छोड़ते, छोड़ते, छोड़ते; अल्पेश ठाकोर ने आख़िरकार कांग्रेस को छोड़ ही दिया. यहां ‘छोड़ते’ शब्द का इस्तेमाल एक से ज्यादा बार इसलिए किया क्योंकि बीते एक साल में ऐसे मौके कई बार आए जब लगा कि अल्पेश कांग्रेस को गच्चा दे सकते हैं. ताजा मामला इसी जनवरी का है जब वे गुजरात भाजपा के एक प्रमुख नेता शंकर चौधरी से मिले थे. लेकिन हर बार की तरह कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व (प्रदेश नेतृत्व नहीं) तब भी अल्पेश को मनाने में सफल रहा था. इस बार अल्पेश ठाकोर और उनके दो सहयोगी विधायकों - धवलसिंह झाला और भरत जी ठाकोर - ने कांग्रेस का हाथ छिटक दिया है.

कयास है कि ये तीनों विधायक जल्द ही भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने वाले हैं. दबी आवाज़ में चर्चा यह भी है कि गुजरात की स्थानीय निकाय संस्थाओं में, जहां अभी भी कांग्रेस का वर्चस्व है, अपने सहयोगियों को मलाईदार जिम्मेदारियां दिलवाने के लिए ठाकोर जमकर मोलभाव कर सकते हैं. बदले में वे इस चुनाव में कांग्रेस को बाहर से समर्थन देते रहेंगे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को खासा संबल देने वाले अल्पेश ठाकोर का बिछोह, लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को कितना और कैसे प्रभावित करेगा?

पहले इस बारे में एक सतही चर्चा कर लेते हैं. अल्पेश जिस ठाकोर समुदाय से आते हैं; गुजरात में उसकी तादाद पंद्रह से अठारह फीसदी मानी जाती है. इस समुदाय के वर्चस्व को खासतौर पर राज्य के उत्तरी जिलों में साफ महसूस किया जा सकता है. यह समुदाय लोकसभा की करीब चार सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है. इसके अलावा; प्रदेश में चालीस फीसदी से ज्यादा आबादी वाले पूरे ओबीसी वर्ग पर भी ठाकोर समुदाय का खासा प्रभाव है.

अब यदि सीटों के हिसाब से बात करें तो अल्पेश ठाकोर की नाराज़गी से कांग्रेस को जिन सीटों पर पसीना आने की पूरी संभावना है उनमें पाटण और उसकी नजदीकी बनासकांठा (जिला-पालनपुर) प्रमुख हैं. गौरतलब है कि गुजरात की छब्बीस में से जिन पांच लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीदें थीं, पाटण और बनासकांठा उनमें ही शामिल हैं. इन दोनों सीटों से कांग्रेस को ज्यादा उम्मीद इसलिए भी थी क्योंकि लोग यहां दो साल पहले आई बाढ़ के दौरान भाजपा सरकार की बदइंतजामी को अभी भी पूरी तरह भूल नहीं पाए हैं. यही कारण है कि जानकार ठाकोर के साथ छोड़ देने को कांग्रेस के लिए बड़े झटके के तौर पर देख रहे हैं.

गुजरात कांग्रेस से जुड़े विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो पाटण ही वह सीट थी जिस पर हुए टिकट वितरण ने पार्टी और अल्पेश ठाकोर के बीच बनते-बिंगड़ते रिश्तों में आख़िरी कील का काम किया. कांग्रेस ने पाटण से जगदीश ठाकोर को अपना उम्मीदवार चुना है. जगदीश 2009 के लोकसभा चुनाव में इसी सीट से कांग्रेस को जीत दिला चुके हैं. दूसरी तरफ अल्पेश ठाकोर खुद भी पाटण जिले से ही आते हैं.

प्रदेश कांग्रेस के एक पूर्व पदाधिकारी के शब्दों में, ‘अल्पेश; पाटण और आस-पास के जिलों में अपने सिवाय किसी अन्य बड़े ठाकोर चेहरा की उपस्थिति नहीं चाहते. इसलिए उन्होंने इस सीट से अपने ही किसी विश्वस्त को मैदान में उतारे जाने की पुरजोर पैरवी की थी. लेकिन अल्पेश की ही तरह गुजरात कांग्रेस के पदाधिकारियों को भी प्रदेश में कोई और उभरता चेहरा (अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी) कुछ खास पसंद नहीं, इसलिए उन्होंने ठाकोर की मांग को जान-बूझकर तवज्ज़ो नहीं दी. ऐसे में अल्पेश जगदीश ठाकोर को चित्त करने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे. और इस कवायद में सफल होने पर उन्हें भाजपा की तरफ़ से बड़ा ईनाम (मंत्री पद) मिल सकता है.’

वहीं, बनासकांठा में कांग्रेस ने परथीभाई भटोल पर दांव खेला है. भटोल, गुजरात में हुए चर्चित दूध आंदोलन (1946) की नींव के तौर पर स्थापित हुई अमूल डेयरी (गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन) के चेयरमैन रह चुके हैं. इस वजह से वे न सिर्फ बनासकांठा बल्कि पूरे प्रदेश में खासे प्रतिष्ठित हैं. लेकिन अल्पेश ठाकोर इस क्षेत्र से भी अपने ही किसी सहयोगी को मौका दिए जाने की मांग पर अड़े थे. अपनी बात न माने जाने पर उन्होंने भटोल के सामने अपने दो डमी प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया. जबकि तब वे कांग्रेस से अलग भी नहीं हुए थे.

अल्पेश के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले दोनों विधायक - धवलसिंह झाला और भरत जी ठाकोर - मेहसाणा जिले से ही ताल्लुक रखते हैं. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि यहां कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं होने वाला. मेहसाणा लोकसभा सीट को भाजपा ने 1984 के आम चुनावों में तब भी जीता था जब भाजपा को पूरे देश में सिर्फ दो सीटें ही मिली थीं.

अल्पेश के चले जाने से कांग्रेस को कुछ फायदा भी हो सकता है?

करीब छह महीने पहले परप्रांतीय लोगों पर बड़ी संख्या में हुए हमलों की वजह से गुजरात अचानक से राष्ट्रीय स्तर की सुर्ख़ियों में शामिल हो गया था. तब गुजरात में 14 महीने की एक बच्ची के साथ दुष्कर्म के एक मामले में बिहार के एक मज़दूर को गिरफ़्तार किया गया था. इसके बाद राज्य के कई इलाकों में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के ख़िलाफ़ जबर्दस्त हिंसा भड़क गई थी. इसके चलते कई लोगों को गुजरात छोड़ना पड़ा था. हिंदीभाषी इन पीड़ितों ने उस समय ख़ुद पर हुई ज्यादती के लिए अल्पेश ठाकोर और उनके नेतृत्व वाली ‘गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना’ को भी जिम्मेदार ठहराया था.

जानकार बताते हैं कि गुजरात की अलग-अलग सीटों पर बिहार-उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले प्रवासियों की एक बड़ी तादाद मौजूद है. ये लोग ठाकोर की वजह से अब तक कांग्रेस से खासे आक्रोशित थे. यही कारण था कि कांग्रेस की तरफ से बिहार का प्रभारी बनाए जाने के बावजूद अल्पेश बाद में वहां जा भी नहीं पाए थे. लेकिन अब अल्पेश ठाकोर के चले जाने से कांग्रेस के प्रति इन प्रवासियों का रोष घट सकता है.