पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के हरदोई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनावी रैली थी. इस दौरान एक असामान्य घटना हो गई. आदित्यनाथ के हेलिकॉप्टर ने लैंड किया ही था कि तभी एक आवारा सांड रैली स्थल पर घुस आया. इससे लोगों में भगदड़ मच गई. प्रशासन ने अब इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं.

लेकिन मुख्यमंत्री को हुई एक दिन की यह परेशानी उत्तर प्रदेश के आम लोगों के लिए रोज की बात है. राज्य में छुट्टा पशुओं की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. ग्रामीण इलाकों के किसान इन पशुओं के कारण अपनी फसल बचाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. मगर किसी एक रात की जरा सी चूक भी उनकी सारी मेहनत चौपट कर देती है और सुबह खेत में फसल की जगह तबाही का मंजर दिखता है. सब कुछ सहते जाने की आदी किसान बिरादरी इस समस्या से अपने अपने स्तर पर निपटने की कोशिश कर रही है. ग्रामीण रात-रात भर फसलों की रखवाली कर रहे हैं. फसल तबाह हो जाने पर खून के आंसू पी रहे हैं.

लेकिन गोवंश और अन्य छुट्टा पशुओं के प्रति गुस्से, कड़वाहट और नफरत के बावजूद यह चुनाव का निर्णायक मुद्दा बनता नहीं दिखता. चुनावों की घोषणा से पहले यह माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आवारा और छुट्टा पशु बड़ा मुद्दा होंगे. लेकिन राष्ट्रवाद की हवा ने इस मुद्दे को गौण बना दिया है. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए यह फिलहाल थोड़ी राहत की बात हो सकती है. मगर यह समस्या ग्रामीण समाज को गहरी पीड़ा भी दे रही है और नए सवालों को जन्म भी.

आवारा और छुट्टा पशुओं की बढ़ती संख्या और उसके कारण ग्रामीण इलाकों में पैदा हो रही नई नई समस्याओं के निदान के लिए योगी सरकार ने इसी साल ग्रामीण और शहरी इलाकों में पशु आश्रय या गौशालाएं बनाने की योजना शुरू की थी. जाड़ों के दिनों में जब फसलें हरी थीं, तो उस समय छुट्टा पशुओं द्वारा उन फसलों की बर्बादी से आक्रोशित ग्रामीणों ने उत्तर प्रदेश के अनेक इलाकों में छुट्टा पशुओं को सरकारी स्कूलों, पंचायत घरों और अन्य इमारतों में बंद कर दिया था. कानून व्यवस्था का मुद्दा बन जाने के कारण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिला प्रशासन और पुलिस को इन पशुओं को पकड़ने और अस्थाई आश्रय स्थलों में रखने के निर्देश दिए थे. 10 जनवरी इसके लिए अंतिम तारीख तय की गई थी.

लेकिन पुलिस प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद बड़ी संख्या में छुट्टा पशु पकड़े नहीं जा सके. उत्तर प्रदेश सरकार के अपने ही आंकड़ों पर जाएं 31 जनवरी 2019 तक 7,33,601 पशु छुट्टा या निराश्रित थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बावजूद जनवरी के आखिर तक पशुपालन विभाग ने कुल 2,77,901 निराश्रित पशुओं के लिए ही स्थाई अथवा अस्थाई आश्रय स्थलों का इंतजाम हो पाने की बात स्वीकार की है. वर्तमान में यह आंकड़ा साढ़े तीन लाख के आस-पास पहुंच गया है. फिर भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग पांच लाख पशु अभी भी छुट्टा घूम रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञ इसे भी कम ही बताते हैं. उनके मुताबिक प्रदेश की 59 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में यदि हर पंचायत में छुट्टा पशुओं की संख्या 20 भी मान ली जाय तो आंकड़ा 12 लाख से ऊपर पहुंचता है.

योगी सरकार के आने के बाद बूचड़खानों पर प्रतिबंध और और कथित गौरक्षकों की गुंडई के चलते ऐसे पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. ऐसे छुट्टा पशुओं के झुंड अब ग्रामीणों को आतंकित भी करने लगे हैं. लेकिन समस्या एकतरफा ही नहीं है. किसानों की तरह ही छुट्टा पशुओं के लिए भी स्थितियां विकट होती जा रही हैं. पहले गांवों में चरागाह होते थे. लेकिन अब अवैध कब्जों, राजनीतिक दबंगई, खनन माफिया आदि के कारण ये सिकुड़ते जा रहे हैं. 2013-14 के राजस्व विभाग के आंकड़ों पर जाएं तो राज्य में चरागाहों के अन्तर्गत 65 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन थी. वर्तमान में यह 15 से 20 फीसदी सालाना की दर से कम से कम होती जा रही है.

उन्नाव के पुरवा इलाके के किसान राम खिलावन कहते हैं, ‘गाएं जब दूध देना बंद कर देती हैं, बूढ़ी हो जाती हैं तब किसान उन्हें छोड़ देते हैं. बूचड़खानों पर रोक है. पशुबाजारों में भी काम होता नहीं. अब बेकार पशुओं को कोई पाले भी तो कैसे. बछड़े तो और भी बड़ी समस्या हैं. वे किसी काम तो आते नहीं इसलिए उन्हें भी छोड़ दिया जाता है. उन्हें घर बिठा कर चारा खिलाना कोई नहीं चाहता.’

उन्नाव के ही एक अन्य ग्राम प्रधान देवेंद्र सिंह मानते हैं कि पशुओं के लिए भी समस्याएं कम नहीं हैं. जब किसान उन्हें छोड़ देते हैं तब वे अपने खाने के लिए कभी फसलों पर मुंह मारते हैं और कभी ग्रामीणों के चारे पर, जो उन्होंने अपने पालतू पशुओं के लिए जमा किया होता है. वे कहते हैं, ‘गलती तो हम लोगों की भी है. हम भी तो अपना काम निकालने के बाद पशुओं को भूखा मरने के लिए छोड़ देते हैं. सरकार को पशुओं को छुट्टा छोड़ने पर कानूनी रोक लगानी चाहिए.’

योगी आदित्यनाथ सरकार ने फसलों को छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए किसानों को कांटेदार तार लगाने के लिए तारबंदी अनुदान देने की एक योजना चलाई थी. इसके तहत कम से कम पांच किसानों के समूह को 10 हेक्टेयर या अधिक खेती के लिए प्रति किसान 400 मीटर कंटीला तार लगाने के लिए 50 फीसदी तक अनुदान दिया जाता है. यह अधिकतम 40 हजार रुपए तक होता है. इस अनुदान योजना के कारण बहुत से किसानों ने अपने खेतों को तारबाड़ से सुरक्षित रखने का प्रयास किए हैं. बहुत से किसानों ने अपने दम पर व्यक्तिगत स्तर पर भी तारंबदी की है. लेकिन इससे भी समस्या हल हो नहीं पा रही. भूख से विकल पशु इस तारबाड़ को भी पार कर लेते हैं. रात में अंधेरे में तारबाड़ को ठीक से देख न पाने के कारण वे खेतों में घुसने की कोशिश करते हैं. इस कोशिश में कई बार वे बाड़ को पार तो कर लेते हैं लेकिन इस प्रयास में कंटीले तारों से उनकी खाल बिंध जाती है, बड़े बड़े घाव हो जाते हैं.

लखीमपुर खीरी के किसान दुष्यंत वर्मा कहते हैं, ‘हम तो गाय को पूजते हैं. हम बिलकुल ऐसा नहीं चाहते कि वे कंटीले तारों से घायल हों. लेकिन क्या करें, मजबूरी है. आखिर हमें अपनी फसल भी तो बचानी है.’ लेकिन सारे किसान उनकी तरह नहीं सोचते. बहुत से किसान यह भी कहते हैं कि आज की परिस्थिति में किसान गाय को माता नहीं बल्कि सिरदर्द और बहुत बड़ी आफत मानने लगा है.

उधर, राज्य सरकार गायों को बचाने की बात तो करती है मगर उसकी नीतियों में बड़े अन्तर्विरोध हैं. फरवरी 2019 में अपने तीसरे बजट में योगी सरकार ने आवारा और छुट्टा पशुओं के लिए 612.6 करोड़ रुपये का इंतजाम किया था. इसमें से 248 करोड़ ग्रामीण क्षेत्रों में गोवंश के रखरखाव और गौशाला निर्माण के लिए थे. बजट से पहले भी इस काम के लिए 170.5 करोड़ दिए गए थे. लेकिन आरोप है कि इस रकम का बड़ा हिस्सा दलाल खा गए.

उत्तर प्रदेश के पशुपालन मंत्री एसपी सिंह बघेल ने छुट्टा पशुओं के लिए एक योजना बनाई है. इसके तहत पांच बीघा या अधिक भूमि वाले ग्रामीण गोसंरक्षण के लिए गौशालाएं खोल सकते हैं. 200 पशुओं तक की क्षमता वाली इन गौशालाओं को राज्य सरकार 30 रुपये प्रति दिन, प्रति पशु देगी यानी 200 पशुओं पर प्रति दिन 6000 रुपए. इस योजना के प्रति किसी ने भी बहुत रुचि नहीं दिखाई क्योंकि प्रति पशु 30 रुपए की राशि बहुत कम है.

पशुपालन विभाग के निदेशक चरण सिंह यादव बताते हैं, ‘पहले बड़े मवेशियों के लिए 50 और छोटे पशुओं के लिए 25 रुपए रोज खुराक खर्च के लिए दिए जाते थे. लेकिन अब अलग अलग रकम के बजाय हर मवेशी के लिए 30 रुपए रोज दिए जाएंगे. अब सबका बजट एक कर दिया गया है. इससे गो आश्रय स्थल चलाने वाली संस्थाओं पर संकट आ गया है क्योंकि चारा भूसी के बाजार मूल्य के हिसाब से प्रति पशु प्रतिदिन लगभग 100-110 रुपए का खर्च आता है.’

उत्तर प्रदेश में इस समय 5500 अधिक अस्थाई पशु आश्रय स्थल हैं जिनमें तीन लाख से अधिक पशु हैं. शहरी क्षेत्रों में 91 कान्हा गो आश्रयों के सामने भी इसी तरह के संकट आ गया है. गर्मियां बढ़ने के साथ पानी का इंतजाम भी एक बड़ी समस्या होने वाला है. अस्थाई आश्रम स्थलों में भूख अथवा चारे की कमी से मरने वाले पशुओं की तादाद भी लगातार बढ़ रही है. लोकसभा चुनावों में राष्ट्रवाद की आंधी के कारण छुट्टा पशुओं की समस्या भले ही बड़ा मुद्दा न बन पाए मगर इतना तो तय है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा योगी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनने जा रहा है. सरकार समस्या को लखनऊ के दफ्तरों में बैठ कर सुलझाना चाहती है लेकिन इस समस्या का समाधान वहीं खोजा जा सकता है जहां यह पैदा हो रही है.