लोकसभा चुनाव 2019 में मतदाताओं की सीधी भागीदारी की शुरुआत हो चुकी है. पहले चरण के तहत 11 अप्रैल को 20 राज्यों की 91 लोकसभा सीटों पर वोटिंग हो चुकी है. इनमें छत्तीसगढ़ की बस्तर सीट भी शामिल है. बस्तर के अलावा राज्य की तीन सीटों पर 18 अप्रैल और बाकी सात सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार छत्तीसगढ़ उन राज्यों की सूची में सबसे ऊपर दिख रहा है, जहां बड़ा उलटफेर होने की संभावना है.

साल 2004 (राज्य गठन के बाद पहला लोकसभा चुनाव), 2009 और 2014 के चुनावों में यहां भाजपा ने कांग्रेस को 10-1 से मात दी थी. हालांकि इस बार राज्य में राजनीतिक हालात से लेकर आंकड़े तक कांग्रेस को मजबूत साबित करते हुए दिख रहे हैं.

आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में हैं

बीते साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को करारी मात दी थी. कांग्रेस ने भूपेश बघेल के नेतृत्व में 90 में से 68 सीटों पर कब्जा किया था. वहीं, भाजपा को केवल 15 सीटों से संतोष करना पड़ा. दोनों पार्टियों के वोट शेयर में भी 10 फीसदी का बड़ा अंतर था. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 43 फीसदी तो वहीं भाजपा को 33 फीसदी वोट मिले थे. इस लिहाज से केवल छह महीने के बाद इस बड़े अंतर को खत्म करना और फिर कांग्रेस पर बढ़त बनाना भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती मानी जा सकती है.

दूसरी तरफ अजित जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) पार्टी के चुनावी मैदान में न उतरने का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. 2018 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी को 7.6 फीसदी वोट (पांच सीट) हासिल हुए थे. माना जा रहा है कि ये वोट लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ जुड़ सकते हैं. तब कांग्रेस का वोट शेयर 50 फीसदी से अधिक हो सकता है. वहीं भाजपा ने अब तक राज्य में हुए आम चुनावों में साल 2014 के चुनाव में सबसे अधिक 49.7 फीसदी वोट हासिल किए थे. इसके अलावा 2018 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के हिसाब से देखें तो भाजपा 11 लोकसभा सीटों में से केवल एक सीट बिलासपुर में बढ़त बनाती हुई दिख रही है. इस सीट पर कांग्रेस के अटल श्रीवास्तव का मुकाबला भाजपा के नए चेहरे अरुण साव से है. भाजपा ने बिलासपुर से अपने सांसद लखन लाल साहू को इस बार टिकट नहीं दिया है.

राजनीतिक समीकरण और उम्मीदवार

भाजपा ने लखन लाल साहू ही नहीं बल्कि राज्य के बाकी नौ और सांसदों का टिकट भी काट दिया है. माना जा रहा है कि पार्टी को इनकी ओर से बगावत या भितरघात का सामना भी करना पड़ सकता है. इसके अलावा जिन उम्मीदवारों को चुनावी दंगल में उतारा गया है, उनमें से अधिकांश की मतदाताओं के बीच कोई मजबूत पकड़ नहीं है. बताया जाता है कि इन प्रत्याशियों से इतर पार्टी का मुख्य और एकमात्र चेहरा नरेंद्र मोदी ही हैं, जिनके नाम पर मतदाताओं से वोट मांगा जा रहा है.

वर्तमान सांसदों के टिकट काटने की कवायद से भाजपा कुछ सीटों पर सीधे-सीधे कमजोर हुई है और इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. बस्तर सीट से पार्टी ने सांसद दिनेश कश्यप की जगह बैदूराम कश्यप को उतारा है. बैदूराम भाजपा की जिला इकाई के अध्यक्ष हैं. जबकि दिनेश ने साल 2014 से पहले 2011 में भी यहां से जीत दर्ज की थी. उनसे पहले उनके पिता बलिराम कश्यप ने 1998 से 2011 तक संसद में बस्तर का प्रतिनिधित्व किया था. वहीं कांग्रेस ने इस सीट पर चित्रकूट के विधायक दीपक बैज को उतारा है. अपनी चुनावी रणनीति के तहत कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाले क्षेत्र के मजबूत प्रत्याशियों को लोकसभा चुनाव में उतारा है. जैसे; सरगुजा लोकसभा सीट के उम्मीदवार खेलसाय सिंह प्रेमनगर से विधायक हैं. इससे पहले वे साल 1991, 1996 और 1999 में इस सीट से सांसद रह चुके हैं. सरगुजा के अलावा बस्तर और रायगढ़ में भी वर्तमान विधायकों को उम्मीदवार बनाया गया है.

भूपेश सिंह बघेल सरकार बनाम मोदी सरकार

विधानसभा चुनाव में बदलाव का नारा देने वाली कांग्रेस अब अपने छह महीने के कामकाज को लेकर मतदाताओं के बीच उतरी है. वहीं, भाजपा केंद्र की मोदी सरकार के पांच साल के कामकाज को लेकर वोट देने की अपील करती हुई दिख रही है. इससे पहले पार्टी ने विधानसभा चुनाव में रमन सिंह सरकार के साथ-साथ मोदी सरकार के कामकाज के आधार पर भी वोट मांगे थे. लेकिन, पार्टी राज्य की जनता का भरोसा नहीं जीत पाई.

अब भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के कामकाज के आधार पर वोट मांगना आसान नहीं है. इसी साल जनवरी में आदिवासी और अन्य वनवासियों को बड़ी संख्या में उनकी जमीन से विस्थापित करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश आया था. इस पर केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैए के चलते भाजपा को आदिवासियों के एक बड़े तबके की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है.

वहीं, कांग्रेस का दावा है कि उसने विधानसभा चुनाव में किए गए वादों को पूरा किया है. इसमें किसानों की कर्जमाफी और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2500 रुपये प्रति क्विंटल कर देना शामिल है. इसके अलावा बस्तर में टाटा स्टील प्लांट के लिए अधिगृहीत 1764 हेक्टेयर जमीन आदिवासियों को वापस लौटाना भी कांग्रेस का ऐसा ही वादा था. हालांकि शराबबंदी के वादे को लेकर भूपेश बघेल की सरकार ने अब तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया है. जनवरी, 2019 में राज्यभर में केवल 50 शराब की दुकानें बंद की गई हैं और आबकारी कर बढ़ाने का फैसला किया गया है. भाजपा ने इस फैसले को जनता के साथ धोखा बताया है. साथ ही, जल्द पूर्ण शराबबंदी की मांग की है.

इस बार आदिवासी सीटों पर भाजपा की पकड़ कमजोर

राज्य की 11 सीटों में से चार सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. इनमें बस्तर, रायगढ़, सरगुजा और कांकेर शामिल हैं. इन पर अब तक भाजपा की पकड़ रही है. लेकिन, विधानसभा चुनाव के बाद स्थितियां उलट गई हैं. दिसंबर, 2018 में कांग्रेस ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 29 में से 25 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके अलावा पार्टी ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित इन चार सीटों में पड़ने वाली कुल 32 विधानसभा सीटों में से 31 पर कब्जा किया था. यानी एक तरह से इन क्षेत्रों में भाजपा का सफाया हो गया था.