भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को इस बार टिकट नहीं मिला. लंबे समय से उनकी सीट रहे गांधीनगर से अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उम्मीदवार हैं. कहा जा रहा है कि लालकृष्ण आडवाणी की सियासी पारी पर अब विराम लग गया है. जिस दिन भाजपा ने अपना घोषणापत्र जारी किया उस दिन अमित शाह आडवाणी से मिलने भी गए और यह बताया जा रहा है कि इस बैठक में उन्होंने आडवाणी को यह बताने की कोशिश की कि 75 साल से अधिक के लोगों को चुनाव नहीं लड़ाने का फैसला संसदीय बोर्ड का था और यह किसी खास व्यक्ति को लक्षित करके नहीं किया गया है.

लालकृष्ण आडवाणी का टिकट गुजरात के गांधीनगर से कटने के बाद यह माना जा रहा था कि अब वे कुछ बोलेंगे. माना जा रहा था कि भाजपा की अभी की राजनीति में अब उनके लिए पाने के लिए कुछ नहीं रह गया है और उनकी उम्र अब इतनी अधिक हो गई है कि उनके पास इंतजार करने का वक्त नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी बोले भी, लेकिन अपने अंदाज में. जो लोग आडवाणी की राजनीतिक शैली को समझते हैं, उन्हें पता है कि वे संकेतों में बोलते हैं. अपनी इसी शैली के तहत उन्होंने एक ब्लाॅग में भाजपा की संस्कृति के बारे में लिखा. इसका सार यह है कि अभी का भाजपा नेतृत्व जिस तरह से अपने विरोधियों को दुश्मन बनाकर प्रस्तुत कर रहा है, आडवाणी ने उसे भाजपा की संस्कृति का हिस्सा नहीं माना. उन्होंने यह भी कहा कि विरोधियों को ‘राष्ट्र विरोधी’ कहना ठीक नहीं है.

इस सधी टिप्पणी की जगह कुछ लोग लालकृष्ण आडवाणी से यह उम्मीद कर रहे थे कि वे अधिक मुखर होकर कुछ बोलेंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके बाद से फिर से लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आडवाणी अब भी चुप क्यों हैं? अब आखिर उनके पास राजनीति में हासिल करने के लिए क्या है? बहुत सारे लोगों का मानना है कि लालकृष्ण आडवाणी को अब सेवानिवृत्त अनुभवी राजनेता की तरह प्रमुख मसलों पर अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए जिसमें वे किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं बल्कि जनता के हक और हित की बात करते दिखें.

लेकिन राजनीति में जो भी अनुभवी लोग हैं, वे सब लोग एक बात अक्सर कहते हैं कि राजनीति में कभी कोई खत्म नहीं होता. इस सोच के लोग यह मानते हैं कि आप जिस नेता को बिल्कुल खत्म मान लेंगे, वह भी खास राजनीतिक परिस्थितियों में उठकर खड़ा हो जाता है और सत्ता के शीर्ष पर भी पहुंच जाता है. भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं.

तो क्या लालकृष्ण आडवाणी के लिए राजनीति में फिर से उठ खड़ा होने की कोई संभावना अब भी बची है? जिन लोगों ने आडवाणी के साथ करीब से काम किया है वे मानते हैं कि उनका स्वभाव ‘नेवर से डाई’ यानी कभी भी हार मानने का नहीं है. यह तेवर आडवाणी में दिखा भी है. जब नरेंद्र मोदी को 2013 में भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया था तो उस वक्त दिल्ली के एक स्कूल के आयोजन में आडवाणी ने एक पुस्तक का हवाला देते हुए जो कहा था उसका सार यह है कि अगर आप में धैर्य और हौसला हो तो कठिन समय भी निकल जाता है.

इसलिए बहुत से लोग मानते हैं कि 2013 से लगातार पार्टी में उपेक्षा झेल रहे भाजपा के प्रमुख ‘शिल्पकारों’ में से सबसे प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी अगर चुप हैं तो यह उनकी विकल्पहीनता नहीं नहीं बल्कि इच्छा है. पहले लोग कह रहे थे कि आडवाणी को पीछे करके नरेंद्र मोदी आगे आए हैं तो वे आडवाणी को राष्ट्रपति बना देंगे. लेकिन नरेंद्र मोदी ने यह भी नहीं किया. जिस बैठक में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नाम तय हुआ उसमें आडवाणी का किसी ने नाम तक नहीं लिया. फिर भी वे चुप रहे. अब टिकट कट गया. फिर भी आडवाणी चुप हैं.

अगर लालकृष्ण आडवाणी मुखर होकर भाजपा के अभी के नेतृत्व के खिलाफ बोलने लगें तो उससे उन्हें राजनीतिक तौर पर क्या हासिल होगा? हर कोई यही कहेगा कि एक नाराज बुजुर्ग खुन्नस और उतावलेपन में आलोचना कर रहे हैं. अभी की भाजपा का प्रचार तंत्र इतना मजबूत है कि इसी धारणा को आम लोगों के मन में बैठाने का काम उसी पार्टी के प्रचार तंत्र से किया जाएगा जिसे आडवाणी ने खड़ा किया है. भाजपा नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में आडवाणी को लेकर एक नकारात्मक माहौल कायम होगा. लोगों को लगेगा कि चुनाव के ठीक पहले जब पूरा विपक्ष भाजपा को हराने की कोशिश में लगा है, तो आडवाणी के बयान विपक्ष के अभियान को खाद-पानी दे रहे हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि चुप्पी से उनको क्या हासिल होगा? जानकारों का एक वर्ग मानता है कि लालकृष्ण आडवाणी के जिस रुख को ‘चुप्पी’ माना जा रहा है, राजनीति में उसके लिए ‘धैर्य’, ‘सब्र’ और ‘परिपक्वता’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं. दरअसल, लोकसभा चुनावों को लेकर अब तक की विपक्ष की जो रणनीति दिख रही है, उसमें उन्हें भी यह मालूम है कि वे खुद सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ सकते. इसलिए हर जगह कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने ऐसा ताना-बाना तैयार किया है, जिससे भाजपा की सीटें कम हों. 2014 में भाजपा को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला था. अब विपक्ष की पूरी कोशिश यह है कि भाजपा की कम से कम 100 सीटें कम हो जाएं.

अगर यह स्थिति बनती है तो फिर से भाजपा की राजनीति के केंद्र में लालकृष्ण आडवाणी के आने की संभावना बन जाएगी. उनकी उम्र 91 साल है. लेकिन अच्छी बात यह है कि वे स्वस्थ हैं. उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं है. खान-पान और परहेज के मामले में उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी से बेहतर बताया जाता है. स्वास्थ्य को लेकर वे शुरू से सजग रहे हैं, इस वजह से इस उम्र में भी वे कोई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत का सामना नहीं कर रहे हैं.

दुनिया में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें लालकृष्ण आडवाणी से भी अधिक उम्र के लोगों ने सत्ता का संचालन किया है. मलेशिया में महातिर मोहम्मद 92 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने. 1977 में भारत में ही मोरारजी देसाई 81 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे. इस लिहाज से देखें तो उम्र और स्वास्थ्य आडवाणी के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं है.

प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए जिन राजनीतिक परिस्थितियों की जरूरत है, वे परिस्थितियां 2019 लोकसभा चुनावों के परिणाम के बाद पैदा हो सकती हैं. अगर कोई ऐसी स्थिति बनती है कि भाजपा की सीटों की संख्या 200 से नीचे चली जाती है तो फिर नरेंद्र मोदी के लिए दोबारा प्रधानमंत्री बनना आसान नहीं होगा. क्योंकि खुद भाजपा के अंदर औपचारिक तौर पर भले ही सब कुछ सही दिख रहा हो लेकिन जिस तरह मोदी-शाह का प्रभुत्व कायम हुआ है, उससे प्रमुख नेताओं में बहुत नाराजगी है. संघ नेताओं का बड़ा वर्ग भी मोदी-शाह की कार्यशैली से सहज नहीं है. सहयोगी दलों के जो मंत्री मोदी सरकार में थे, उनसे भी अनौपचारिक बातचीत करने पर पता चलता है कि हर काम में प्रधानमंत्री कार्यालय की जरूरत से अधिक दखल से उन्हें काम करने में असहजता रही. यह शिकायत भाजपा के मंत्रियों की भी है.

जाहिर है कि मोदी-शाह से नाराज इन वर्गों को जब भी यह लगेगा कि यह जोड़ी कमजोर हो रही है या हो सकती है तो ये सभी वर्ग मुखर होकर इन्हें और कमजोर करने की कोशिश करेंगे. ऐसी स्थिति में मोदी के विकल्प के तौर पर भाजपा के अंदर और मीडिया में दो नाम चल रहे हैं. एक नाम है नितिन गडकरी का और दूसरा राजनाथ सिंह का.

लेकिन भाजपा की आंतरिक राजनीति को समझें तो पता चलता है कि नितिन गडकरी के नाम पर नरेंद्र मोदी सहमत नहीं होंगे. अगर सीटें कम भी होती हैं तो भी नरेंद्र मोदी इतने कमजोर नहीं हो जाएंगे कि अगले प्रधानमंत्री के चयन में उनकी अनदेखी की जाए. ऐसी स्थिति में नरेंद्र मोदी की पसंद राजनाथ सिंह हो सकते हैं. लेकिन मोदी के कार्यकाल में राजनाथ सिंह की जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए यह उन्हें भी मालूम होगा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलाने का काम नरेंद्र मोदी खुद करेंगे.

भाजपा में राजनाथ सिंह को भी बेहद धैर्यवान माना जाता है. उनकी राजनीति को जो लोग समझते हैं, वे यह मानेंगे कि ऐसी स्थिति में वे इसके लिए काम करेंगे कि नरेंद्र मोदी और कमजोर हों और नेतृत्व नितिन गडकरी के हाथ में न चला जाए. राजनाथ सिंह का नाम आते ही नितिन गडकरी भी उन्हें रोकने की कोशिश करेंगे क्योंकि इन दो में से किसी एक को नेतृत्व मिला तो भविष्य की भाजपा का नेतृत्व कुछ सालों के लिए निश्चित हो जाएगा.

ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी फिर से भाजपा की राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं. उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का मतलब यह होगा कि भाजपा में अगली पीढ़ी के नेतृत्व के लिए फिर से संघर्ष होगा और आडवाणी के रहते इसमें तीनों प्रमुख नेताओं नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और नितिन गड़करी को साल-दो साल का वक्त मिल जाएगा. आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने से नरेंद्र मोदी को यह लाभ होगा कि नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह उनसे पीछे रहेंगे और आडवाणी के प्रधानमंत्री रहते मोदी को फिर से अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल जाएगा. संघ को भी यह लग सकता है कि मोदी-शाह की शैली से छुटकारा मिले और आडवाणी के रहते सांगठनिक सुधार शुरू हो.

सहयोगी दलों को भी लालकृष्ण आडवाणी से कोई दिक्कत नहीं होगी. क्योंकि इन्हें यह लगेगा कि बतौर प्रधानमंत्री आडवाणी उनके काम में अतिरिक्त दखल नहीं देंगे और काम करने की आजादी देंगे. वहीं विपक्ष को भी यह लगेगा कि उसने नरेंद्र मोदी को बाहर कर दिया और आडवाणी के रहते हुए सहयोगियों के भरोसे चलने वाली भाजपा सरकार बहुत दिन टिक नहीं पाएगी और ऐसे में तैयारी के साथ वह भविष्य के चुनावों में भाजपा को पटखनी दे सकता है. नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए आडवाणी का समर्थन देने कुछ वैसे क्षेत्रीय दल भी सामने आ सकते हैं, जो अभी कांग्रेस के साथ हैं.

कुल मिलाकर देखा जाए तो आडवाणी के लिए फिर से अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियां बन सकती हैं. बशर्ते भाजपा की तकरीबन 100 सीटें कम हो जाएं और कांग्रेस को जोड़-तोड़ करके भी सरकार बनाने भर सीटें नहीं मिलें.