‘यह पुस्तक भारत के सर्वाधिक मस्तमौला, सम्मोहक और कुछ हद तक विवादास्पद राजनीतिक व्यक्तित्वों में शुमार एक हस्ती के बारे में है. दरअसल, ये सारी चीजें मिलकर उनकी इस कहानी को खास और दिलचस्प बनाती हैं.’ लालू प्रसाद यादव की आत्मकथा की प्रस्तावना में उनके बारे में ये बातें कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लिखी हैं.

भारत के राजनीतिक इतिहास में लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक यात्रा कई वजहों से बेहद खास है. सामाजिक न्याय के नेता के तौर पर उन्होंने बिहार में नए सामाजिक बदलावों का ताना-बाना बुना और पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों को समाज के अगड़े समुदाय के सामने तनकर खड़ा होने का साहस दिया. लेकिन इसी राजनीतिक यात्रा में वे जातिवाद की राजनीति में भी उलझे. भ्रष्टाचार के कई आरोप भी उन पर लगे और इनमें से कुछ में उन्हें दोषी भी पाया गया. ऐसे ही कुछ मामलों में सजा सुनाए जाने के बाद वे इस समय जेल में बंद हैं.

बिहार में खास जाति के बाहुबल को बढ़ावा देने का आरोप भी लालू प्रसाद यादव पर लगा. समाजवादी राजनीति से जन्मे लालू यादव ने सियासत में परिवारवाद को उसी तरह से बढ़ाया जिस तरह के दूसरी लगभग सभी पार्टियों के नेताओं पर लगते रहे हैं. उन्होंने सामाजिक न्याय की हमेशा बात की लेकिन जब न्याय करने की बारी उनकी खुद की पार्टी में आई तो वे कभी अपनी पत्नी राबड़ी देवी तो कभी अपने बेटे तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाते नजर आये.

इन सबके बावजूद लालू यादव एक करिश्माई राजनेता रहे हैं. उनका यह करिश्मा सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहा. खास वजहों से ही सही वे पूरे देश में लोकप्रिय हुए. देश के बाहर भी लोग हैं जिनकी दिलचस्पी उनमें रही है. उनकी सियासी धमक भी सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी वे अब तक प्रभावित कर रहे हैं.

ऐसे लालू यादव ने अगर अपनी आत्मकथा - ‘गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा’ - लिखी हैं तो उसका दिलचस्प होना स्वाभाविक है. इस किताब में विस्तार से उन्होंने बचपन से लेकर अब तक की यात्रा का जिक्र किया है. इसमें बिहार के मुख्यमंत्री और देश के रेल मंत्री के तौर पर उनकी कामयाबियों का जिक्र है और नाकामियों का भी. किताब में लालू यादव बार-बार खुद को वंचितों, अल्पसंख्यकों और हाशिये के लोगों का मसीहा पेश करते दिखते हैं. वे इसमें खुद को महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला के साथ-साथ राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की राजनीति को आगे बढ़ाने वाला भी मानते हैं.


आत्मकथा: गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा

लेखकः लालू प्रसाद यादव, नलिन वर्मा

प्रकाशकः रूपा पब्लिकेशंस

मूल्यः 295 रुपये


लालू यादव का राजनीतिक जीवन जितनी विविधताओं से भरा रहा है, उसकी आंशिक झलक ही इस पुस्तक में दिखती है तो यह इस किताब की कमी है. इसके अलावा यह भी लगता है कि चुनावों को देखते हुए इस पुस्तक को तैयार करने में काफी जल्दबाजी दिखाई गई है. लालू यादव की आत्मकथा की एक और बड़ी खामी यह है कि इसमें हर तरफ तेजस्वी यादव ही, उसी तरह से छाए हुए हैं जिस तरह से वे राष्ट्रीय जनता दल में प्रभावी हैं. तेजप्रताप यादव या उनकी बहन मीसा भारती समेत दूसरी बहनों के बारे में इस पुस्तक में कुछ खास नहीं दिया गया है. आम तौर पर भारत में कोई भी पिता अगर अपने दो बेटों के बारे में लिखता है तो उनका उल्लेख राम-लक्ष्मण के तौर पर करता है. लेकिन लालू यादव ने तेजस्वी और तेजप्रताप का उल्लेख कृष्ण-बलराम के तौर पर किया है. जाहिर है कि इसकी भी एक राजनीति है.

लालू यादव की इस आत्मकथा में सह लेखक के तौर पर पत्रकार और मीडिया शिक्षक नलिन वर्मा का नाम है. वे अंग्रेजी के पत्रकार रहे हैं और इसका असर आत्मकथा के इस हिंदी संस्करण पर भी दिखता है. कई जगह पढ़ते हुए यह साफ अहसास होता है कि देशज शब्दों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध लालू यादव की इस आत्मकथा को पहले अंग्रेजी में लिखा गया है और बाद में इसका अनुवाद हिंदी में किया गया है. लेकिन ऐसी कई खामियों के बावजूद लालू यादव की यह आत्मकथा पढ़ने लायक है. इस पुस्तक में उनसे संबंधित कई रोचक किस्से दिये गये हैं और इनमें से भी सबसे रोचक तीन किस्सों को नीचे दिया गया है जिनमें से एक-दो पर विश्वास कर पाना उतना आसान नहीं है.

1. आडवाणी को पत्नी से बात कराने के लिए हाॅटलाइन

1990 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी रथयात्रा पर जब निकले तो उन्हें लालू यादव ने ही बिहार में गिरफ्तार कराया था. इस बारे में अपनी आत्मकथा में लालू लिखते हैं, ‘नजरबंद रहते हुए आडवाणी ने एक विशेष अनुरोध किया कि वह अपनी पत्नी कमला आडवाणी से बात करना चाहते थे. उन्होंने कहा कि वह उन्हें मिस करते हैं और उनसे बातचीत किए बिना बेचैनी महसूस करते हैं. मेरे सामने अजीब दुविधा थी. यह एक राजनीतिक कैदी का - वह कोई अपराधी नहीं थे - मानवीय अनुरोध था. लेकिन यह भी हो सकता था कि वह अपनी पत्नी से कोई राजनीतिक बात साझा करें. अगर यह बात लीक हो जाए, तो उसके नतीजे भयावह हो सकते थे. आडवाणी की एक बात पर उनके समर्थक सड़क पर उतर सकते थे. मेरे सहयोगियों ने मुझे साफ शब्दों में सुझाया कि मैं आडवाणी का यह अनुरोध न मानूं. लेकिन मैं वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुरोध पर पिघल गया. पत्नी से बात करने के लिए जल्दी ही हाॅटलाइन की व्यवस्था की गई. आडवाणी दिन में दो बार उनसे बात करते थे.’

आडवाणी जब बात करते थे तो उस वक्त उस कमरे में बिहार सरकार के एक अधिकारी भी होते थे. उनकी उपस्थिति से आडवाणी शुरुआत में असहज रहते थे लेकिन बाद में वे सहज हो गए. इस दौरान आडवाणी के व्यवहार की तारीफ करते हुए लालू लिखते हैं, ‘नजरबंद रहते हुए आडवाणी ने संतुलन और भद्रता का परिचय दिया. अपनी बात पर अड़े रहने वाले इस व्यक्ति की अपनी छवि थी. यह खबर किसी तरह लीक हो गई कि नजरबंद आडवाणी दिन में दो बार अपनी पत्नी से बात करते हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार ने कमला आडवाणी से अनुरोध किया कि जब वह आडवाणी से बात कर रहे हों, तब वह उनका इंटरव्यू लेना चाहते हैं. एक नियत दिन पर जब पति-पत्नी के बीच हाॅटलाइन पर बात हो रही थी, तब उस पत्रकार ने दूसरे छोर से आडवाणी से बात करने की कोशिश की. आडवाणी ने उनसे बातचीत करने से मना कर दिया क्योंकि यह उस वायदे के खिलाफ होता, जो उन्होंने मुझसे किया था कि वह सिर्फ अपनी पत्नी से बात करेंगे. लेकिन उस पत्रकार ने यह खबर फैला दी कि उन्होंने आडवाणी से बात की है, और भाजपा द्वारा केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लेना अब कुछ समय की ही बात है. इस खुलासे से मेरी सरकार के साथ-साथ वीपी सिंह सरकार की भी काफी बदनाम हुई, और दुमका के डीएम को सस्पेंड कर देने की मांग उठी. जब आडवाणी को यह बात मालूम चली, तो वह बेहद दुखी हुए, और उन्होंने साफ-साफ कहा कि उन्होंने किसी पत्रकार को कोई इंटरव्यू नहीं दिया है. वह चाहते, तो खामोश रहकर इस झूठ को और फैलने दे सकते थे, क्योंकि इससे उस आदमी की ही परेशानी बढ़ती, जिसने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था. लेकिन सच कहकर उन्होंने अपने बड़प्पन का परिचय दिया.’

2. राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने का सुझाव किसने दिया?

1997 में जब लालू यादव की गिरफ्तारी तय थी तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया. इस फैसले के लिए उनकी काफी आलोचना हुई. लालू यादव लिखते हैं कि राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाने का सुझाव उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने उन्हें दिया था. लालू लिखते हैं, ‘यह वही थे, जिन्होंने मुझे निजी तौर पर सुझाव दिया कि मेरी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर सकती हैं. मुझे उनके सुझाव पर हंसी आई.’

इसके बावजूद राबड़ी देवी का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर कैसे तय हुआ, इसके बारे में वे लिखते हैं, ‘24 जुलाई, 1997 की शाम को अपने आधिकारिक निवास पर राजद विधायी दल की एक बैठक बुलाई और घोषणा की कि मैंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने का फैसला किया है. मैं आप सभी को संकट के इस समय में एकता बनाए रखने और अगले मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पसंद का नेता का चयन का अनुरोध करता हूं. मैंने किसी भी नाम का सुझाव नहीं दिया, और राबड़ी का तो कतई नहीं. मैंने अपने निर्वाचित विधायकों पर फैसला लेने का जिम्मा छोड़ा. मेरी इस बात पर उनके मध्य उदासीनता छा गई. माहौल पूरी तरह से शांत था, और फिर मेरे मंत्रिस्तरीय सहयोगियों, रघुवंश प्रसाद सिंह, रघुनाथ झा, जगदानंद सिंह और महावीर प्रसाद ने मुझे मुख्यमंत्री के रूप में राबड़ी देवी के नाम का प्रस्ताव दिया. कोई भी मेरे पुराने मित्रों - जाबिर हुसैन और अन्य - जो उस बैठक का हिस्सा थे, से मेरी इस बात की सत्यता की जांच कर सकता है. मेरे सभी विधायकों ने एकजुट होकर राबड़ी का नाम सुझाया. राबड़ी बैठक में नहीं थीं और स्पष्ट रूप से इस कार्यवाही से अनजान थीं.’

3. लालू की हरी झंडी के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने

लालू यादव अपनी आत्मकथा में यह लिखते हैं कि 2004 में मनमोहन सिंह तब प्रधानमंत्री बने जब उन्होंने सोनिया गांधी को इसके लिए मंजूरी दी. लालू लिखते हैं, ‘मेरे पास राजद के 22 सांसद थे और मैं यह मानता था कि यदि सोनिया जी प्रधानमंत्री बनती हैं, तो यह मेरी विचारधारा की जीत होगी क्योंकि चुनाव प्रचार में विरोधियों ने उनके खिलाफ अस्वीकार्य भाषा का इस्तेमाल किया था और मेरे खिलाफ दुष्प्रचार किया था. उनके अलावा किसी और को स्वीकार करने का मेरा कोई इरादा नहीं था.’

इस बारे में वे आगे लिखते हैं, ‘सबसे पहले सोनिया जी ने ही मुझसे बात की. उन्होंने जोर देकर कहा कि मैं डाॅ. सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लूं. मैंने इनकार कर दिया. इसके बाद वह डाॅ. सिंह के साथ मेरे आवास पर आईं और मुझसे कारण जानना चाहा. उन्होंने डाॅ. सिंह को राजी किया कि वह मुझसे आग्रह करें कि मैं उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लूं. मैं दुविधा में था. एक ओर तो मैं उन्हें नई प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था. दूसरी ओर मैं उनका आग्रह ठुकरा नहीं सकता था, जो कष्ट उठाकर डाॅ. सिंह के साथ मेरे घर तक आई थीं. आखिरकार मैं नरम पड़ा और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए.’