सोमवार 20 अगस्त 2018 का दिन गर्मी की छुट्टियों के बाद स्वीडन के नये स्कूली वर्ष का पहला दिन था. सभी बच्चे स्कूल में थे. लेकिन दो लंबी चोटियों के बीच गोलमटोल चेहरे वाली नाटे कद की एक लड़की, राजधानी स्टॉकहोम के संसद-भवन की दीवार से पीठ टिका कर ज़मीन पर बैठी धरना दे रही थी. साथ में उसका स्कूली बस्ता और हाथ में एक तख्ती थी. तख्ती पर बड़े-बड़े लैटिन अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘स्कोलस्ट्रइक फ़्यौअर क्लीमातेत’ (जलवायु के लिए स्कूल जाने से हड़ताल). लड़की के चेहरे और आंखों से एक ऐसी व्यथित उदासी टपक रही थी, मानो उससे अधिक दुखी और एकाकी इस संसार में दूसरा कोई नहीं है.
इस बीच जगप्रसिद्ध हो चुकी यह लड़की ग्रेटा तुन्बेर्ग उस समय 15 साल की थी. तीन जनवरी 2019 को वह 16 साल की हो गयी है. ग्रेटा स्टॉकहोम के एक स्कूल की नौवीं कक्षा की छात्रा है. अब तक के स्कूली जीवन में वह सबसे पीछे बैठने की आदी रही है. बर्फीली सर्दियों वाले स्वीडन का मनमौज़ी मौसम चाहे जैसा हो, 20 अगस्त से ग्रेटा हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले जलवायुरक्षा की गुहार लगाती वही तख्ती हाथ में लिये संसद भवन के सामने प्रदर्शन किया करती है. बहुत जल्द ही वह अकेली नहीं रह गयी. उसकी देखादेखी, स्वीडन या यूरोप के ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया के स्कूली बच्चों का ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ (हर शुक्रवार भविष्य बचाने के लिए) नाम का एक विश्व्यापी आंदोलन चल पड़ा है.
हर शुक्रवार को प्रदर्शन
दुनिया के ढेर सारे देशों के लाखों स्कूली बच्चे हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बजाय सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं. संयुक्त राष्ट्र जलवायुरक्षा सम्मेलन हो या स्विट्ज़रलैंड में दावोस का ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’, 10-12 साल की किसी बच्ची-जैसी दिखती ग्रेटा को भाषण देने के लिए आमंत्रित करने वालों का तांता लग गया है. एक से एक नामी पुरस्कारों की उस पर वर्षा हो रही है. 2019 के नोबेल शांति-पुरस्कार तक के लिए उसे नामांकित किया जा चुका है. जर्मनी के राष्ट्रपति सहित कई देशों के शीर्ष राजनेता ग्रेटा का गुणगान कर रहे हैं. अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ग्रेटा से इंटरव्यू ले रहे हैं. पर वह है कि अपने नाम की धूम पर झूमने के बदले अपने काम में मग्न रहती है.
जर्मनी के सबसे बड़े सार्वजनिक रेडियो-टीवी प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’ ने बीते मार्च के आखिर में ग्रेटा के साथ एक इंटरव्यू प्रसारित किया. स्वीडिश संसद भवन के सामने धरना देने की शुरुआत के बारे में ग्रेटा ने बताया, ‘सच कहूं तो मैंने यही सोचा था कि मेरे ऐसा करने से हो सकता है कि मीडिया जलवायुरक्षा बारे में कुछ लिखेगा. लोग-बाग कुछ बातें करेंगे. इससे अधिक की उम्मीद मैं नहीं कर रही थी. कोई आंदोलन खड़ा करने का विचार नहीं था. लेकिन मैं केवल एक ही दिन अकेली रही. दूसरे ही दिन से दूसरे लोग भी मेरे साथ बैठने लगे. लोग आते गये और एक आंदोलन बनता गया. पहले स्वीडन के अन्य शहरों में. फिर अन्य देशों में भी. अन्य महाद्वीपों पर भी. इसका चरमबिंदु था ऑस्ट्रेलिया में भी बच्चों की हड़ताल. जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम, ब्रिटेन, कैनडा इत्यादि में भी यही हुआ. 15 मार्च 2019 को अब तक की बसे बड़ी विश्वव्यापी हड़ताल हुयी. ताजा जानकारी है कि अब तक 16 लाख 30 हज़ार स्कूली बच्चे जलवायुरक्षा के लिए हड़तालें कर चुके हैं.’
‘क्षमा करें श्रीमान मॉरिसन...’
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन को अपने स्कूली बच्चों की हड़तालें पसंद नहीं आयीं. उनका कहना था, ‘हम चाहते हैं कि स्कूलों में पढ़ाई पर अधिक ध्यान दिया जाये, आंदोलन इत्यादि पर कम.’ ग्रेटा ने ट्विटर द्वारा उत्तर दिया, ‘क्षमा करें श्रीमान मॉरिसन. हम यह कामना पूरी नहीं कर सकते.’ यही शिकायत ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे को भी थी. ऐसा ही दोटूक उत्तर उन्हें भी मिला.
जर्मन की चांसलर अंगेला मेर्कल ने एक अजीब अटकल लगाई. उन्होंने कहा, ‘जर्मन स्कूली बच्चों के बढ़ रहे प्रदर्शनों और रूस द्वारा पश्चिमी देशों के विरुद्ध चलाये जा रहे ‘दोगले युद्ध’ (हायब्रिड वॉर) के बीच ज़रूर कोई संबंध है.’ इस पर ग्रेटा ने पलटवार किया. कहा, ‘जलवायु-परिवर्तन के अलावा हर चीज़ हमारी हड़तालों के साथ जोड़ दी जाती है, जबकि जलवायु-परिवर्तन ही उनका एकमात्र कारण है. राजनेता दशकों से जानते हैं कि इस परिवर्तन और हमारे अस्तित्व के बीच कितना गहरा संबंध है, लेकिन किया उन्होंने कुछ नहीं.’
आठ साल की उम्र से ही जलवायुरक्षा की धुन
जलवायु-परिवर्तन क्या है और पृथ्वी पर हर प्रकार के जीवन के लिए उसका क्या महत्व है, इस बारे में ग्रेटा तुन्बेर्ग ने पहली बार अपने स्कूल में सुना था. जर्मनी के एक दूसरे देशव्यापी सार्वजनिक टेलीविज़न चैनल ‘ज़ेडडीएफ़’ को उसने बताया, ‘मैं क़रीब आठ वर्ष की थी, जब स्कूल में बताया गया कि जलवायु में परिवर्तन मानवीय गतिविधियों के कारण हो रहा है. मैं सोचने लगी कि यह तो बड़ी अजीब बात है कि हमारे अस्तित्व के लिए जिस निर्णायक संकट को हर व्यक्ति की समझ से नंबर-एक ख़तरा होना चाहिये, उसकी कोई चर्चा ही नहीं करता. इसके बदले लोग आलतू-फ़ालतू चीज़ों को लेकर व्यस्त हैं.’
जलवायु-परिवर्तन के कारण समझ में आते ही, आठ-नौ साल की ग्रेटा ने घर में बिजली बचाने का अभियान छेड़ दिया. जब-जब ज़रूरी न हो, घर में हर जगह बत्ती बुझाने और बैटरी चार्ज करने के केबल खींच कर बिजली बचाने लगी. माता-पिता ने जब जब पूछा कि यह क्या तमाशा है, तो ग्रेटा ने उन्हें बताया कि जलवायु-परिर्तन की रोकथाम में बिजली की बचत भी एक बड़ा योगदान है. यही नहीं, ग्रेटा पेट्रोल या डीज़ल से चलने वाली कारों में बैठने और हवाई यात्राएं करने से भी मना करने लगी.
तभी से वह दूर की ज़रूरी यात्राएं ट्रेन से करती है. उसकी ज़िद के आगे झुकते हुए माता-पिता को इलेक्ट्रिक कार ख़रीदनी पड़ी. अपने रहन-सहन तथा खान-पान को पूरी तरह बदलना पड़ा. ग्रेटा के पिता एक रंगमंच अभिनेता और मां अंतरराष्ट्रीय ख्याति की एक ऑपेरा गायिका हैं. तीन साल पूर्व दोनों को मांसाहार त्याग कर ग्रेटा की ही तरह शुद्ध शाकाहारी बनना पड़ा. मता-पिता भी हवाई यात्राएं नहीं कर सकते, इसलिए मां को ऑपेरा गायकी के लिए अन्य देशों में जाना बंद करना पड़ा.
‘मैं चीजें पूरी तरह काली या सफ़ेद देखती हूं’
यह पूछने पर कि क्या मात-पिता से इतना बड़ा त्याग करवाने के बदले किसी समझौते की गुंजाइश नहीं थी, जर्मन टीवी नेटवर्क ‘एआरडी’ से ग्रेटा ने कहा, ‘ नहीं थी. मैं चीजें या तो पूरी तरह काली या सफ़ेद देखती हूं. मेरे विचार से या तो आप टिकाऊ क़िस्म के हैं या डगमग क़िस्म के. टिकाऊ भी हैं और डगमग भी, यह नहीं हो सकता. दूसरे लोग साल-दो साल में छुट्टियों में कहीं जाने के लिए हवाई जहाज़ ले सकते हैं. पर मैं ऐसा नहीं कर सकती. ऐसे नहीं जी सकती कि खुद तो हवाई जहाज़ से उड़ती फिरूं और दूसरों से कहूं कि हवाई यात्राएं मत करो, क्योंकि हवाई उड़ानें भारी मात्रा में तापमानवर्धक कार्बनडाई-ऑक्साड के उत्सर्जन का कारण बनती हैं.’
जलवायु के भले के लिए ही ग्रेटा न तो नये कपड़े ख़रीदती है और न क्रिसमस के उपहार चाहती है. पर वह यह भी कहती है, ‘मैं दूसरों से आग्रह नहीं करती कि वे भी मेरी ही तरह रहें. मैं जो कहती और करती हूं, उसका उद्देश्य लोगों में जलवायु-परिवर्तन के कारणों के प्रति चेतना जगाना है. उन्हें बताना है कि वे स्वयं भी इस बारे में जानकारी जुटायें. समझें कि स्थिति क्या और कैसी है. तथ्यों को जब जानेंगे, तब स्वयं ही तय करेंगे कि वे ज़रूरी त्याग कर सकते हैं या नहीं. मेरी आंखों के सामने हमेशा एक ग्राफ़ होता है कि तापमान बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन में प्रतिवर्ष कितनी कमी आनी चाहिये, ताकि जलवायु-परिवर्तन की गति को बढ़ने से रोका जा सके. मैं चाहती हूं कि मेरा देश भी इस पर ध्यान दे.’
माता-पिता सहमत नहीं थे
ग्रेटा ने बताया कि उसके माता-पिता नहीं चाहते थे कि वह हर शुक्रवार के दिन पढ़ाई छोड़ कर संसद भवन के सामने धरना देने बैठ जाये. उसका कहना था, ‘जब मैंने पहली बार उन्हें बताया, तो पहले से अच्छी तरह सोच कर योजना बना ली कि मैं उनसे क्या कहूंगी. वे मुझसे सहमत नहीं थे. नहीं मान रहे थे कि मैं जो करना चाहती हूं, वह हम सबके हित में है. उन्होंने कहा, क्या तुम्हें पक्का विश्वास है कि तुम्हें यही करना चाहिये. क्या कोई दूसरा काम तुम नहीं कर सकतीं. मैंने कहा, मैं तो यही करूंगी, आपलोग सहमत हों या नहीं. वे मुझे रोक नहीं सकते थे. मैंने समझाया कि मैं क्यों ऐसा कर रही हूं. उनकी समझ में भी आय़ा. पर माता-पिता के तौर पर वे अब भी नहीं मानते कि मैं जो कर रही हूं, वह मेरे लिए सही काम है.’
किसी सनक की सीमा तक जाते अपने दृढ़निश्चय और अपने ध्येय के प्रति किसी आस्था की सीमा तक पहुंचते समर्पणभाव के बारे में 16 साल की कच्ची आयु में ही ग्रेटा कहने लगी है कि ‘मैं यथार्थवादी हूं. तथ्यों को देखती हूं. जानती हूं कि क्या करने की ज़रूरत है. मुझे अपने काम के प्रति कोई संदेह नहीं है. मैं, बस, कर रही हूं. यदि मैं कुछ करने का मन बना लेती हूं, तो उसे करके ही रहती हूं. आगा-पीछा नहीं करती. मैंने अनेक वैज्ञानिकों से बातें की हैं. अनेक रिपोर्टें और लेख पढ़े हैं. भलीभांति जानती हूं कि जलवायु-परिवर्तन की स्थिति कितनी गंभीर है. बार-बार महसूस होता है कि यदि मैं अभी कुछ नहीं करती, तो बाद में पछताऊंगी.’
बड़े-बड़े नेताओं को ललकारा
स्विट्ज़रलैंड के शहर दावोस में हर वर्ष जनवरी में होने वाले ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’ में दर्जनों देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक भाग लेते हैं. 2019 के सम्मेलन में ग्रेटा तुन्बेर्ग भी आमंत्रित थी. वहां उसने दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं और विशेषज्ञों को लगभग आदेशात्मक अंदाज में कहा, ‘मैं चाहती हूं कि जलवायु में हो रहे परिवर्तन की भयावहता को देख कर आप लोग भी पैनिक (संत्रास) महसूस करें! मैं चाहती हूं कि आप लोग भी वो डर महसूस करें जो मुझे हर दिन लगता है!’
अपने डर के असली कारण के बारे में ग्रेटा का कहना था कि जलवायु-परिवर्तन को वश में रख सकने का पेरिस समझौते वाला बिंदु दुनिया को शायद पीछे छोड़ चुका है. एक बार ऐसा हो जाने पर परिवर्तन को पीछे लौटाना संभव नहीं रह जायेगा. उसने कहा, ‘हम ये आशा नहीं कर सकते कि भविष्य में कोई ऐसा जादुई आविष्कार कर लेंगे कि सब कुछ ठीक हो जाये. हम उस जगह पहुंच गये हैं, जहां से तापमान में बढ़ोतरी अपने आप होती जायेगी.’ उसका मतलब है कि हमें अब अपनी सुखद निश्चिंतता के दायरे से बाहर निकलना होगा.
आलोचकों की राय
ग्रेटा के आलोचकों की राय है कि उसकी कच्ची आयु के अलावा उसे ‘अस्पेर्गर सिंड्रोम’ नाम की एक मानसिक बीमारी भी है और उसकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिये. इस मानसिक दोष वाला व्यक्ति आम तौर पर किसी एक विषय पर केंद्रित होकर बात करता है. एक जैसा व्यवहार वह बार-बार दोहराता है. नजरें मिलाकर बातें नहीं करता है. थोड़ी उलझन में भी रहता है. सामान्य-सी बातों पर बहस करना, छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो जाना और खानपान में भी विशेष रुचि नहीं होना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण बताये जाते हैं.
ग्रेटा इसे छिपाती नहीं कि उसमें यह मानसिक विकार है. उसका कहना है, ‘यदि मुझे यह बीमारी नहीं होती, तो मैं भी वैसी ही (पाखंडी) होती, जैसे दूसरे लोग हैं. वैसे ही काम करती, जैसे दूसरे लोग करते हैं. मैं भी निश्चिंत हो कर मौज़-मस्ती करती. लेकिन मैं अलग हूं. सोचती अलग हूं. काम अलग ढंग से करती हूं. कहने को दूसरे लोग भी कहते हैं कि जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम बहुत महत्वपूर्ण विषय है. पर उनके रहन-सहन का ढर्रा पहले जैसा ही बना हुआ है. मैं इन दोहरे मानदंडों को समझ नहीं पाती. यदि मुझे कोई चीज़ महत्वपूर्ण लगती हैं, तो मैं अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा उसी में लगा देती हूं. मुझसे नहीं हो पाता कि मैं कहूं कुछ, करूं कुछ और.’
‘मैं किसी के हाथ की कठपुतली नहीं हूं’
आलोचक यह भी कहते हैं कि ग्रेटा अपने भाषण खुद नहीं लिखती, उसकी डोर किन्हीं दूसरे लोगों के हाथों में है. ऐसे आरोपों को वह उसे नीचा दिखाने की कोशिश करने वालों की निहायत घटिया बातें बताती है. ग्रेटा कहती है, ‘वे ऐसा माने बैठे हैं कि उनके सिवाय कोई दूसरा अच्छे काम कर ही नहीं सकता. मैं किसी के हाथ की कठपुतली नहीं हूं. अपने भाषण खुद लिखती हूं. हां, कभी-कभी वैज्ञानिकों के बताये तथ्य और आंकड़े ज़रूर इस्तेमाल करती हूं, ताकि सब कुछ सही हो, सही-सही समझा जाये. शुरू-शुरू में मैं इन झूठी बातों से दुखी हो जाती थी. लेकिन, समय के साथ मुझे समझ में आने लगा कि मैं ऐसी बातें रोक नहीं सकती. उनके ऐसा कहने का मेरे लिये यही अर्थ है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका असर होने लगा है. कुछ लोग अपने क्षुद्र स्वार्थों को अब ख़तरे में देखने लगे हैं.’
ग्रेटा यह भी भलीभांति जानती है कि वह मीडिया में सदा इसी तरह चर्चा में नहीं बनी रहेगी. उसका कहना है, ‘मेरा लक्ष्य इतना ही है कि मुझ से जलवायुरक्षा के लिए जितना बन पड़े, उतना मैं कर लूं. कुछ लोग कहते है कि मेरा मिशन फ़ेल हो जायेगा. मेरा मिशन इतना ही है कि मुझसे जितना बन पड़े, इस दुनिया को जीने-रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने का प्रयास करूं. दुनिया को (2015 के) पेरिस समझौते के अनुकूल बनाने की कोशिश करूं. मैं या कोई अकेला व्यक्ति इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता. इसके लिेए बहुत सारे लोगों को मिल कर सहयोग करना होगा.’
वैचारिक स्पष्टता और परिपक्वता
ग्रेटा की मातृभाषा स्वीडिश है - अंग्रेज़ी से उतनी ही अलग एक यूरोपीय भाषा जितनी हिंदी से अलग तेलगू या मलयालम है. नौंवी कक्षा की छात्रा होते हुए भी अंग्रेज़ी भाषा पर उसकी पकड़, शब्दों का सूक्ष्म-सटीक चयन और विस्तृत शब्दभंडार, वैचारिक स्पष्टता और परिपक्वता, हाज़िरजवाबी और हज़ारों लोगों के सामने निर्भीकतापूर्वक धाराप्रवाह बोल सकने की उसकी क्षमता ग़ज़ब की है. 16 साल की छोटी सी उम्र और मात्र छह महीनों में ही ग्रेटा वैश्विक युवा पीढ़ी की एक ऐसी प्रवक्ता और संभवतः नेता भी बन गयी है, जिसकी– कम से कम उस पश्चिमी जगत में – सर्वत्र चर्चा है, जो जलवायु-परिवर्तन के लिए सब से अधिक दोषी है.
बड़े-बड़े सत्ताधारी ग्रेटा तुन्बेर्ग की बातें ध्यान से सुनते हैं, भले ही उससे सहमत न हों. उसके अडिग संकल्पों और त्यागपूर्ण सीधी-सादी जीवनशैली में कई बार महात्मा गांधी वाला वह सत्याग्रह झलकता है, जो ब्रिटिश दासता से भारत को मुक्ति दिलाने का उनका मूलमंत्र कहलाया. गांधीजी को तो नोबेल शांति पुरस्कार कभी नहीं मिला. हो सकता है कि ग्रेटा तुन्बेर्ग को वह इसी साल या अगले कुछ वर्षों में ही मिल जाये.
नोबेल शांति पुरस्कार की संभावना
नोबेल शांति पुरस्कार पाने के उपयुक्त लोगों के नाम हर साल जनवरी महीने के अंत तक सुझाये जा सकते हैं. इस बार स्वीडिश संसद के तीन सांसदों तथा जर्मनी और नॉर्वे के एक-एक सांसद ने नॉर्वे की नोबेल शाति समिति से ग्रेटा तुन्बेर्ग को 2019 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की विधिवत अनुशंसा की है. ग्रेटा ने उनकी इस पहल के लिए आभार प्रकट करते हुए उसे ‘अविश्वसनीय और किंचित असाधारण’ भी बताया है. 2019 के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ग्रेटा को स्वीडन की सबसे महत्वपूर्ण महिला चुना गया और 30 मार्च को उसे बर्लिन में जर्मनी के मनोरंजन जगत के ‘गोल्डन कैमरा’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
ग्रेटा के ‘फ़्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ आंदोलन का अब तक का सबसे बड़ा विश्वव्यापी प्रदर्शन शुक्रवार 15 मार्च 2019 को हुआ. भारत सहित विश्व के 100 अधिक देशों के 1700 से अधिक शहरों में किंडरगार्टन से लेकर प्राइमरी और हाईस्कूल तक के 14 लाख बच्चे उनमें शामिल हुए. जर्मनी और उसके पड़ोसी देशों ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड के क़रीब 20 हज़ार वैज्ञानिकों ने उस दिन एक वक्तव्य जारी कर प्रदर्शनकारी बच्चों की मांगों का समर्थन किया.
जर्मनी के राष्ट्रपति की सराहना
यहां तक कि जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने भी पहली बार मुक्त भाव से इन प्रदर्शनों की सराहना करते हुए कहा, ‘बहुत-से वयस्क अभी भी समझ नहीं पाये हैं कि घड़ी 12 बजने में केवल पांच मिनट कम दिखा रही है.’ जर्मन के नोएम्युन्स्टर शहर में धरना दे रहे स्कूली बच्चों के एक समूह से उन्होंने कहा कि बात केवल जलवायु को ही बचाने की नहीं है, महासागरों की रक्षा भी जलवायुरक्षा से जुड़ी हुई है. जर्मन राष्ट्रपति का इन बच्चों से कहना था, ‘इसीलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तुम लोग बार-बार याद दिलाते रहो कि हम कुछ करें. हमें (राजनीति में) दखल देने वाले तुम्हारे जैसे युवाओं की ज़रूर है.’
दूसरी ओर जर्मनी ही नहीं, लगभग सभी देशों के शिक्षामंत्री और अधिकारी परेशान हैं कि बच्चों के इस ‘दखल’ से हर दिन नियमित रूप से स्कूल जाने का नियम भंग हो रहा है. हर सप्ताह उनकी एक दिन की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. अधिकतर माता-पिता बच्चों के इस आंदोलन के पक्ष में हैं. यथासंभव वे भी प्रदर्शनों में उनके साथ चलते हैं. पर कुछ माता-पिता उनकी पढ़ाई में कमी रह जाने की चिंता से व्यथित भी हैं.
भविष्य हमारा दांव पर है, न कि बड़ों का
बच्चों का कहना है कि भविष्य उनका दांव पर है, न कि उन बड़ों का, जो अपना जीवन काफ़ी-कुछ जी चुके हैं. उनका तर्क है कि स्कूल नहीं जाने से शुक्रवार वाले जो विषय छूट जाते हैं, उनकी कमी स्वाध्याय द्वारा या अन्य तरीकों से काफ़ी कुछ पूरी की जा सकती है. लेकिन, जलवायु-परिवर्तन को यदि अभी ही रोका नहीं गया तो बाद में अनिष्टकारी विभीषिकाओं को झेलते हुए हमें ही आजीवन पछताना पड़ेगा.
‘फ़्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ आंदोलन से उत्साहित बच्चे जलवायु के साथ-साथ राजनैतिक और सामाजिक प्रश्नों में भी दिलचस्पी लेने लगे हैं. उनका कोई संगठन नहीं है. वे अपनी स्वायत्त टोलियों में इंटरनेट पर अपनी वेबसाइट बना कर, ट्विटर और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से या प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ बातचीत द्वारा अपने तर्क और विचार रखते हैं. अब तक राजनीति के प्रति उदासीन रहे इन युवाओं की इस सक्रियता से बहुत से राजनीतिज्ञ असहज होने लगे हैं. वे कह रहे हैं कि बच्चों को राजनीति से दूर रह कर पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिये. बच्चों की नजर में ये वही राजनीतिज्ञ हैं, जिनकी अल्पकालिक आर्थिक लाभ वाली नीतियों ने सदियों तक चलने वाले जलवायु-परिवर्तन को न्यौता दिया है.
‘अच्छी परिस्थितियां बनाये या विफल हो जायें’
ग्रेटा तुन्बेर्ग ऐसे राजनीतिज्ञों और शासकों से कहती है, ‘मानव जाति का भविष्य आप ही के हाथों में है. आप ही के पास यह सामर्थ्य है कि आर्थिक हितों को दरकिनार करते हुए भावी पीढ़ियों के जीवनयापन के लिए या तो अच्छी परिस्थितियां सुनिश्चित करें, या फिर जैसा है वैसा ही चलने दें और विफल हो जायें.’ दिसंबर 2018 में पोलैंड के कातोवित्स में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायुरक्षा सम्मेलन के समय उसने राजनेताओं पर यह कहते हुए कड़ा प्रहार किया, ‘उनका व्यवहार बच्चों की तरह अनुत्तरदायित्वपूर्ण है. इसलिए अब युवा पीढ़ी को अपना भविष्य अपने हाथों में लेना और वह काम ख़ुद करना होगा, जिसे राजनेताओं को बहुत पहले ही कर देना चाहिये था.’
ग्रेटा के इसी आग्रह को ‘फ़्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर’ आंदोलन के जर्मन छात्रों द्वारा जर्मन सरकार के नाम एक मांगपत्र में भी देखा जा सकता है. उसमें छात्रों ने लिखा है कि कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद होनी चाहिये. कोयले पर आधारित एक-चौथाई तापबिजलीघर 2019 के अंत तक बंद कर दिये जायें. कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन पर कर लगा कर उसे मंहगा कर दिया जाये. तापमानवर्धक अन्य गैसों के उत्सर्जन को भी उतना ही महंगा कर दिया जाये, जितना उनके कारण भावी पीढ़ियों पर आर्थिक बोझ पड़ेगा. यह लागत क़रीब 180 यूरो प्रतिटन हो सकती है. इन छात्रों की यह भी मांग है कि 2035 तक सारी बिजली सौर और पवन ऊर्जा जैसे केवल नवीकरणीय स्रोतों से प्रप्त की जाये. यह मांगपत्र तैयार करने में जर्मनी के कई वैज्ञानिकों ने छात्रों का मार्गदर्शन किया है.
माता-पिता का ‘पैरेन्ट्स फ़ॉर फ़्यूचर’
जलवायु को लेकर अपने बच्चों की चिंता का समर्थन करने वाले यूरोपीय माता-पिता भी ‘पैरेन्ट्स फ़ॉर फ़्यूचर’ नाम से एकजुट होने लगे हैं. वे चाहते हैं कि हर शुक्रवार को प्रदर्शन करने या धरना देने वाले उनके बच्चों के विरुद्ध दंडात्मक या अनुशासनामत्क कर्रवाइयां न हों. उनके बच्चे किसी मौज़-मस्ती के चक्कर में नहीं, समाज को जगाने और अपने भविष्य को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. इस बात को अब झुठलाया नहीं जा सकता कि जलवायु-परिवर्तन मानव जाति के अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा अस्तित्वनाशक संकट है.
कितनी विचित्र पर सुखद बात है कि जलवायु-परिवर्तन के प्रति विश्वव्यापी चेतना का जो अलख संयुक्त राष्ट्र जैसी एक विश्व संस्था भी नहीं जगा पायी, वही काम मुश्किल से 16 साल की एक ऐसी लड़की ने केवल छह महीनों में कर दिखाया, जो ऐसा सोच ही नहीं रही थी और जिसे अस्पेर्गर नाम की एक मानसिक बीमारी भी है. उसका कहना है कि उसे यदि यह बीमारी नहीं होती, तो वह पूरी तन्मयता और समर्पणभाव से यह काम नहीं कर पाती.
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