कलाकार: मानव कौल, नंदिता दास, सौरभ शुक्ला, किशोर कदम

लेखक-निर्देशक: सौमित्र रानाडे

रेटिंग: 3/5

साल 1980 में रिलीज हुई सईद अहमद मिर्ज़ा की कल्ट-क्लासिक ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ मज़दूर तबके से आने वाले एक नायक, अल्बर्ट पिंटो की कहानी कहती है. यह फिल्म पिंटो के बहाने उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने की पोल खोलती है. सच की जमीन पर कलात्मकता और सादगी से बुनी गई इस फिल्म को देखने और इसका कहा समझने के लिए आपको ढेर सारा धैर्य और संवेदना चाहिए. इन दोनों चीजों की दोबारा जरूरत तब होती है, जब आप 2019 में इसका रीमेक यानी सौमित्र रानाडे निर्देशित ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ देखते हैं

चार दशक पहले तक अल्बर्ट पिंटो जहां अपनी परिस्थितियों से क्षुब्ध था, वहीं अब वह इनसे हताश हो चुका है. इतना हताश कि कई बार ऐसा लगता है जैसे वह अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठा है. दुनियावी दस्तूरों से नाराज़ पिंटो की कई शिकायतों में आपको थोड़ा-थोड़ा अपना स्वर भी सुनाई देता है. पुरानी ‘अल्बर्ट पिंटो...’ से अलग नई फिल्म सामाजिक से ज्यादा मानवीय पक्ष दिखाती है. मन के भीतर चलने वाले अच्छे-बुरे का द्वंद दिखाते हुए यह कई बार जरूरत से ज्यादा सिनेमाई हो जाती है. बार-बार काल्पनिक दृश्यों या फ्लैशबैक के चक्कर लगाते हुए यह अपनी लय तो नहीं खोती, लेकिन आपके पूरे ध्यान की दरकार बनाए रखती है.

अभिनय के लिहाज से फिल्म एक विजुअल ट्रीट है और इसका ज्यादातर क्रेडिट मानव कौल को जाता है. अल्बर्ट पिंटो बनकर मानव कौल ने एक ईमानदार, नौकरीपेशा, मध्यवर्गीय लेकिन जिंदगी से अचानक उखड़ चुके युवक की भूमिका निभाई है. उनके अभिनय की खास बात यह है कि उनकी हंसी में उनके किरदार के भीतर की चिढ़न, गुस्से में मजबूरी और बौखलाहट में प्यार साफ-साफ देखा जा सकता है. मतलब यह है कि मानव कौल चेहरे पर भावनाओं का ऐसा कॉकटेल दिखाते हैं कि आप वाह-वाह करते नहीं थकते. बाकी स्क्रीन पर सजीले तो वे हमेशा ही लगते हैं.

मानव कौल के अलावा जो अभिनेता सबसे ज्यादा वक्त परदे पर नज़र आता है, वह सौरभ शुक्ला हैं. शुक्लाजी ने इस बार हरियाणवी टोन अख्तियार की है. इस टोन और निपट देसी शब्दों के साथ उन्होंने कुछ कमाल के संवाद कमाल तरीके से कहे हैं. इन संवादों में जिंदगी के फलसफे बहुत मनोरंजक तरीके से बताए गए हैं. इन्हें लिखने के लिए हमें संवाद लेखक का और वे पूरा असर पैदा कर सकें, उन्हें इस तरह से निभाने के लिए लेखक को सौरभ शुक्ला धन्यवाद करना चाहिए.

तीसरा मुख्य किरदार नायिका स्टेला का है जो मूल फिल्म में शबाना आज़मी ने निभाया था. इसे फिल्म में खटकने की हद तक संक्षिप्त रखा गया है. इसका एक नुकसान यह भी हुआ है कि औरतों का जो पक्ष पिछली फिल्म में खासा उभरकर आया था, वह इस बार नदारद है. इन सबसे ज्यादा बड़ा नुकसान यह है कि नंदिता दास के बढ़िया अभिनय की झलक बस ज़रा सी और बीच-बीच में ही मिल पाती है.

अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, की सिनेमेटोग्राफी कुछ ऐसी है कि इसे देखते हुए फिल्म का नहीं बल्कि थिएटर देखने का अनुभव होता है. कई दृश्य, जिनमें नायक अपनी कल्पनाओं में उड़ता दिखता है, अपनी लिखाई और सुंदरता से प्रभावित करते हैं. कई ऐसे भी हैं जो अपने औसतपन से चिढ़ा भी देते हैं. यह फिल्म सीपिया और डार्क शेड्स लिए हुए एक आम भारतीय आदमी की निराशाओं में गहरे उतरती है. इतनी गहरे कि देखने वाले को भी भीतर कुछ स्याह सा (निराशा जैसा) भरता हुआ महसूस होता है. और इसीलिए इस चुनावी मौसम में, खासकर मतदान के पहले यह एक देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है. कुछ नहीं, तो आपको वे मुद्दे ही याद आ जाएंगे जिनका ख्याल आपको वोट डालते हुए होना चाहिए. वैधानिक चेतावनी यह रहेगी कि खराब मूड में अल्बर्ट पिंटो से मिलने के बजाय उसे अवॉइड करना बेहतर होगा.