भारत में वाहन संबंधी वायु प्रदूषण के कारण 2015 में साढ़े तीन लाख बच्चे दमा का शिकार बने. चीन के बाद इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला भारत दूसरा देश बन गया है.

पीटीआई के मुताबिक दुनिया की प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका ‘द लांसेट प्लैनटेरी हेल्थ जर्नल’ में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आयी है. इस अध्ययन में 194 देशों और दुनिया भर के 125 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया था.

अध्ययन के मुताबिक हर साल बच्चों में दमा के दस में से एक से ज्यादा मामले को वाहन संबंधी प्रदूषण से जोड़ा जा सकता है. इन मामलों में से 92 प्रतिशत मामले ऐसे इलाकों के हैं, जहां यातायात प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देश स्तर से नीचे है.

अमेरिका स्थित जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ सुसान अनेनबर्ग ने इस अध्ययन पर बात करते हुए मीडिया से कहा, ‘हमारे निष्कर्षों से पता लगा है कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से होने वाला प्रदूषण बचपन में दमा की बीमारी के लिए ज्यादा जिम्मेदार है. यह विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के लिए चिंता का विषय है.’

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश पर पुनर्विचार करने की जरूरत है. सुसान अनेनबर्ग के मुताबिक यातायात उत्सर्जन को कम करने के लिए भी एक लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए.

इस अध्ययन से जुड़े जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रमुख शोधकर्ता प्लॉय अचकुलविसुत के मुताबिक उनके अध्ययन में यह संकेत भी मिला कि वाहन संबंधी वायु प्रदूषण को कम करने के लिये नीतिगत पहल से बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भी कम किया जा सकता है.