भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद और हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री हेमा मालिनी इन दिनों अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा में अपने चुनाव प्रचार को लेकर चर्चा में हैं. बीते 31 मार्च को प्रचार अभियान शुरू करते हुए उन्होंने एक के बाद एक कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. इनमें वे अपने संसदीय क्षेत्र की महिला किसानों के साथ दिख रही हैं. एक तस्वीर में उन्हें खेत में गेहूं काटते देखा जा सकता है तो एक में वे लकड़ियां ले जा रही ग्रामीण महिला संग फ़ोटो खिंचाती दिख रही हैं.

सोशल मीडिया पर एक बड़े तबक़े को हेमा मालिनी के प्रचार का यह तरीक़ा बिलकुल पसंद नहीं आया है. कई लोगों ने इसे मेहनती लेकिन ग़रीब ग्रामीण महिलाओं का अपमान बताया है. इन लोगों का सवाल है कि हेमा मालिनी को बताना चाहिए कि अपने क्षेत्र के लिए उन्होंने कितना काम किया है, ख़ास तौर पर किसानों का हाल पूछने के लिए वे कितनी बार मथुरा आई हैं. भाजपा सांसद पर हमला करते हुए यह भी कहा जा रहा है कि जब वे बिना छाते के धूप में प्रचार तक नहीं कर सकतीं तो ‘दिखावे के लिए’ कड़ी धूप में खेत में काम करतीं महिलाओं के साथ तस्वीरें क्यों खिंचवा रही हैं.

हेमा मालिनी इन सवालों का जवाब अपने कामकाज का हिसाब देकर दे रही हैं. तमाम आलोचनाओं के बीच मंगलवार को उन्होंने ट्विटर पर बताया कि पांच साल सांसद रहते हुए उन्होंने मथुरा के लिए क्या-क्या किया है. दिलचस्प बात है कि उनके कामों की सूची में किसानों से जुड़े किसी काम का ज़िक्र नहीं है. ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि किसानों के साथ प्रतीकात्मक संवाद स्थापित करने का क्या मतलब है.

उधर, भाजपा समर्थक वर्ग को हेमा मालिनी के बचाव में कोई तर्क नहीं मिल रहा तो वह सोशल मीडिया पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की एक दुर्लभ तस्वीर शेयर करने में लगा हुआ है. इसमें वे भी हाथ में कटी हुई गेहूं का गठ्ठर लिए हुए हैं. इस तस्वीर के साथ हेमा मालिनी का पक्ष लेते हुए ये लोग सवाल कर रहे हैं कि हेमा मालिनी का मज़ाक़ उड़ाने वाले क्या इंदिरा गांधी की तस्वीर पर कोई टिप्पणी करेंगे. इस तरह के कई सवाल या तंजभरी टिप्पणियां आसानी से फ़ेसबुक-ट्विटर पर देखी जा सकती हैं.

अब सवाल यह है कि क्या सच में इंदिरा गांधी और हेमा मालिनी की तस्वीरों में कोई फ़र्क़ नहीं है. यह जानने से पहले हमें यह समझना होगा कि अगर कोई व्यक्ति या नेता ख़ुद को किसानों (या कोई और वर्ग) का हितैषी बता रहा है तो इसके लिए उसने काम क्या किया है. अगर हेमा मालिनी ने अपने क्षेत्र के किसानों के लिए काम किया होता तो वे उनके साथ तस्वीरें खिंचवाए बिना भी तारीफ की हकदार होतीं. लेकिन सिर्फ़ चुनाव के वक़्त किसानों की सुध लेना और प्रतीकात्मक रूप से खेत में काम करके तस्वीरें खिंचवाने से उनका विरोधियों के निशाने पर आना स्वभाविक ही है.

वहीं, जो लोग उनका बचाव कर रहे हैं, उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि ख़ुद हेमा मालिनी कह रही हैं कि अगर उन्होंने खेत में फ़सल काटने का अभिनय किया तो क्या ग़लत किया. एक टीवी चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा है, ‘जब चुनाव प्रचार के लिए गांव में जाती हूं तो इस तरह का माहौल मिलता है. मैं एक अभिनेत्री हूं. खेत में जाकर अगर मैंने फसल काटने की एक्टिंग भी की है तो इसमें बुरी बात क्या है. मुझे तो बड़ा मज़ा आया.’

हेमा मालिनी का यह बयान ही उनकी और इंदिरा गांधी की तस्वीर का फ़र्क़ है. तस्वीर खिंचाने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन अगर उसका इस्तेमाल किसी मक़सद के लिए किया जाएगा तो सवाल और आलोचना दोनों किए जा सकते हैं. वहीं, इंदिरा गांधी की तस्वीर देखकर यह दावा करना मुश्किल है कि वे जानबूझकर गेहूं हाथ में लेकर कैमरे के सामने खड़ी हो गई थीं. ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी. हालांकि दोनों ही स्थितियों में इंदिरा गांधी की तुलना हेमा मालिनी से नहीं की जा सकती. इतिहास इसकी एक बड़ी वजह देता है.

भारत में 60 और 70 का दशक हरित क्रांति के लिए भी जाना जाता है. जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकालों के दौरान और उनके बाद कृषि सुधार की दिशा में कई प्रकार के तकनीकी विकास के कार्य किए गए. जानकार कहते हैं कि हरित क्रांति को एक प्रमुख सरकारी प्राथमिकता बनाने का श्रेय इंदिरा गांधी को जाता है. जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के ‘पुरोधा’ एमएस स्वामीनाथन अपने एक लेख में बताते हैं कि 1964 में सर्वाधिक 120 लाख टन गेहूं उत्पादन हुआ था. लेकिन 1968 में इसमें जबर्दस्त उछाल आया और यह रिकॉर्ड 170 लाख टन तक पहुंच गया. इससे प्रभावित होकर इंदिरा गांधी ने जुलाई, 1968 में गेहूं क्रांति की घोषणा कर दी थी. स्वामीनाथन के मुताबिक़ बाद में अक्टूबर, 1968 में ही अमेरिका के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ विलियम गुआड ने खाद्य फ़सलों की पैदावार में हमारी इस क्रांतिकारी प्रगति को ‘हरित क्रांति’ का नाम दिया था.

दरअसल इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए देश में नए संकर बीजों का इस्तेमाल शुरू हुआ, साथ ही बिजली, पानी, खाद में सरकारी सब्सिडी और किसान ऋण के लिए प्रावधान की भी शुरुआत की गई. इंदिरा गांधी के इन प्रयासों से भारत खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना. यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि कृषि में सरकारी निवेश तेजी से बढ़ाया गया. वहीं, खेती के लिए मुहैया कराया जाने वाला वित्त 1968 और 1973 के बीच दोगुना किया गया. इसके अलावा फ़सलों के लिए लाभकारी मूल्य और कम कीमत पर नई तकनीक देने का भी फ़ायदा हुआ. बताया जाता है कि नई रणनीति के तहत किए गए इन प्रयासों के परिणाम 1967-68 से 1970-71 के बीच की छोटी अवधि में देखने को मिल गए थे.

सोशल मीडिया पर कुछ जानकारों ने बताया कि गेहूं की कटी बालियां हाथ में लिए इंदिरा गांधी की तस्वीर उसी समय की है. वरिष्ठ पत्रकार अद्वैत बहुगुणा फ़ेसबुक पर लिखते हैं, ‘27 अप्रैल, 1970 की यह तस्वीर स्वामीनाथन के अथक प्रयासों से और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुई हरित क्रांति के बाद गेहूं कि उन्नत नस्ल की पहली फ़सल की कटाई के अवसर की है.’ इस जानकारी से यह भी साफ हो जाता है कि इंदिरा गांधी की तस्वीर किसी चुनावी अभियान के तहत नहीं ली गई थी.

बहरहाल, रिपोर्टों के मुताबिक़ उस समय खाद्यान्न उत्पादन में 37 फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी. वहीं, खाद्यान्न का शुद्ध आयात एक करोड़ तीस लाख टन (1966) से घटकर में 36 लाख टन (1970) रह गया था. इसके अलावा इसी अवधि में भोजन की उपलब्धता सात करोड़ टन से बढ़कर करीब दस करोड़ टन हो गई थी. 80 का दशक आते-आते भारत के पास 30 लाख टन से अधिक का खाद्य भंडार उपलब्ध था. यानी तब हम इस मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भर हो गए थे, बल्कि खाद्यान्नों की कमी वाले देशों को ऋण स्वरूप खाद्यान्न देने भी देने लगे थे.