरीज अपनी ओरिजनल अपराध-कथा का सार भी ठीक से नहीं पकड़ पाती.

तिग्मांशु धूलिया और विशाल फूरिया निर्देशित सीरीज शुरू से लेकर आखिर तक अपने मुख्य किरदार (विक्रांत मैसी) को निर्दोष की तरह पेश करती है. जबकि ‘द नाइट ऑफ’ की सबसे बड़ी विशेषता ही यही थी कि उसका मुख्य किरदार विक्रांत मैसी की तरह मासूम होने के बावजूद न सिर्फ क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए गुनहगार था बल्कि उसके बदलते व्यवहार की वजह से दर्शकों के लिए भी आखिर तक तय कर पाना मुश्किल था कि वह सच में निर्दोष है या अपनी असलियत छिपा रहा है. उस सीरीज ने बखूबी दर्शकों के दिमाग के साथ खेला था और इसके पीछे इस अमेरिकी सीरीज के रचयिताओं की मंशा यह बताने की थी कि अपने-अपने पूर्वाग्रहों के चलते हम सभी अभियुक्त को पहले से ही दोषी मान लेते हैं. हिंदुस्तानी संस्करण इस सबसे महत्वपूर्ण सार को मिस कर देता है और शुरू से लेकर अंत तक आदित्य शर्मा को मासूम व निर्दोष बताकर इस किरदार और एक उम्दा कथा को घोर प्रिडिक्टबल बना देता है.

अपने शिल्प में कमजोर दस एपीसोड की यह सीरीज बेवजह लंबी भी है. कोई हिम्मती एडीटर होता तो कई सीन एडीटिंग टेबल पर मृतप्राय पाए जाते. ब्रिटिश सीरीज ने यही कथा जहां पांच एपीसोड में कही थी वहीं अमेरिकी ‘द नाइट ऑफ’ ने आठ में. ये आठ भी ज्यादा नहीं मालूम हुए थे क्योंकि धीमी गति से कही गई उस अपराध-कथा में हर प्रमुख किरदार को बेहद शानदार अंदाज में उभारा गया था और उनके आंतरिक संघर्षों के अलावा उनके मोटिव को भी गहराई दी गई थी.

उदाहरण के लिए उस पुलिस अफसर का ही किरदार ले लीजिए जिसे हिंदुस्तानी संस्करण में पंकज सारस्वत (इंस्पेक्टर रघु) ने बढ़िया अंदाज में अभिनीत तो किया है, लेकिन ‘द नाइट ऑफ’ के किरदार की तरह वह ईमानदार होने के बावजूद लेयर्ड कैरेक्टर नहीं है. सीधा-सपाट बॉलीवुड फिल्मों से निकला पुलिस इंस्पेक्टर है जो कि अमेरिकी सीरीज जितनी गहराई और मोटिव नहीं रखता.

जटिल मुख्य किरदारों का सरलीकरण करने के अलावा हिंदुस्तानी सीरीज कई नए किरदारों को भी बेवजह जन्म देती है और एक कसी हुई कहानी को बेहद फैला देती है. मौलिक कहानी की तरह मुख्य किरदार (विक्रांत मैसी) के केवल मां-बाप सिस्टम का शिकार नहीं होते, बल्कि उसकी बहन और जीजा तक शामिल हो जाते हैं. उनके सब-प्लॉट अलग चलते हैं, और जेल के कई किरदारों के अलग, जो कि बेमतलब बेहद लंबे रचे गए हैं. मीडिया पर कटाक्ष करने की खुजली अलग मिटाई जाती है और बेमतलब ही कानून के महिलाओं के पक्ष में ज्यादा झुका होने की गैरजरूरी बातें की जाती हैं.

ब्रिटिश ‘क्रिमिनल जस्टिस’ और अमेरिकी ‘द नाइट ऑफ’ मुख्य रूप से एक सिस्टम और उसमें फंसे एक किरदार की कहानी थी और दोनों ही सीरीज ने कई सारे सब-प्लॉट्स उपयोग करने के बावजूद कभी अपना फोकस नहीं खोया था. इसलिए भी हम अमेरिकी सीरीज में सिस्टम के सताए पात्र को अभिनीत करने वाले रिज अहमद का चेहरा और उनकी आंखें आज भी नहीं भूल पाते और मासूम लड़के से पहले आरोपित और फिर कैदी बन जाने के दौरान उनमें आए बदलावों को दोबारा-तिबारा देखने के बावजूद सिहर उठते हैं. हिंदुस्तानी संस्करण में कई सारे किरदारों और दस एपीसोड तक खींची गई कहानी यह फोकस अनेकों बार खो देती है. सीरीज कभी भी वह महत्वपूर्ण बात तीखे अंदाज में नहीं कह पाती जिनके चलते पिछली दोनों सीरीज मशहूर हुई थीं.

आदित्य शर्मा नाम के मुख्य किरदार में विक्रांत मैसी खासे प्रभावित करते हैं. जेल के शुरुआती दिनों के दौरान डर को चेहरा देते वक्त कमाल करते हैं और जब कोर्ट में देर तक अपनी आपबीती पहली बार सुनाते हैं तो अद्भुत के स्तर का अभिनय करते हैं. उनके चेहरे की मासूमियत किरदार पर फबती है और पीड़ा को चेहरा देने में तो वे खासे उस्ताद हो चले हैं.

लेकिन चूंकि कई दर्शकों के पास ‘द नाइट ऑफ’ में आलातरीन अभिनय करने वाले रिज अहमद का ‘विजुअल रेफरेंस’ पहले से मौजूद होगा, इसलिए वे समझ पाएंगे कि रिज अहमद के स्तर का अभिनय विक्रांत मैसी नहीं करते हैं. इसमें लेखक और निर्देशकों की भी गलती है क्योंकि उन्होंने मैसी को वह कैरेक्टर-ग्राफ दिया ही नहीं जो रिज के पास मौजूद था. उनके किरदार को कई बार बेहद फिल्मी और नाटकीय बना दिया गया और ऐसे किरदार फिर कितने भी सक्षम अदाकारों के पास पहुंच जाएं, कम ही असर छोड़ते हैं.

फिर अमेरिकी सीरीज का मुख्य किरदार – यह बार-बार हम अमेरिकी और ब्रिटिश सीरीज से तुलना इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि जब कोई सिनेमा मौलिक नहीं होता तो उसकी तुलना मौलिक सिनेमा से हरदम होती ही है – अपने व्यक्तित्व से मेल नहीं खाने वाले शारीरिक बदलाव से भी गुजरता है और शरीर की यह कठोरता भी सिस्टम के दमन का चेहरा बनती है. लेकिन मैसी के किरदार को ऐसे ‘ट्रॉन्सफॉर्मेंशन’ से गुजरता दिखाने की जगह बॉलीवुड के नाटकीय तौर-तरीकों की मदद ली जाती है जो बेअसर और कई बार हास्यास्पद दृश्य हमारी नजर करते हैं.

अमेरिकी सीरीज के किरदार की पहचान एक प्रवासी मुस्लिम परिवार में जन्मे अमेरिकी मुस्लिम की भी थी जिसको कि सीरीज ने अमेरिकी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम और समाज में मौजूद पूर्वाग्रहों से जोड़ा था. यह गहराई हिंदुस्तानी संस्करण से नदारद मिलती है क्योंकि यहां नायक ब्राह्मण है और उसके व उसके परिवार के सारे मसाइल आर्थिक हैं.

आखिर तक सर खुजलाने के बावजूद हमें इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि ‘द नाइट ऑफ’ से बेतहाशा प्रभावित होने के बावजूद आखिर क्यों हिंदुस्तानी सीरीज के लेखक व निर्देशकों ने अपने नायक को उस नायक की तरह यह मुस्लिम आइडेंटिटी नहीं दी? जबकि आज के सांप्रदायिक माहौल में एक मुस्लिम नायक को लेकर पूर्वाग्रह पालने वाले सिस्टम से जुड़ी अपराध-कथा कहना सीरीज की आयातित कहानी को बेहद कंटेम्पररी, देसी और धारदार बना सकता था.

जेल में आदित्य शर्मा को सहारा देने वाले मुस्लिम कैदी की भूमिका जैकी श्रॉफ ने निभाई है और लंबे अरसे बाद जैकी दादा को बारीक लिखे हुए लंबे रोल में देखकर अथाह आनंद आता है! पंकज त्रिपाठी के साथ उनका ही अभिनय इस सीरीज में सर्वश्रेष्ठ है और इन दोनों ही अभिनेताओं के लिए आप आखिर तक सीरीज देख जाएंगे. गुंडे-बदमाश की भूमिकाएं तो जैकी श्रॉफ के खून में जैसे रची-बसी रही हैं, बस जरूरत होती है कि कोई उनके किरदार को तमीजदार विस्तार दे और ओवरएक्टिंग की उनकी आदत को नियंत्रण में रखे. हिंदुस्तानी ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में यह सब होता है और जैकी दादा अपनी बंबईया ‘बिडू’ बोली में चेहरे के दिलचस्प एक्सप्रेशन्स और हाथ-उंगलियों की दिलचस्प हरकतों से दिल जीत लेते हैं! उन्हें लाख सलाम!

पंकज त्रिपाठी कम औकात वाले एक जिंदादिल वकील माधव मिश्रा की भूमिका में हैं जिन्हें पुलिस महकमे से लेकर कानूनी पेशे वाले तक आदित्य शर्मा केस के लिए सही वकील नहीं मानते. उन्हें एक चर्म रोग भी है जिसकी वजह से वे बार-बार अपने पैर खुजलाते रहते हैं और बार-बार ही आदित्य की मदद को आगे आते हैं. अमेरिकी सीरीज में यह बेहद दिलचस्प किरदार जॉन टूर्टोरो ने अभिनीत किया था और जब आप यह समीक्षा पढ़ने के बाद ‘द नाइट ऑफ’ देखने के लिए मजबूर हो चुके होंगे तो उसमें उनका अभिनय देखकर हमारी ही तरह मानने लगेंगे कि उनसे बेहतर यह रोल कोई कर ही नहीं सकता!

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हमारे इस ‘पूर्वाग्रह’ के चलते हिंदुस्तानी ‘क्रिमिनल जस्टिस’ के शुरुआती एक-दो एपीसोड में पंकज त्रिपाठी का असर हम पर कम रहा. जॉन टूर्टोरो की नायाब अदाकारी दिमाग पर छाई रही और यह भी एक वजह रही कि उनका कैरेक्टर-ग्राफ पंकज त्रिपाठी को मिले किरदार से बहुत ज्यादा बेहतर था. लेकिन चूंकि हिंदी सिनेमा का यह विलक्षण कलाकार किरदारों को जीता है, अभिनीत नहीं करता, इसलिए जल्द ही हम भी उनके मोहपाश में बंध ही गए. इस रोल में चरित्र-चित्रण का उनका अलहदा अंदाज पंकज त्रिपाठी के प्रशंसकों को एक बार फिर अभिभूत कर देगा.

हालांकि कई सिनेप्रेमी अब मानने लगे हैं कि उनके अभिनय में दोहराव दिखना शुरू हो गया है. लेकिन हर नया अभिनेता एक वक्त बाद जाना-पहचाना ही अभिनय करना शुरू कर देता है – क्योंकि उसके अभिनय से जुड़ा सबकुछ दर्शकों के लिए जाना-पहचाना होने लगता है - और ऐसे पड़ाव पर पहुंचकर मुख्तलिफ और दिलचस्प किरदार ही किसी अभिनेता के करियर को परिभाषित करते हैं.

हिंदी-भाषी माधव मिश्रा का किरदार ऐसा ही है जो चिर-परिचित अभिनय परदे पर रचने के बावजूद हिंदी सिनेमा के दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ेगा. पंकज त्रिपाठी का ह्यूमर को पेश करने का अंदाज अनूठा है और साथ ही सामान्य से दृश्यों में भी हाथ-उंगलियों और चेहरे-शरीर का वे अनूठा ही उपयोग करते चलते हैं. फिर संवाद ऐसे बोलना जैसे खुद लिखे हों, मासूमियत से दार्शनिक-सी बातें कर जाना, और जिन किरदारों से मोहब्बत का रिश्ता नहीं है उनसे भी बात करते वक्त ‘आत्मीयता’ को बेमिसाल अंदाज में पेश करना उन्हें और ज्यादा अनूठा कलाकार बनाता है!

बिला शक, सरल-सहज अभिनय करने को वापस से ‘कूल’ बना रहे इस अभिनेता के अभिनय में गुण ही गुण मौजूद हैं. अवगुण एक नहीं!