लोकसभा चुनावों की सरगर्मी चरम पर है. दोनों मुख्य राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस अपना घोषणापत्र जारी कर चुके हैं. दोनों पार्टियां अपने चुनाव प्रचार में एक-दूसरे के घोषणापत्रों पर बिंदुवार या गंभीरता से बात कर रही हों ऐसा तो नहीं दिख रहा है, लेकिन अगर घोषणापत्र जारी करने के समय और तैयारी को देखा जाए तो कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव में ज्यादा व्यवस्थित नजर आती है. उसने चुनाव शुरू होने से काफी दिन पहले अपना घोषणापत्र जारी किया और इसमें न्यूनतम आय योजना (न्याय) जैसे कार्यक्रमों का वादा कर चौंकाया भी. कांग्रेस के घोषणापत्र को पढ़ने पर इस बार उसमें एक तरतीब और उसे तैयार करने में की गई मेहनत नजर आती है.

लेकिन, अपने प्रचार को राष्ट्रवादी भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समेट चुकी भाजपा अपने घोषणापत्र को लेकर वैसी गंभीर नहीं दिखती जैसी वह 2014 के लोकसभा चुनाव में थी. भाजपा का घोषणापत्र पहले चरण के चुनाव से कुछ दिन पहले ही आया और उसमें भी कश्मीर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ही ज्यादा जोर रहा.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आमतौर पर सत्ताधारी दल अपने घोषणापत्र में बहुत लंबे-चौड़े वादे करता भी नहीं है क्योंकि पांच साल तक सरकार चलाने वालों से यह सवाल पूछा ही जाता है कि इस कार्यक्रम या घोषणा पर अब तक अमल क्यों नहीं किया गया. भाजपा के संकल्प पत्र पर भी यह बात लागू होती है. पार्टी इस बार किसान, युवा और रोजगार जैसे मुद्दों पर बहुत स्पष्ट वादे करती नजर नहीं आती. बल्कि, पुलवामा और उसके बाद पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राइक के बाद बने माहौल में वह इन मुद्दों से बच निकलने की कोशिश मेंं ज्यादा दिखती है. कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35ए हटाने जैसे प्रावधानों को ही घोषणा पत्रों के मुख्य बिंदुओं के तौर पर पेश किया जा रहा है. बहुत से लोगों के मुताबिक भाजपा के घोषणा पत्र को पढ़ने से लगता है कि इसे जल्दबाजी में तैयार किया गया है और इसमें औपचारिकता ही ज्यादा निभाई गई है.

कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्रों की तुलना की जाए और उन्हें विशुद्ध आर्थिक नजरिये से देखा जाए तो उनमें एक समानता भी नजर आती है. घोषणाओं को आमने-सामने रखकर देखने के बजाए अगर उनके पीछे के विचार पर गौर किया जाए तो दोनों पार्टियों का आर्थिक दर्शन एक जैसा लगता है. दोनों ने वोटरों को लुभाने के लिए लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों की घोषणा के वादे बिना यह सोचे-विचारे किए हैं कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा. राजनीति में लोक-कल्याणकारी दौर की पुरजोर वापसी का मूल विचार दोनों के घोषणापत्र में मिलता है, जिसे आलोचना के तौर पर एक तरह का तात्कालिक लोकलुभावनवाद भी कहा जा सकता है.

मार्च में आए अंतरिम बजट के दौरान ही भाजपा सरकार ने परंपरा तोड़ते हुए दो एकड़ से कम जोत वाले किसानों को साल में छह हजार रूपये देने की योजना शुरू की थी. इसके जवाब में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में गरीब परिवारों को सालाना 72,000 रुपये देने की बड़ी घोषणा की. हालांकि, पहले चर्चा थी कि भाजपा ऐसी ही किसी योजना की घोषणा अपने संकल्प पत्र में कर सकती है. लेकिन इस मामले में कांग्रेस ने बाजी मार ली और लोकलुभावन चुनावी राजनीति में न्याय (न्यूनतम आय योजना ) के रूप में ऐसा वादा किया, जिसका जवाब भाजपा अभी तक नहीं ढूंढ़ पाई है.

घोषणा पत्रों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ‘न्याय’ ऐसी योजना नजर आती है जो लोक कल्याणकारी वादों के मोर्चे पर भाजपा को पछाड़ देती है. कांग्रेस की ‘न्याय’ (न्यूनतम आय योजना) एक बड़़े खर्च (3.6 लाख करोड़ प्रति वर्ष) वाली घोषणा है. इसका क्रियान्यवयन कैसे होगा, यह एक अलग प्रश्न है. लेकिन चुनावी संभावनाओं के लिहाज से यह खासी प्रभावशाली दिखती है.

जानकार मानते हैं कि पुलवामा के बाद बने माहौल और न्यूनतम आय योजना की घोषणा में कांग्रेस के बाजी मार लेने के बाद भाजपा ने घोषणा पत्र की अपनी रणनीति बदली. उसने अपने घोषणा पत्र में केंद्रीय विचार के रूप में कश्मीर, राष्ट्रीय सुरक्षा और राम मंदिर जैसे मुद्दों को तरजीह दी. गरीबों, किसानों और युवाओं से वादे तो भरपूर किए गए लेकिन उनके किसी ठोस रूप पर चर्चा नहीं की गई.

लोक-लुभावनवाद दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के घोषणा पत्र में नजर आता है. लेकिन शायद कांग्रेस की ‘न्याय’ जैसी योजना की घोषणा के बाद भाजपा ने लोक-कल्याणकारी वादों की अपनी धार कम कर ली. गरीबों को साल में 72,000 हजार रुपये और मनरेगा के तहत 100 के बजाय 150 दिन का काम देने जैसे वादे कर कांग्रेस ऐसी नजर आ रही है, जैसे वह आर्थिक नीतियों के मामले में इंदिरा गांधी के जमाने वाली कांग्रेस की समाजवादी नीतियों पर चलने जा रही है.

रोजगार के मोर्चे पर भी कांग्रेस ने बड़ा वादा किया है और उसका मुख्य जोर सरकारी भर्तियों पर है. कांग्रेस ने कहा है कि वह राज्य सरकारों के साथ मिलकर खाली पदों पर जल्द से जल्द से जल्द नियुक्तियां करेगी. एक अनुमान के मुताबिक, केंद्र और राज्य सरकारों के खाली पद देखें जाएं तो ये नौकरियां 20 लाख बैठती हैं. 20 लाख सरकारी नौकरियां सरकारी खर्च को कितना बढ़ा देंगी, यह आर्थिक जानकारों के लिए चिंता की बात है. लेकिन, इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अभी से कुछ समय पहले तक ही केंद्रीय सरकारें नौकरियां कम करके सरकारी खर्च कम करने के सिद्धांत पर चल रहीं थीं और अब जोर सरकारी नौकरी देने के वादे पर है.

कांग्रेस ने स्वास्थ्य गारंटी जैसा वादा भी किया है. यह कैसी लागू होगी इस पर कुछ साफ नहीं है. लेकिन घोषणा पत्र में जिस अंदाज में स्वास्थ्य गारंटी की बात की गई, उससे लगता है कि यह निजी कंपनियों के इंश्योरेंस मॉडल पर आधारित नहीं होगा. तो क्या कांग्रेस सरकार बनने पर लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों को सरकार द्वारा चलाने की अवधारणा पर वापस आ रही है? शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में बजट बढ़ाने के कांग्रेस के वादे भी इसी दिशा में नजर आते हैं. आर्थिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस के पूरे घोषणा पत्र के वादों को अगर आर्थिक नीतियों के बरअक्स रखकर देखें तो पार्टी कम से कम आर्थिक सुधारों की अब तक की मान्यता से अलग हटती दिखती है. लोक कल्याण के कामों में सरकारी दखल और बजट बढ़ने के आसार कांग्रेस के घोषणा पत्र में साफ दिखते हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो युवाओं,गरीबों और किसानों के मुद्दों पर भाजपा भी लोकलुभावन ट्रैक पर ही दिखती है. हालांकि, रोजगार जैसे मोर्चे पर भारी आलोचना झेल चुकी नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा इस बार इन मसलों पर कोई बहुत ठोस वादा नहीं करती है. सरकारी नौकरियों पर वह बिल्कुल चुप्पी मारे हुए है. लेकिन, ‘न्याय’ की काट के तौर पर उसका जो सबसे प्रभावशाली वादा कहा जा सकता है, वह यह है कि पीएम किसान सम्मान योजना का दायरा बढ़ाया जाएगा और हर किसान को छह हजार साल की सीधी आर्थिक मदद दी जाएगी. किसान पेंशन की भी बात है, लेकिन वह क्या होगी, कैसे होगी इस पर संकल्प पत्र मौन है. यह वैसी ही हो सकती है जैसे कामगारों के लिए अंतरिम बजट में पेंशन योजना की घोषणा की गई थी. इसमें पात्र को एक निश्चित रकम का योगदान करना होगा और 60 साल बाद उसे पेंशन मिलेगी. लेकिन, यह वादा सांकेतिक ही ज्यादा लगता हैै.

रोजगार के मामले में भाजपा इस बार हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे के बजाय ‘उद्यमिता’ पर ज्यादा बात करती नजर आती है. सस्ते कर्ज का भी वादा किया गया है. विकास कर रहे 22 सेक्टरों में युवाओं के लिए रोजगार की बात कही गई है. यानी अपने स्वरूप में भाजपा का भी घोषणा पत्र कम लोक-लुभावन नहीं है. लेकिन भाजपा इसकी व्याख्या में फर्क करती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत ज्यादातर भाजपा नेता कांग्रेस की ‘न्याय’ योजना को अव्यावहारिक और मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली बताते हैं.

यह तो चुनावी भाषणों की बात है लेकिन अगर तुलना की जाए तो दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों में बहुत बारीक फर्क भी नजर आता है. कांग्रेस का घोषणा पत्र जहां, भारी-भरकम लोक-कल्याणी कार्यक्रमों के साथ ‘गरीबी हटाओ’ के पुराने नारे पर वापस लौटता दिखता है तो भाजपा का घोषणा पत्र लोक-लुभावनवाद के साथ उसे एक शहरी मध्यम वर्ग की चिंताओं के लिफाफे में पेश करता है. घोषणा पत्र से ज्यादा यह बात भाजपा नेताओं के भाषण में झलकती है, जिनमें वे मध्यम वर्ग को इस बात का डर दिखाते हैं कि कांग्रेस ‘न्याय’ जैसी योजना के लिए मध्यम वर्ग पर करों का बोझ डालेगी.

कांग्रेस और भाजपा दोनों के घोषणा पत्र लोकलुभावन घोषणाओं से भरे पड़े हैं और दोनों आर्थिक सुधार या राजकोषीय हालात पर कोई गंभीर बात करते नहीं दिखते. आर्थिक जानकार कहते हैं कि चुनावी आरोप-प्रत्यारोप की बात अपनी जगह है, लेकिन लोक-लुभावनवाद आर्थिक नीतियों में पुरजोर तरीके से अपनी वापसी कर चुका है. सामाजिक सुरक्षा और जीवन स्तर में सुधार के लिहाज से कांग्रेस और भाजपा दोनों के घोषणापत्र में कुछ अच्छी बातें भी हैं, पर इस मोर्चे पर बहुत कुछ आने वाली सरकार की नीति और नीयत पर निर्भर करता है. लेकिन इन सबके साथ अर्थशास्त्री यह चिंता भी जताते हैं कि अगर इन योजनाओं को ठोस मकसद के बजाय सिर्फ सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया तो आर्थिक सुधार बेलगाम हो सकते हैं और राजकोषीय हालत भी.