लेखक-निर्देशक : विवेक अग्निहोत्री

कलाकार : श्वेता बसु प्रसाद, मिथुन चक्रवर्ती, पंकज त्रिपाठी, नसीरुद्दीन शाह, मंदिरा बेदी, पल्लवी जोशी, राजेश शर्मा, विनय पाठक, प्रकाश बेलावड़ी

रेटिंग : 1/5

(समीक्षा में कुछ स्पॉइलर हैं, कृपया अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

हिंदी फिल्म इतिहास में कई वामपंथी रुझान वाले निर्देशकों ने अतिश्योक्ति को हथियार बनाए बिना उम्दा सिनेमा रचा है और देख पाने वालों ने उनमें उनकी पॉलिटिक्स का अक्स भी देखा है. लेकिन जब सिनेमा केवल निर्देशक की निजी पॉलिटिक्स का आईना भर बन जाता है तो प्रोपेगेंडा से ज्यादा कुछ नहीं हो पाता. दक्षिणपंथी रुझान वाले फिल्मकारों और लेखकों की यह हमेशा से समस्या रही है कि उनकी आर्ट पर पॉलिटिक्स इस कदर हावी हो जाती है कि वह लाउड प्रोपेगेंडा की जद से बाहर नहीं निकल पाती.

यह होता इसलिए है कि इस विचारधारा का सो-कॉल्ड क्रिएटिव माइंड दूसरी विचारधाराओं से नफरत करने को अपनी विचारधारा की जीत समझता है, और खुलकर अपने विरोधियों की मुखालफत करना ही उसे अपनी विचारधारा की श्रेष्ठता साबित करने का सबसे असरदार तरीका मालूम होता है.

निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ (2014) के वक्त से ही अपना लेफ्टिस्ट-फोबिया दुनियाभर को दिखा चुके हैं और उसके बाद से उनका ट्विटर अकांउट एंटी-लेफ्ट, एंटी-कांग्रेस और प्रो-बीजेपी पॉलिटिक्स का गवाह रहा है. ‘द ताशकंद फाइल्स’ उनकी इसी विचारधारा की उपज है और ऑल्टरनेटिव-हिस्ट्री रचने वाली प्योर प्रोपेगेंडा फिल्म है. ऊपरी तौर पर यह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत के रहस्य को सुलझाने की बात करती है लेकिन इसके केंद्र में केवल कांग्रेस और गांधी परिवार से नफरत करने की मंशा छिपी हुई है. यह मंशा साफ तौर पर निर्देशक के ‘विजन’ का ही हिस्सा है क्योंकि दो-सवा दो घंटे तक इधर-उधर घुमाने के बाद और दसियों कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज का जिक्र करने के बाद फिल्म सीधे तौर पर इंदिरा गांधी को शास्त्री जी की मौत का जिम्मेदार बता देती है.

यह कोई स्पॉइलर नहीं है, क्योंकि शास्त्री जी की मौत से जुड़ी जानकारियां रखने वाले और विवेक अग्निहोत्री की पॉलिटिक्स से वाकिफ रहने वाले आम लोग बिना ट्रेलर देखे ही समझ गए होंगे कि वे ‘द ताशकंद फाइल्स’ को किस रास्ते पर लेकर जाने वाले हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि शास्त्री जी की मौत से जुड़े सवालों में एक उम्दा पॉलिटिकल या इनवेस्टिगेटिव थ्रिलर फिल्म होने की तमाम संभावनाएं छिपी हुई हैं. लेकिन केवल एक तटस्थ निर्देशक ही इन सब सवालों और कई सारे सवाल-जवाब से जन्मे विरोधाभासों को लेकर उम्दा फिल्म रच सकता है. वह तमाम संभावनाओं पर चर्चा कर सकता है और राशोमोन इफेक्ट जैसे किसी सिनेमाई टूल का उपयोग कर बिना कोई फैसला सुनाए अलग-अलग वर्जन प्रस्तुत कर एक मनोरंजक फिल्म दर्शकों की नजर कर सकता है. ऐसी फिल्म फिर दर्शकों को सोचने पर मजबूर भी कर देती और निर्देशक को अपनी पॉलिटिक्स व नजरिया भी सटल तरीके से शामिल करने के मौके मुहैया कराती.

लेकिन विवेक अग्निहोत्री उस दौर के फिल्म निर्देशक हैं जिसमें एक खास विचारधारा वाली राजनीति को खुश करने के लिए हिंदी सिनेमा को दांव पर लगाया जा रहा है. इसलिए उनकी फिल्म में आपको शास्त्री जी की मौत से जुड़ी तमाम कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज और वक्त के साथ उठते रहे वाजिब सवाल तो मिलेंगे, लेकिन जवाब केवल वही मिलेंगे जो कांग्रेस को आखिर में कटघरे में खड़ा कर सकें.

शास्त्री जी की मौत को लेकर कई सवाल पिछले 50 सालों में उठाए जाते रहे हैं और ज्यादातर पब्लिक डोमेन में मौजूद हैं. कुलदीप नैयर जैसे प्रतिष्ठित पत्रकार भी मानने को तैयार नहीं थे कि शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात से हुई होगी. पूछा जाता रहा है कि मरने के बाद उनके शव का पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? उनकी डायरी और थर्मस को परिवार को वापस क्यों नहीं किया गया? जब उनका खानसामा उनके साथ ताशकंद गया था तो फिर वहां भारत के एम्बेसेडर रहे मिस्टर कौल के खानसामे जान मोहम्मद ने क्यों उनका खाना बनाया? मौत के बाद उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया और कुछ जगह कट के निशान क्यों थे?

विवेक अग्निहोत्री ने इस सब सवालों को लेकर और अपनी पसंद के लेखकों व उनकी किताबों से रेफरेंस लेकर वही सच गढ़ा है जो कि प्रो-बीजेपी विचारधारा वाले लेखक कई बरस से सार्वजनिक मंच पर कहते आ रहे हैं. साथ ही ताशकंद में सुभाष चंद्र बोस के शास्त्रीजी से मिलने वाली कॉन्स्पिरेसी थ्योरी से लेकर केजीबी और इंदिरा के गठबंधन तक की असत्यापित बातें पूरी ठसक के साथ दिखाई गई हैं. इन सारे ही असत्यापित सत्य को केवल ‘आस्था’ से स्वीकारा जा सकता है और ऐसी आस्था केवल ‘अंधभक्तों’ के पास मौजूद होती है.

सुभाष चंद्र बोस के जीवन से जुडी कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज पर ‘नेताजी रहस्य गाथा’ नामक किताब लिखने वाले अनुज धर ने शास्त्रीजी पर भी ‘योर प्राइममिनिस्टर इज डेड’ नामक किताब लिखी है और विवेक अग्निहोत्री ने उनकी ढेर सारी सलाह फिल्म में शामिल की है. अनुज धर की ट्विटर टाइमलाइन कांग्रेस के प्रति उनकी नफरत दर्शाने वाले ट्वीट्स से भरी हुई है और वहां का चक्कर लगाने के बाद कोई भी समझेगा कि वे भी विवेक अग्निहोत्री की तरह प्रो-बीजेपी नैरेटिव को ही आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.

फिल्म में एक जगह तो ‘पॉलिटिकल मिस्ट्रीज’ नामक किताब को दिखा-दिखाकर यह तक कहा गया है कि इस किताब अनुसार शास्त्री जी की दो मेडिकल रिपोर्ट बनाई गई थीं जिसमें से दूसरी गुप्त रिपोर्ट सोवियत संघ में तैयार हुई और इसी में केवल जहर से मौत होने की आशंका जताई गई थी. न तो ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक डोमेन में मिलती है और न ही जिस किताब की यहां बात की गई है उसमें किए गए दावे की कोई सत्यता मालूम होती है. इस किताब के लेखक के बारे में फिल्म में जोर देकर बताया जाता है कि इसे पांडिचेरी के गवर्नर रहे केआर मलकानी ने लिखा था. लेकिन कोई किरदार यह नहीं बताता कि मलकानी साहब भारतीय जनता पार्टी के भी एक वरिष्ठ नेता थे!

इसी तरह एक जगह सीआईए पर भी उंगली उठती है. किताब में सीआईए के अफसर रहे रॉबर्ट क्राउली के इंटरव्यू का संदर्भ लेकर कहा जाता है कि अमेरिका की इस गुप्तचर संस्था ने ही वैज्ञानिक होमी भाभा और शास्त्री जी की हत्या करवाई क्योंकि दोनों मिलकर हिंदुस्तान को न्यूक्लियर पावर बनाने का सपना देख रहे थे. यह थ्योरी चूंकि काफी चर्चित रही है इसीलिए फिल्म में इसपर लंबी चर्चा भी होती है. लेकिन थोड़ी देर बाद इसे रॉबर्ट क्राउली का बड़बोलापन बताकर खारिज कर दिया जाता है. और आपको फिल्म के आखिरी हिस्से में ही समझ आता है कि ऐसा क्यों हुआ.

इस हिस्से में सोवियत संघ की गुप्तचर संस्था केजीबी को शास्त्रीजी की हत्या से जोड़ा जाता है और एक केजीबी एजेंट की लिखी किताब को आधार बनाकर (The Mitrokhin Archive) साबित किया जाता है कि उनकी हत्या के पीछे कौन रहा होगा. आप फिल्म देखते वक्त इस समय सोच सकते हैं कि एक किताब को खारिज कर दिया (सीआईए वाली) और दूसरी उसी तरह की किताब को सहर्ष स्वीकार लिया गया (केजीबी वाली). आखिर क्यों?

क्योंकि फिल्म केजीबी को शामिल कर अपने मुख्य मकसद, यानी कि, इंदिरा गांधी को शास्त्री जी की हत्या से कामयाबी से जोड़ सके! फिल्म इस लंबी-चौड़ी कॉन्स्पिरेसी थ्योरी का अंत केजीबी के पूर्व एजेंट की ऊपर वर्णित किताब के एक विस्तृत टेक्स्ट को परदे पर दिखाकर करती है जिसमें इंदिरा गांधी के नाम का (सफेद रंग से छिपाकर किया गया) जिक्र है. इस लंबे-चौड़े विवरण का सार यही है कि केजीबी और इंदिरा गांधी की सांठगांठ बहुत ऊंचे स्तर की थी और इसी वजह से शास्त्री जी के जाने के बाद अगले 10 साल तक कांग्रेस और इंदिरा गांधी ने देश का बंटाधार कर दिया.

लेकिन सबसे मजेदार है कि यह लंबा-चौड़ा विवरण देकर सीधे इंदिरा गांधी पर गंभीर आरोप लगाने के बाद, फिल्म छोटे अक्षरों में नीचे लिख देती है कि ‘इस रिपोर्ट में किए गए दावों की सत्यता साबित नहीं हुई है!’ बताईए! अब इससे ज्यादा शर्मनाक प्रोपेगेंडा और क्या होगा. विवेक अग्निहोत्री शुरुआत में अपनी फिल्म को ‘सभी ईमानदार पत्रकारों’ को समर्पित करते हैं, लेकिन यह सब देखने के बाद उनसे कहने का मन करता है कि जनाब, ऐसी अविवेकशील पत्रकारिता कोई ईमानदार पत्रकार नहीं करता.

श्वेता बसु प्रसाद फिल्म में ऐसी पत्रकार बनी हैं जो शुरुआत में तो फेक न्यूज से खूब प्यार करती हैं लेकिन शास्त्री जी के केस से ऐसे जुड़ जाती हैं कि हर वक्त सोते-जागते बस ‘मुझे सच जानना है’ की रट लगाए रहती हैं. उनका काम शुरू में काफी प्रभावी है और बतौर हीरोइन वे खूब जंचती भी हैं. लेकिन जैसे-जैसे सच जानने की सनक विस्तार लेती है वैसे-वैसे उनके किरदार का पागलपन उनके अभिनय पर हावी हो जाता है. ऐसे वक्त में उन्हे परदे पर देखना बिलकुल नहीं सुहाता. बाकी सुदृढ़ एक्टरों की लंबी-चौड़ी कास्ट में से केवल मिथुन चक्रवर्ती असर छोड़ते हैं और ‘गुरु’ फिल्म के अपने किरदार की याद दिलाते हैं.

‘द ताशकंद फाइल्स’ को इसलिए भी देखिए कि पता चल सके कि खुद की विचारधारा को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिए फिल्मकार ने कैसे चतुर तरीकों का उपयोग किया है. शास्त्री जी की मौत का रहस्य सुलझाने के लिए बनी कमेटी में कई तरह के लोगों को शामिल किया है ताकि लगे कि वे सभी विचारधाराओं और तबकों को अपनी बात रखने का अवसर दे रहा है. लेकिन जल्द ही उन्हें कोसा जाने लगता है और ‘सोशल टेररिस्ट’ से लेकर ‘इंटेलेक्चुअल टेररिस्ट’ तक कहा जाता है. वहीं कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज को सही मानने वाली नायिका को एंटी-नेशनल कहा जाता है और उसके मुंह पर कालिख पोती जाती है, ताकि दिखाया जा सके कि असली जुल्म तो इन लोगों के साथ हो रहा है. ये ही बेचारे सत्य की तलाश में मारे-मारे फिर रहे हैं!