21 सितंबर 1994 का दिन था. सूरत के उपस्वास्थ्य आयुक्त को ख़बर दी गई कि शहर के एक अस्पताल में एक मौत हुई है और मरने वाले में न्यूमोनिक प्लेग के लक्षण लगते हैं. उसी दिन शाम होते होते-उन्हें सूचित किया गया कि सूरत के वेड रोड रिहाइशी इलाक़े में 10 मौतें हुई हैं और न्यूमोनिक प्लेग के लक्षणों के साथ लगभग 50 और मरीज अस्पतालों में भर्ती हुए हैं.

पूरा प्रशासन सकते में आ गया. जब तक सरकार कोई मेडिकल बुलेटिन जारी करवाती, अखबारों में ख़बरें तैर गईं कि 20 से 25 सितंबर के दरम्यान अस्पतालों में प्लेग के लगभग 460 केस आए हैं और लगभग 1061 मरीज़ इस महामारी से प्रभावित हैं. शहर में हड़कंप मच गया. प्रशासन को आशंका थी कि कहीं यह महामारी विकराल रूप न धर ले. ऐसा ही हुआ. 1994 के प्लेग ने सूरत और गुजरात ही नहीं, बल्कि देश और दुनिया तक को हिलाकर रख दिया.

लोग रातों रात शहर छोड़कर भागे

जैसे ही लोगों को इस महामारी के फैलने की ख़बर हुई, वे भागने लगे. कुछ ही दिनों में सूरत की लगभग 25 फीसदी आबादी शहर छोड़ गई. जानकारों के मुताबिक़ आजादी के बाद यह लोगों का दूसरा बड़ा पलायन था. पहले शहर के रईस लोग अपनी-अपनी गाड़ियों में निकल भागे, फिर निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर और यहां तक कि केमिस्ट भी. कई सरकारी अधिकारियों ने भी किसी न किसी बहाने छुट्टी लेकर शहर छोड़ दिया. ट्रेन, बस जैसे भी संभव था, लोग शहर से निकल गए.

सूरत हीरे और कपड़ा फैक्ट्रियों के लिए मशहूर है. इनके कामगार भी तनख्वाह मिलते ही पलायन कर गए. ये मज़दूर महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब या बिहार और अन्य राज्यों के थे. उनके ज़रिये इस महामारी के अन्य राज्यों में भी फैलने की आशंका हो गई. कुल मिलाकर, पूरे देश में प्लेग के 6334 संभावित मामले दर्ज़ हुए. इनमें 55 लोगों की मौत हुई और विभिन्न जांच केंद्रों में 288 लोगों में इसकी पुष्टि का दावा किया गया.

कामकाज ठप

इस महामारी के चलते देश को 18,00 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. विदेशों में बदनामी हुई सो अलग. लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट जा रहे एयर इंडिया के हवाई जहाज को ‘प्लेग प्लेन’ कहा गया. ब्रिटिश अखबार इंडिपेंडेंट ने इसे ‘मध्यकलीन श्राप’ की संज्ञा दी तो टाइम मैगज़ीन ने इसे ‘मध्यकालीन हॉरर शो’ कहा. मदर टेरेसा उन दिनों रोम की यात्रा पर गई हुई थीं. वहां एयरपोर्ट पर उनकी पूरी जांच के बाद ही उन्हें शहर में प्रवेश करने दिया गया.

आयात-निर्यात रुक गया. पर्यटन भी इसका बड़ा बुरा असर हुआ. अमेरिका और अन्य विकसित देशों ने अपने नागरिकों को एडवाइज़री जारी कर भारत न जाने की सलाह दी. कुछ देशों ने तो एयर इंडिया के जहाजों के अन्दर फ्यूमिगेशन (धुआं छोड़ना) शुरू कर किया. हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) के डायरेक्टर जनरल सूरत आये थे और उनकी एक मेडिकल टीम ने हालात का जायज़ा लेने के बाद दुनिया को यकीन दिलाने की कोशिश की थी भारत ने इसे रोकने के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठा लिए हैं. लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ. कुल मिलाकर देश की बड़ी किरकिरी हुई.

किसी भी महामारी या आपदा के बाद कुछ सवाल अनसुलझे रह जाते हैं. सूरत में भी ऐसा हुआ था. तीन अहम सवाल थे. पहला, महामारी क्या वास्तव में प्लेग थी? दूसरा, इसकी शुरुआत कैसे हुई? तीसरा, यह फैली कैसे?

जो जवाब मिले

प्लेग ऐसी महामारी है जो चूहों में पल रहे पिस्सुओं से होती है. जब बड़ी संख्या में चूहे मरते हैं तो प्लेग के जीवाणुओं से भरे पिस्सू उनका शरीर छोड़ते हैं और अगर इंसानों को वे काट लें तो ये महामारी फैल जाती है. न्यूमोनिक प्लेग येरीसिना पेस्टिस नाम के बैक्टीरिया से होता है. उस समय बताया गया कि अगस्त, 1994 में सूरत शहर में भारी तादाद में चूहे मरे. वह मानसून का महीना था. ताप्ती नदी के किनारे बसे हुए सूरत में बाढ़ का पानी भर गया था. मरे हुए चूहे शहर भर में फैल गए, उमस और गर्मी की वजह से उनमें से निकले पिस्सू, जो प्लेग के जीवाणु लिए हुए थे, कुछ इंसानों को काट गए जिससे उनमें में ये बीमारी फैल गई. न्यूमोनिक प्लेग के मरीज़ को खांसी होती है, उससे संक्रमण हवा में फैल जाता है और यह प्लेग महामारी की शक्ल इख्तियार कर लेता है.

क्या वास्तव में ऐसा हुआ था?

जर्नल ऑफ़ द रॉयल सोसाइटी ऑफ़ मेडिसिन में डॉ. दिलीप वी मावलंकर के एक लेख के हवाले से देखें तो मामला अलग ही नज़र आता है. वे लिखते हैं कि देश के कई संस्थानों की इस महामारी के होने पर अलग-अलग राय है. कुछ मानते हैं कि प्लेग फैला था, और कुछ नहीं. वहीं सूरत शहर के डॉक्टर्स भी एक राय नहीं रखते. कुछ के मुताबिक़ जो मौतें हुईं वे महज़ न्यूमोनिया की वजह से हुई थीं, न कि न्यूमोनिक प्लेग से. उधर, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट को मानें तो पीड़ित लोगों में येरीसिना पेस्टिस बैक्टीरिया नहीं मिला जिससे न्यूमोनिक प्लेग की बात स्वीकार नहीं की जा सकती.

हालांकि कई जानकारों के मुताबिक यह भी हो सकता है कि जांच केंद्रों में सैंपल तयशुदा मानकों को ध्यान में रखते हुए नहीं लाये गये हों और उस वजह से सैंपलों की सही जांच न हो पायी हो. दूसरी तरफ़ अशोक के दत्त, रईस अख्तर और मेलिंडा मेकवे अमेरिका के ओहायो शहर में स्थित एक्रॉन विश्वविद्यालय (ओहायो शहर) को सौंपी गई रिपोर्ट में लिखते हैं कि सूरत के मरीजों में येरीसिना पेस्टिस बैक्टीरिया के मिलने की पुष्टि हुई थी.

मावलंकर कहते हैं कि दूसरा प्रश्न यानी न्यूमोनिक प्लेग की शुरुआत कैसे हुई इस पर भी कोई संतोषजन जवाब नहीं मिलता, क्योंकि न तो सूरत में भारी तादाद में चूहे मरने की खबर थी और न ही न्यूमोनिक या ब्यूबोनिक प्लेग का कोई इक्का-दुक्का मामला सामने आया था. उसी साल अगस्त में महाराष्ट्र के बीड जिले में ब्यूबोनिक प्लेग तो फैला पर न्यूमोनिक नहीं. चूंकि दोनों किस्म के प्लेगों का बैक्टीरिया अलग-अलग है तो एक से दूसरे प्रकार का प्लेग होने की संभावना नहीं है. और फिर बीड (महाराष्ट्र) की सूरत से दूरी लगभग 300 किलोमीटर है.

तीसरा प्रश्न यानी यह फैला कैसे, के जवाब में मावलंकर लिखते हैं, ‘चूंकि न्यूमोनिक प्लेग बड़ी तेज़ी से फैलता है और भीड़-भाड़ वाले इलाकों में तो कहर मच जाता है तो फिर ये कैसे संभव है कि खाचाखच भरी बसों और ट्रेनों के जरिये ये महामारी नहीं फैली? इसलिए जब किसी भी किसी राज्य से प्लेग के इतने मामले नहीं आये तो फिर इस बीमारी के होने की पुष्टि ज़रूरी है.’ वहीं, जाने माने पत्रकार प्रफुल बिडवई ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में अपने एक लेख में इस महामारी के होने से ही इनकार किया था. मार्च 1995 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी लगभग इन्हीं बातों को उठाते हुए सूरत के प्लेग पर सवाल खड़े किये थे.

ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि मीडिया ने इस विषय पर गहन पड़ताल नहीं की, तथ्यों को नहीं खंगाला और बस एक दूसरे से होड़ लगाने की जद्दोजहद में बातों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया? क्या ऐसा हुआ कि बीमारी कुछ और थी और बता कुछ और दिया गया? हो सकता है कि जांच केंद्रों पर लाये गए सैंपलों की सही जांच की जाती तो किसी और बीमारी का पता चलता? इन सब बातों का जवाब पाने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने मई, 2000 में फ़ैसला लिया था कि दोनों पक्षों यानी मानने वाले और नकारने वालों को आमने सामने बिठाकर पूरी बात समझी जाए जिससे इस रहस्य पर पर्दा उठ सके. उस मीटिंग का अंजाम क्या हुआ, यह न कभी सुना गया और न कभी पढ़ा गया.

हां, पर शुक्र इस बात रहा कि जिस तेज़ी से यह बीमारी देश में फैली, उसी तेज़ी से ख़त्म भी हो गई. उसके बाद शहर में आमूलचूल परिवर्तन हुआ. जो सूरत एक वक़्त गंदगी और झुग्गियों के लिए मशहूर था उस की सूरत ही पलट गई. अगले तीन सालों में यह देश का दूसरा सबसे साफ़ शहर बन गया.